भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ]अद्वैतप्रकरण१५७
मन्यववोधः आत्मसत्यानुवोधः । तेन सङ्कल्प्याभावतया न सङ्कल्पयते, दाह्याभावे ज्वलनमिवाग्नेः, यदा यस्मिन्काले तदा तस्मिन्कालेऽमनस्ताममनोभावं याति; ग्राह्याभावे तन्मनोऽग्रहं ग्रहणविकल्पनावर्जितमित्यर्थः ३२होना आत्मसत्यानुबोध है । उसके कारण सङ्कल्पयोग्य वस्तुका अभाव हो जानेसे, दाह्य वस्तुका अभाव हो जानेपर अग्निके दाहकत्वके अभावके समान, जिस समय चित्त सङ्कल्प नहीं करता उस समय वह अमनस्कता अर्थात् अमनीभावको प्राप्त हो जाता है । ग्राह्य वस्तुका अभाव हो जानेसे वह मन अग्रह अर्थात् ग्रहण-विकल्पनासे रहित हो जाता है ॥३२॥

आत्मज्ञान किसे होता है ?

यद्यसदिदं द्वैतं केन स्वमजमात्मतत्त्वं विबुध्यते ? इति उच्यते—यदि यह सम्पूर्ण द्वैत असत्य है तो प्रकृत सत्य आत्मतत्त्वका ज्ञान किसे होता है ? इसपर कहते हैं—

अकल्पकमजं ज्ञानं ज्ञेयाभिन्नं प्रचक्षते ।
ब्रह्मज्ञेयमजं नित्यमजेनाजं विबुध्यते ॥ ३३ ॥

उस सर्वकल्पनाशून्य अजन्मा ज्ञानको विवेकीलोग ज्ञेय ब्रह्मसे अभिन्न बतलाते हैं ? ब्रह्म जिसका विषय है वह ज्ञान अजन्मा और नित्य है । उस अजन्मा ज्ञानसे अजन्मा आत्मतत्त्व स्वयं ही जाना जाता है ॥३३॥

अकल्पकं सर्वकल्पनावर्जितमत एवाजं ज्ञानं ज्ञप्तिमात्रं ज्ञेयेन परमार्थसता ब्रह्मणाभिन्नंअकल्पक—सम्पूर्ण कल्पनाओंसे रहित अतएव अजन्मा अर्थात् ज्ञप्तिमात्र ज्ञानको ब्रह्मवेत्ता लोग ज्ञेय यानी परमार्थसत्स्वरूप ब्रह्मसे
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