माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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| १६० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| प्रवृत्तिबीजवासनावतो मनस | भीतर अनेकों अनर्थ-प्रवृत्तिकी बीज- |
| भूत वासनाएँ लीन हैं उस मनका | |
| आत्मसत्यानुबोधहुताशविप्लुष्टा- | व्यापार दूसरे प्रकारका है और |
| आत्मसत्यके बोधरूप अग्निसे जिसकी | |
| विद्यानर्थप्रवृत्तिबीजस्य निरुद्ध- | अविद्यारूपी अनर्थ-प्रवृत्तिका बीज |
| दग्ध हो गया है तथा जिसके सब | |
| स्यान्य एव प्रशान्तसर्वक्लेशरजसः | प्रकारके क्लेशरूप दोष शान्त हो |
| गये हैं उस निरुद्ध चित्तका स्वतन्त्र | |
| स्वतन्त्रः प्रचारः । अतो न | प्रचार दूसरे ही प्रकारका है । अतः |
| वह उसके समान नहीं है। इसलिये | |
| तत्समः । तस्माद्युक्तः स विज्ञातु- | तात्पर्य यह है कि उसका ज्ञान |
| मित्यभिप्रायः ॥ ३४ ॥ | अवश्य प्राप्त करना चाहिये ॥३४॥ |
सुषुप्ति और समाधिका भेद
| प्रचारभेदे हेतुमाह— | उन दोनोंके प्रचारभेदमें हेतु बतलाते हैं— |
लीयते हि सुषुप्ते तन्निगृहीतं न लीयते ।
तदेव निर्भयं ब्रह्म ज्ञानालोकं समन्ततः ॥ ३५ ॥
सुषुप्ति-अवस्थामें मन [अविद्यामें] लीन हो जाता है, किन्तु निरुद्ध होनेपर वह उसमें लीन नहीं होता । उस समय तो सब ओरसे चित्प्रकाशमय निर्भय ब्रह्म ही रहता है ॥ ३५ ॥
| लीयते सुषुप्तौ हि यस्मात्सर्वा- | क्योंकि सुषुप्तिमें मन अविद्यादि |
| भिरविद्यादिप्रत्ययबीजवासनाभिः | सम्पूर्ण प्रतीतियोंकी बीजभूता |
| सह तमोरूपमविशेषरूपं बीज- | वासनाओंके सहित तमःस्वभाव |
| भावमापद्यते तद्विवेकाविज्ञानपूर्वकं | अविशेषरूप बीजभावको प्राप्त हो जाता है और उसके विवेक ज्ञान- |