भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 182
१६२माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

वह ब्रह्म जन्मरहित, [ अज्ञानरूप ] निद्रारहित, स्वप्नशून्य, नाम-रूपसे रहित, नित्य प्रकाशस्वरूप और सर्वज्ञ है; उसमें किसी प्रकारका कर्त्तव्य नहीं है ॥ ३६ ॥

जन्मनिमित्ताभावात्सबाह्याभ्यन्तरमजम् । अविद्यानिमित्तं हि जन्म रज्जुसर्पवदित्यवोचाम। सा चाविद्यात्मसत्यानुबोधेन निरुद्धा यतोऽजमत एवानिद्रम् । अविद्यालक्षणानादिर्माया निद्रा । स्वापात्प्रबुद्धोऽद्वयस्वरूपेणात्मनातः अस्वप्नम् । अप्रबोधकृते ह्यस्य नामरूपे । प्रबोधाच्च ते रज्जुसर्पवद्विनष्टे इति न नाम्नाभिधीयते ब्रह्म रूप्यते वा न केनचित्प्रकारेणेत्यनामकमरूपकं च तत् । "यतो वाचो निवर्तन्ते" (तै० उ० २।४।१) इत्यादिश्रुतेः।जन्मके कारणका अभाव होनेसे ब्रह्म बाह्याभ्यन्तरवर्ती और अजन्मा है। रज्जुमें सर्पके समान जीवका जन्म अविद्याके कारण है—ऐसा हम पहले कह चुके हैं; क्योंकि आत्मसत्यका अनुभव होनेसे उस अविद्याका निरोध हो गया है; इसलिये ब्रह्म अजन्मा है और इसीसे अनिद्र भी है। यहाँ अविद्यारूपा अनादिमाया ही निद्रा है। अपने अद्वयस्वरूपसे वह स्वप्नसे जगा हुआ है; इसलिये अस्वप्न है। उसके नामरूप भी अज्ञानके ही कारण हैं। ज्ञान होनेपर वे रज्जुमें प्रतीत होनेवाले सर्पके समान नष्ट हो जाते हैं। अतः ब्रह्म किसी नामद्वारा कथन नहीं किया जाता और न किसी प्रकार उसका रूप ही बतलाया जाता है, इसीलिये वह अनाम और अरूप है; जैसा कि "जहाँसे वाणी लौट आती है" इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध होता है ।
किं च सकृद्विभातं सदैव विभातं सदा भारूपमग्रहणान्यथाग्रहणाविर्भावतिरोभाववर्जित-यही नहीं; वह अग्रहण, अन्यथाग्रहण तथा आविर्भाव-तिरोभावसे रहित होनेके कारण सकृद्विभात—सदा ही भासनेवाला अर्थात् नित्य-
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