भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ] • अद्वैतप्रकरण १५९


| मनो भवतीत्युक्तम्। एवं च मनसो ह्यमनीभावे द्वैताभावश्चोक्तः। तस्यैवम्— | है—ऐसा कहा गया। इस प्रकार मनका अमनीभाव हो जानेपर द्वैतका भी अभाव बतलाया गया। उस इस प्रकार— |

निगृहीतस्य मनसो निर्विकल्पस्य धीमतः ।
प्रचारः स तु विज्ञेयः सुषुप्तेऽन्यो न तत्समः ॥ ३४ ॥

निगृहीत, निर्विकल्प और विवेक सम्पन्न चित्तका जो व्यापार है वह विशेषरूपसे ज्ञातव्य है। सुषुप्ति-अवस्था में जो चित्तकी वृत्ति है वह अन्य प्रकारकी है, वह उस (निरुद्धावस्था) के समान नहीं है ॥ ३४ ॥

| निगृहीतस्य निरुद्धस्य मनसो निर्विकल्पस्य सर्वकल्पनावर्जितस्य धीमतो विवेकवतः प्रचारो यः स तु प्रचारो विशेषेण ज्ञेयो योगिभिः। | निगृहीत—रोके हुए, निर्विकल्प—सब प्रकारकी कल्पनाओंसे रहित और धीमान्—विवेकसम्पन्न चित्तका जो प्रचार—व्यापार है, योगियोंको उसका वह व्यापार विशेषरूपसे जानना चाहिये। | | ननु सर्वप्रत्ययाभावे यादृशः सुषुप्तस्थस्य मनसः प्रचारस्तादृश एव निरुद्धस्यापि प्रत्ययाभावाविशेषात्किं तत्र विज्ञेयमिति । | शंका—सब प्रकारकी प्रतीतियोंका अभाव हो जानेपर जैसा व्यापार सुषुप्तिस्थ चित्तका होता है वैसा ही निरुद्धका भी होगा, क्योंकि प्रतीति-का अभाव दोनों ही अवस्थाओंमें समान है। उसमें विशेषरूपसे जाननेयोग्य कौन-सी बात है ? | | अत्रोच्यते—नैवम्; यस्मात् सुषुप्तेऽन्यः प्रचारोऽविद्यामोहतमोग्रस्तस्यान्तर्लीनानेकानर्थ- | समाधान—इस विषयमें हमारा कहना है कि ऐसी बात नहीं है, क्योंकि सुषुप्तिमें अविद्या-मोहरूप अन्धकारसे ग्रस्त हुए तथा जिसके |