माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १६१
| निरुद्धं निगृहीतं सन्न लीयते तमोबीजभावं नापद्यते। तस्माद्युक्तः प्रचारभेदः सुषुप्तस्य समाहितस्य मनसः । | पूर्वक निरुद्ध किया जानेपर लीन नहीं होता, अर्थात् अज्ञानरूप बीजभावको प्राप्त नहीं होता । अतः सुषुप्त और समाहित चित्तका प्रचारभेद ठीक ही है । |
| यदा ग्राह्यग्राहकाविद्याकृतमलद्वयवर्जितं तदा परमद्वयं ब्रह्मैव तत्संवृत्तमित्यतस्तदेव निर्भयं द्वैतग्रहणस्य भयनिमित्तस्याभावात् । शान्तमभयं ब्रह्म, यद्विद्वान्न बिभेति कुतश्चन । | जिस समय चित्त ग्राह्य-ग्राहकरूप अविद्यासे होनेवाले दोनों प्रकारके मलोंसे रहित हो जाता है उस समय वह परम अद्वितीय ब्रह्मरूप ही हो जाता है। अतः द्वैतग्रहणरूप भयके कारणका अभाव हो जानेसे [ उस अवस्था में ] वही निर्भय होता है । ब्रह्म शान्त और अभयपद है, जिसे जान लेनेपर पुरुष किसीसे नहीं डरता । |
| तदेव विशेष्यते ज्ञप्तिर्ज्ञानमात्मस्वभावचैतन्यं तदेव ज्ञानमालोकः प्रकाशो यस्य तद्ब्रह्म ज्ञानालोकं विज्ञानैकरसघनमित्यर्थः । समन्ततः समन्तात्सर्वतो व्योमवन्नैरन्तर्येण व्यापकमित्यर्थः ॥ ३५ ॥ | उसीका विशेषण बतला रहे हैं—ज्ञानका अर्थ ज्ञप्ति अर्थात् आत्मस्वरूप चैतन्य है; वह ज्ञान ही जिसका आलोक यानी प्रकाश है वह ब्रह्म ज्ञानालोक अर्थात् विज्ञानैकरसस्वरूप है । समन्ततः-सब ओर अर्थात् आकाशके समान निरन्तरतासे सब ओर व्यापक है ॥ ३५ ॥ |
ब्रह्मका स्वरूप
अजमनिद्रमस्वप्नमनामकमरूपकम् ।
सकृद्विभातं सर्वज्ञं नोपचारः कथंचन ॥ ३६ ॥