भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 178

१५८ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


प्रचक्षते कथयन्ति ब्रह्मविदः। न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽग्न्युष्णवत् "विज्ञानमानन्दं ब्रह्म" (बृ० उ० ३ । ९ । २८) "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" (तै० उ० २ । १) इत्यादि-श्रुतिभ्यः ।अभिन्न बतलाते हैं। अग्निकी उष्णता-के समान विज्ञाताके ज्ञानका कभी लोप नहीं होता । "ब्रह्म विज्ञान और आनन्दस्वरूप है" "ब्रह्म सत्य ज्ञान और अनन्त है" इत्यादि श्रुतियोंसे यही बात प्रमाणित होती है ।
तस्यैव विशेषणं ब्रह्म ज्ञेयं यस्य स्वस्य तदिदं ब्रह्मज्ञेय-मौष्ण्यस्येवाग्निवदभिन्नम् । तेना-त्मस्वरूपेणाजेन ज्ञानेनाजं ज्ञेय-मात्मतत्त्वं स्वयमेव विबुध्यते-ऽवगच्छति । नित्यप्रकाशस्वरूप इव सविता नित्यविज्ञानैकरस-घनत्वान्न ज्ञानान्तरमपेक्षत इत्यर्थः ॥ ३३ ॥उस (ज्ञान) के ही विशेषण बतलाते हैं—'ब्रह्मज्ञेयम्' अर्थात् ब्रह्म जिसका ज्ञेय है वह ज्ञान अग्नि-से उष्णताके समान ब्रह्मसे अभिन्न है । उस आत्मस्वरूप अजन्मा ज्ञानसे अजन्मा ज्ञेयरूप आत्मतत्त्व स्वयं ही जाना जाता है । तात्पर्य यह है कि नित्यप्रकाशस्वरूप सूर्यके समान नित्यविज्ञानैकरसघनरूप होनेके कारण वह किसी अन्य ज्ञानकी अपेक्षा नहीं करता ॥ ३३ ॥

शान्तवृत्तिका स्वरूप

आत्मसत्यानुबोधेन सङ्कल्पम-कुर्वद्वाह्यविषयाभावे निरिन्ध-नाग्निवत्प्रशान्तं निगृहीतं निरुद्धंआत्मसत्यकी उपलब्धि होनेसे संकल्प न करता हुआ चित्त, बाह्य-विषयका अभाव हो जानेसे, इन्धन-रहित अग्निके समान शान्त होकर निगृहीत अर्थात् निरुद्ध हो जाता