भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 180
१६०माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
प्रवृत्तिबीजवासनावतो मनसभीतर अनेकों अनर्थ-प्रवृत्तिकी बीज-
भूत वासनाएँ लीन हैं उस मनका
आत्मसत्यानुबोधहुताशविप्लुष्टा-व्यापार दूसरे प्रकारका है और
आत्मसत्यके बोधरूप अग्निसे जिसकी
विद्यानर्थप्रवृत्तिबीजस्य निरुद्ध-अविद्यारूपी अनर्थ-प्रवृत्तिका बीज
दग्ध हो गया है तथा जिसके सब
स्यान्य एव प्रशान्तसर्वक्लेशरजसःप्रकारके क्लेशरूप दोष शान्त हो
गये हैं उस निरुद्ध चित्तका स्वतन्त्र
स्वतन्त्रः प्रचारः । अतो नप्रचार दूसरे ही प्रकारका है । अतः
वह उसके समान नहीं है। इसलिये
तत्समः । तस्माद्युक्तः स विज्ञातु-तात्पर्य यह है कि उसका ज्ञान
मित्यभिप्रायः ॥ ३४ ॥अवश्य प्राप्त करना चाहिये ॥३४॥

सुषुप्ति और समाधिका भेद

प्रचारभेदे हेतुमाह—उन दोनोंके प्रचारभेदमें हेतु बतलाते हैं—

लीयते हि सुषुप्ते तन्निगृहीतं न लीयते ।
तदेव निर्भयं ब्रह्म ज्ञानालोकं समन्ततः ॥ ३५ ॥

सुषुप्ति-अवस्थामें मन [अविद्यामें] लीन हो जाता है, किन्तु निरुद्ध होनेपर वह उसमें लीन नहीं होता । उस समय तो सब ओरसे चित्प्रकाशमय निर्भय ब्रह्म ही रहता है ॥ ३५ ॥

लीयते सुषुप्तौ हि यस्मात्सर्वा-क्योंकि सुषुप्तिमें मन अविद्यादि
भिरविद्यादिप्रत्ययबीजवासनाभिःसम्पूर्ण प्रतीतियोंकी बीजभूता
सह तमोरूपमविशेषरूपं बीज-वासनाओंके सहित तमःस्वभाव
भावमापद्यते तद्विवेकाविज्ञानपूर्वकंअविशेषरूप बीजभावको प्राप्त हो जाता है और उसके विवेक ज्ञान-