भारतकोश
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माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
१६२माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

वह ब्रह्म जन्मरहित, [ अज्ञानरूप ] निद्रारहित, स्वप्नशून्य, नाम-रूपसे रहित, नित्य प्रकाशस्वरूप और सर्वज्ञ है; उसमें किसी प्रकारका कर्त्तव्य नहीं है ॥ ३६ ॥

जन्मनिमित्ताभावात्सबाह्याभ्यन्तरमजम् । अविद्यानिमित्तं हि जन्म रज्जुसर्पवदित्यवोचाम। सा चाविद्यात्मसत्यानुबोधेन निरुद्धा यतोऽजमत एवानिद्रम् । अविद्यालक्षणानादिर्माया निद्रा । स्वापात्प्रबुद्धोऽद्वयस्वरूपेणात्मनातः अस्वप्नम् । अप्रबोधकृते ह्यस्य नामरूपे । प्रबोधाच्च ते रज्जुसर्पवद्विनष्टे इति न नाम्नाभिधीयते ब्रह्म रूप्यते वा न केनचित्प्रकारेणेत्यनामकमरूपकं च तत् । "यतो वाचो निवर्तन्ते" (तै० उ० २।४।१) इत्यादिश्रुतेः।जन्मके कारणका अभाव होनेसे ब्रह्म बाह्याभ्यन्तरवर्ती और अजन्मा है। रज्जुमें सर्पके समान जीवका जन्म अविद्याके कारण है—ऐसा हम पहले कह चुके हैं; क्योंकि आत्मसत्यका अनुभव होनेसे उस अविद्याका निरोध हो गया है; इसलिये ब्रह्म अजन्मा है और इसीसे अनिद्र भी है। यहाँ अविद्यारूपा अनादिमाया ही निद्रा है। अपने अद्वयस्वरूपसे वह स्वप्नसे जगा हुआ है; इसलिये अस्वप्न है। उसके नामरूप भी अज्ञानके ही कारण हैं। ज्ञान होनेपर वे रज्जुमें प्रतीत होनेवाले सर्पके समान नष्ट हो जाते हैं। अतः ब्रह्म किसी नामद्वारा कथन नहीं किया जाता और न किसी प्रकार उसका रूप ही बतलाया जाता है, इसीलिये वह अनाम और अरूप है; जैसा कि "जहाँसे वाणी लौट आती है" इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध होता है ।
किं च सकृद्विभातं सदैव विभातं सदा भारूपमग्रहणान्यथाग्रहणाविर्भावतिरोभाववर्जित-यही नहीं; वह अग्रहण, अन्यथाग्रहण तथा आविर्भाव-तिरोभावसे रहित होनेके कारण सकृद्विभात—सदा ही भासनेवाला अर्थात् नित्य-

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १६३


त्वात् । ग्रहणाग्रहणे हि राज्यहनी तमश्चाविद्यालक्षणं सदाप्रभातत्त्वे कारणम् । तदभावान्नित्यचैतन्यभारूपत्वाच्च युक्तं सकृद्विभातमिति । अत एव सर्वं च तज्ज्ञस्वरूपं चेति सर्वज्ञम् । नेह ब्रह्मण्येवंविध उपचारणमुपचारः कर्तव्यः । यथान्येषाम आत्मस्वरूपव्यतिरेकेण समाधानाद्युपचारः । नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावत्वाद्ब्रह्मणः कथंचन न कथंचिदपि कर्तव्यसंभवोऽविद्यानाश इत्यर्थः ॥ ३६ ॥प्रकाशस्वरूप है । ग्रहण और अग्रहण ही रात्रि और दिन हैं तथा अविद्यारूप अन्धकार ही सर्वदा ब्रह्मके प्रकाशित न होनेमें कारण है । उसका अभाव होनेसे और नित्यचैतन्यस्वरूप होनेसे ब्रह्मका नित्यप्रकाशस्वरूप होना ठीक ही है। अतः सर्व और ज्ञप्तिरूप होनेसे वह सर्वज्ञ है । इस प्रकारके ब्रह्ममें कोई उपचार यानी कर्तव्य नहीं है, जिस प्रकार कि दूसरोंको आत्मस्वरूपसे भिन्न समाधि आदि कर्तव्य हैं । तात्पर्य यह है कि ब्रह्म नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव है; इसलिये अविद्याका नाश हो जानेपर विद्वान्‌को कुछ भी कर्तव्य रहना सम्भव नहीं है ॥ ३६ ॥
अनामकत्वाद्युक्तार्थसिद्धये हेतुमाह—अनामकत्व आदि उपर्युक्त अर्थकी सिद्धिके लिये कारण बतलाते हैं—

सर्वाभिलापविगतः सर्वचिन्तासमुत्थितः ।
सुप्रशान्तः सकृज्ज्योतिः समाधिरचलोऽभयः ॥ ३७ ॥

वह सब प्रकारके वाग्व्यापारसे रहित, सब प्रकारके चिन्तन ( अन्तःकरणके व्यापार ) से ऊपर, अत्यन्त शान्त, नित्यप्रकाश, समाधिस्वरूप, अचल और निर्भय है ॥ ३७ ॥

१६४माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
अभिलप्यतेऽनेनेत्यभिलापोजिसके द्वारा शब्दोच्चारण किया जाता है वह 'अभिलाप' अर्थात् 'वाक्' है, जो सब प्रकारके शब्दोच्चारणका साधन है, उससे रहित । यहाँ वागिन्द्रिय उपलक्षणके लिये है, अतः तात्पर्य यह है कि वह सब प्रकारकी बाह्य इन्द्रियोंसे रहित है ।
वाक्करणं सर्वप्रकारस्याभिधानस्य,
तस्माद्विगतः। वागत्रोपलक्षणार्था,
सर्वबाह्यकरणवर्जित इत्येतत् ।
तथा सर्वचिन्तासमुत्थितः ।तथा सब प्रकारकी चिन्तासे उठा हुआ है । जिससे चिन्तन किया जाता है वह बुद्धि ही चिन्ता है, उससे उठा हुआ है अर्थात् अन्तःकरणसे रहित है; जैसा कि “प्राणरहित, मनोरहित और शुद्ध है तथा पर अक्षरसे भी पर है” इत्यादि श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है ।
चिन्त्यतेऽनयेति चिन्ता बुद्धि-
स्तस्याः समुत्थितोऽन्तःकरण-
वर्जित इत्यर्थः “अप्राणो ह्यमनाः
शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः” ( मु०
उ० २ । १ । २) इत्यादिश्रुतेः ।
यस्मात्सर्वविषयवर्जितोऽतःक्योंकि वह सम्पूर्ण विषयोंसे रहित है इसलिये अत्यन्त शान्त है, सकृज्ज्योति अर्थात् आत्मचैतन्यरूपसे सदा ही प्रकाशस्वरूप है, समाधिके कारणसे होनेवाली प्रज्ञासे उपलब्ध होनेके कारण समाधि है, अथवा इसमें चित्त समाहित किया जाता है इसलिये इसे समाधि कहते हैं, अचल अर्थात् अविकारी है और इसीसे विकारका अभाव होनेके कारण ही अभय है ॥ ३७ ॥
सुप्रशान्तः, सकृज्ज्योतिः सदैव-
ज्योतिरात्मचैतन्यस्वरूपेण,
समाधिः समाधिनिमित्तप्रज्ञाव-
गम्यत्वात्, समाधीयतेऽस्मिन्निति
वा समाधिः, अचलोऽविक्रियः,
अत एवाभयो विक्रियाभावात् ३७

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १६५


यस्माद्ब्रह्मैव समाधिरचलोऽभय इत्युक्तमतो—क्योंकि ब्रह्म ही 'समाधिस्वरूप, अचल और अभय है' ऐसा कहा गया है, इसलिये—

ग्रहो न तत्र नोत्सर्गश्चिन्ता यत्र न विद्यते ।
आत्मसंस्थं तदा ज्ञानमजाति समतां गतम् ॥ ३८ ॥

जिस (ब्रह्मपद) में किसी प्रकारका चिन्तन नहीं है उसमें किसी तरहका ग्रहण और त्याग भी नहीं है। उस अवस्थामें आत्मनिष्ठ ज्ञान जन्मरहित और समताको प्राप्त हुआ रहता है ॥ ३८ ॥

न तत्र तस्मिन्ब्रह्मणि ग्रहो ग्रहणमुपादानम्, नोत्सर्ग उत्सर्जनं हानं वा विद्यते । यत्र हि विक्रिया तद्विषयत्वं वा तत्र हानोपादाने स्यातां न तद्द्वयमिह ब्रह्मणि संभवति । विकारहेतोरन्यस्याभावान्निरवयवत्वाच्च । अतो न तत्र हानोपादाने इत्यर्थः। चिन्ता यत्र न विद्यते । सर्वप्रकारैव चिन्ता न संभवति यत्रामनस्त्वात्कुतस्तत्र हानोपादाने इत्यर्थः ।वहाँ—उस ब्रह्ममें न तो ग्रह—ग्रहण यानी उपादान है और न उत्सर्ग—उत्सर्जन अर्थात् त्याग ही है । जहाँ विकार अथवा विकारकी विषयता (विकृत होनेकी योग्यता) होती है वहीं ग्रहण और त्याग भी रहते हैं; किन्तु यहाँ ब्रह्ममें उन दोनोंहीकी सम्भावना नहीं है, क्योंकि उसमें विकारका हेतुभूत कोई अन्य पदार्थ है नहीं और वह स्वयं निरवयव है। इसलिये तात्पर्य यह है कि उसमें ग्रहण और त्याग भी सम्भव नहीं हैं। जहाँ चिन्ता नहीं है अर्थात् मनोरहित होनेके कारण जिसमें किसी प्रकारकी चिन्ता सम्भव नहीं है वहाँ त्याग और ग्रहण कैसे रह सकते हैं ?
१६६माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

यदैवात्मसत्यानुबोधो जातस्तदैवात्मसंस्थं विषयाभावादग्न्युष्णवदात्मन्येव स्थितं ज्ञानम् ; अजाति जातिवर्जितम् , समतां गतं परं साम्यमापन्नं भवति ।जिस समय भी आत्मसत्यका बोध होता है उसी समय आत्मसंस्थ अर्थात् विषयका अभाव होनेके कारण अग्निकी उष्णताके समान आत्मामें ही स्थित ज्ञान अजाति—जन्मरहित और समताको प्राप्त हो जाता है ।
यदादौ प्रतिज्ञातमतो वक्ष्याम्यकार्पण्यमजाति समतां गतमितीदं तदुपपत्तितः शास्त्रतथोक्तमुपसंह्रियते, अजाति समतां गतमिति। एतस्मादात्मसत्यानुबोधात्कार्पण्यविषयमन्यत्पहले (इस प्रकरणके दूसरे श्लोकमें) जो प्रतिज्ञा की थी कि 'इसलिये मैं समान भावको प्राप्त, अजन्मा अकृपणताका वर्णन करूँगा' उस पूर्वकथनका ही यहाँ 'अजाति समतां गतम्' ऐसा कहकर युक्ति और शास्त्रद्वारा उपसंहार किया गया है । "हे गार्गि ! जो पुरुष इस अक्षर ब्रह्मको बिना जाने ही इस लोकसे चला जाता है वह कृपण है" इस श्रुतिके अनुसार कृपणताका विषय तो इस आत्मसत्यके बोधसे भिन्न ही है । तात्पर्य यह है कि इस तत्त्वको प्राप्त कर लेनेपर तो हर कोई कृतकृत्य ब्राह्मण (ब्रह्मनिष्ठ) हो जाता है ॥ ३८॥
"यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्माल्लोकात्प्रैति स कृपणः" (बृ० उ० ३ । ८ । १०) इति श्रुतेः । प्राप्यैतत्सर्वः कृतकृत्यो ब्राह्मणो भवतीत्यभिप्रायः॥३८॥

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १६७


अस्पर्शयोगकी दुर्गमता

यद्यपीदमित्थं परमार्थतत्त्वम्यद्यपि यह परमार्थ तत्त्व ऐसा है [तथापि]—

अस्पर्शयोगो वै नाम दुर्दर्शः सर्वयोगिभिः ।
योगिनो बिभ्यति ह्यस्मादभये भयदर्शिनः ॥ ३९ ॥

[ सब प्रकारके स्पर्शसे रहित ] यह अस्पर्शयोग निश्चय ही योगियोंके लिये कठिनतासे दिखायी देनेवाला है । इस अभय पदमें भय देखनेवाले योगीलोग इससे भय मानते हैं ॥ ३९ ॥

अस्पर्शयोगो नामार्यं सर्वसंबन्धाख्यस्पर्शवर्जितत्वादस्पर्शयोगो नाम वै स्मर्यते प्रसिद्धमुपनिषत्सु । दुःखेन दृश्यत इति दुर्दर्शः सर्वयोगिभिः वेदान्तविहितविज्ञानरहितैः सर्वयोगिभिः । आत्मसत्यानुबोधायासल्लभ्य एवेत्यर्थः ।यह अस्पर्शयोग नामवाला है अर्थात् सर्व-सम्बन्धरूप स्पर्शसे रहित होनेके कारण यह-उपनिषदोंमें अस्पर्श-योग नामसे प्रसिद्ध होकर स्मरण किया गया है। यह वेदान्त-विज्ञानसे रहित सभी योगियोंको कठिनतासे दिखायी देता है, इसलिये उनके लिये दुर्दर्श है । तात्पर्य यह है कि यह एकमात्र आत्मसत्यके अनुभव और [ श्रवण-मनन एवं प्राणायामादि ] आयासोंके द्वारा ही प्राप्त होने योग्य है ।
योगिनो बिभ्यति ह्यस्मात्सर्वभयवर्जितादप्यात्मनाशरूपमिमं योगं मन्यमाना भयं कुर्वन्ति अभयेऽस्मिन्भयदर्शिनो भयनिमित्तात्मनाशदर्शनशीला अविवेकिन इत्यर्थः ॥ ३९ ॥क्योंकि सम्पूर्ण भयसे रहित होनेपर भी इस योगको आत्मनाशरूप माननेके कारण इस अभय योगमें भय देखनेवाले—भयका निमित्तभूत आत्मनाश देखनेवाले अर्थात् अविवेकी योगीलोग इससे भय मानते हैं ॥ ३९ ॥

१६८ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०

अन्य योगियोंकी शान्ति मनोनिग्रहके अधीन है

येषां पुनर्ब्रह्मस्वरूपव्यतिरेकेण रज्जुसर्पवत्कल्पितमेव मन इन्द्रियादि च न परमार्थतो विद्यते तेषां ब्रह्मस्वरूपाणामभयं मोक्षाख्या चाक्षया शान्तिः स्वभावत एव सिद्धा नान्यायत्ता नोपचारः कथंचनेत्यवोचाम । ये त्वतोऽन्ये योगिनो मार्गगा हीनमध्यमदृष्टयो मनोऽन्यदात्मव्यतिरिक्तात्मसंबन्धि पश्यन्ति तेषामात्मसत्यानुबोधरहितानाम्जिनकी दृष्टिमें ब्रह्मस्वरूपसे अतिरिक्त मन और इन्द्रिय आदि रज्जुमें सर्पके समान कल्पित ही हैं—परमार्थतः हैं ही नहीं, उन ब्रह्मभूतोंकी निर्भयता और मोक्षसंज्ञक अक्षय शान्ति तो स्वभावसे ही सिद्ध है, किसी अन्यके अधीन नहीं है; जैसा कि 'उसके लिये कुछ भी कर्तव्य नहीं है' ऐसा हम पहले (छत्तीसवें श्लोकमें) कह चुके हैं। किन्तु जो इनसे अन्य परमार्थपथमें चलनेवाले हीन और मध्यम दृष्टिवाले योगी मनको आत्मासे भिन्न आत्माका सम्बन्धी मानते हैं, उन आत्मसत्यके बोधसे रहित—

मनसो निग्रहायत्तमभयं सर्वयोगिनाम् ।
दुःखक्षयः प्रबोधश्चाप्यक्षया शान्तिरेव च ॥ ४० ॥

समस्त योगियोंके अभय, दुःखक्षय, प्रबोध और अक्षय शान्ति मनके निग्रहके ही अधीन हैं ॥ ४० ॥

मनसो निग्रहायत्तमभयं सर्वेषां योगिनाम् । किं च दुःखक्षयोऽपि, न ह्यात्मसंबन्धिनि मनसि प्रचलिते दुःखक्षयोऽस्तिसमस्त योगियोंका अभय मनके निग्रहके अधीन है । यही नहीं, दुःखक्षय भी [ मनोनिग्रहके ही अधीन है ], क्योंकि आत्मासे सम्बन्ध रखनेवाले मनके चलायमान रहते हुए अविवेकी पुरुषोंका दुःख-

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १६९


अविवेकिनाम् । किं चात्मप्रबोधोऽपि मनोनिग्रहायत्त एव । तथाक्षयापि मोक्षाख्या शान्तिः तेषां मनोनिग्रहायत्तैव ॥४०॥क्षय नहीं हो सकता । इसके सिवा उनका आत्मज्ञान भी मनके निग्रहके ही अधीन है तथा मोक्षनाम्नी उनकी अक्षय शान्ति भी मनोनिग्रहके ही अधीन है ॥ ४० ॥

मनोनिग्रह धैर्यपूर्वक ही हो सकता है

उत्सेक उदधेर्यद्वत्कुशाग्रेणैकबिन्दुना ।
मनसो निग्रहस्तद्वद्भवेदपरिखेदतः ॥ ४१ ॥

जिस प्रकार [ उद्विग्नता छोड़कर ] कुशाके अग्रभागसे एक-एक बूँदद्वारा समुद्रको उलोचा जा सकता है उसी प्रकार सब प्रकारकी खिन्नताका त्याग कर देनेपर मनका निग्रह हो सकता है ॥ ४१ ॥

मनोनिग्रहोऽपि तेषामुदधेः कुशाग्रेणैकबिन्दुना उत्सेचनेन शोषणव्यवसायवद्व्यवसायवतामनवस्रान्तःकरणानामनिर्वेदादपरिखेदतो भवतीत्यर्थः ॥४१॥कुशके अग्रभागसे एक-एक बूँदके द्वारा समुद्रके उत्सेचन अर्थात् सुखानेके प्रयत्नके समान अखिन्नचित्त और उद्यमशील रहनेवाले उन योगियोंके मनका निग्रह भी खेदशून्य रहनेसे ही होता है—यह इसका तात्पर्य है ॥ ४१ ॥

मनोनिग्रहके विघ्न

किमपरिखिन्नव्यवसायमात्रमेव मनोनिग्रह उपायः ? न, इत्युच्यते ।तो क्या खेदरहित उद्योग ही मनोनिग्रहका उपाय है ? इसपर कहते हैं—'नहीं'
१७०माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

उपायेन निगृह्णीयाद्विक्षिप्तं कामभोगयोः ।
सुप्रसन्नं लये चैव यथा कामो लयस्तथा ॥ ४२ ॥

काम्यविषय और भोगोंमें विक्षिप्त हुए चित्तका उपायपूर्वक निग्रह करे तथा लयावस्थामें अत्यन्त प्रसन्नताको प्राप्त हुए चित्तका भी संयम करे, क्योंकि जैसा [ अनर्थकारक ] काम है वैसा ही लय भी है ॥४२॥

अपरिखिन्नव्यवसायवान्सन् वक्ष्यमाणेनोपायेन कामभोगविषयेषु विक्षिप्तं मनो निगृह्णीयान्निरुन्ध्यादात्मन्येवेत्यर्थः । किं च लीयतेऽस्मिन्निति सुषुप्तौ लयस्तस्मिँल्लये च सुप्रसन्नम् आयासवर्जितम् अपि इत्येतत्, निगृह्णीयादित्यनुवर्तते ।अथक उद्योगशील होकर आगे कहे जानेवाले उपायसे काम और भोगरूप विषयोंमें विक्षिप्त हुए चित्तका निग्रह करे, अर्थात् उसका आत्मामें ही निरोध करे । तथा, जिस अवस्थामें चित्त लीन हो जाता है उस सुषुप्तिका नाम लय है, उस लयावस्थामें अत्यन्त प्रसन्न अर्थात् आयासरहित स्थितिको प्राप्त हुए चित्तका भी निग्रह करे । यहाँ 'निगृह्णीयात्' इस पदकी अनुवृत्ति की जाती है।
सुप्रसन्नं चेत्कस्मान्निगृह्यत इत्युच्यते । यस्माद्यथा कामोऽनर्थहेतुस्तथा लयोऽपि । अतः कामविषयस्य मनसो निग्रहवल्लयादपि निरोद्धव्यमित्यर्थः ४२यदि उस अवस्थामें चित्त अत्यन्त प्रसन्न हो जाता है तो उसका निग्रह क्यों करना चाहिये ? इसपर कहा जाता है-क्योंकि जिस प्रकार काम अनर्थका कारण है उसी प्रकार लय भी है; इसलिये तात्पर्य यह है कि कामविषयक मनके निग्रहके समान उसका लयसे भी निरोध करना चाहिये ॥ ४२ ॥

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १७१


कः स उपायः ? इत्युच्यते—वह उपाय क्या है ? इस विषयमें कहा जाता है—

दुःखं सर्वमनुस्मृत्य कामभोगान्निवर्तयेत् ।
अजं सर्वमनुस्मृत्य जातं नैव तु पश्यति ॥ ४३ ॥

सम्पूर्ण द्वैत दुःखरूप है—ऐसा निरन्तर स्मरण करते हुए चित्तको कामजनित भोगोंसे हटाये। इस प्रकार निरन्तर सब वस्तुओंको अजन्मा ब्रह्मरूप स्मरण करता हुआ फिर कोई जात पदार्थ नहीं देखता ॥ ४३॥

सर्वं द्वैतमविद्याविजृम्भितं दुःखमेवेत्यनुस्मृत्य कामभोगात्कामनिमित्तो भोग इच्छाविषयस्तस्माद्विप्रसृतं मनो निवर्तयेद्वैराग्यभावनयेत्यर्थः। अजं ब्रह्म सर्वमित्येतच्छास्त्राचार्योपदेशतोऽनुस्मृत्य तद्विपरीतं द्वैतजातं नैव तु पश्यति, अभावात् ॥४३॥अविद्यासे प्रतीत होनेवाला सारा द्वैत दुःखरूप ही है—ऐसा निरन्तर स्मरण करता हुआ कामभोगसे—कामनानिमित्तक भोगसे अर्थात् इच्छाजनित विषयसे उसमें फैले हुए चित्तको वैराग्यभावनाद्वारा निवृत्त करे—यह इसका तात्पर्य है। फिर ‘यह सब अजन्मा ब्रह्म ही है’ ऐसा शास्त्र और आचार्यके उपदेशानुसार निरन्तर स्मरण करता हुआ उससे विपरीत द्वैतजातको—उसका अभाव हो जानेके कारण—वह नहीं देखता ॥ ४३ ॥

लये संबोधयेच्चित्तं विक्षिप्तं शमयेत्पुनः ।
सकषायं विजानीयात्समप्राप्तं न चालयेत् ॥ ४४ ॥

चित्त [ सुषुप्तिमें ] लीन होने लगे तो उसे आत्मविवेकमें नियुक्त करे, यदि विक्षिप्त हो जाय तो उसे पुनः शान्त करे और [ यदि इन दोनोंके बीचकी अवस्थामें रहे तो उसे ] सकषाय—रागयुक्त समझे। तथा साम्यावस्थाको प्राप्त हुए चित्तको चञ्चल न करे ॥ ४४ ॥

१७२माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
एवमनेन ज्ञानाभ्यासवैराग्य- <br> द्वयोपायेन लये सुषुप्ते लीनं <br> संबोधयेन्मन आत्मविवेक- <br> दर्शनेन योजयेत् । चित्तं मन <br> इत्यनर्थान्तरम् । विक्षिप्तं च <br> कामभोगेषु शमयेत्पुनः । एवं <br> पुनः पुनरभ्यस्यतो लयातसंबोधितं <br> विषयेभ्यश्च व्यावर्तितं नापि <br> साम्यापन्नमन्तरालावस्थं सकषायं <br> सरागं बीजसंयुक्तं मन इति <br> विजानीयात् । ततोऽपि यत्नतः <br> साम्यमापादयेत् । यदा तु <br> सम्प्राप्तं भवति सम्प्राप्त्यभिमुखी- <br> भवतीत्यर्थः, ततस्तन्न विचाल- <br> येद्विषयाभिमुखं न कुर्यादि- <br> त्यर्थः ॥ ४४ ॥इस प्रकार ज्ञानाभ्यास और <br> वैराग्य—इन दो उपायोंसे, लय अर्थात् <br> सुषुप्तिमें लीन हुए चित्तको, सम्बोधित <br> अर्थात् आत्मविवेकदर्शनमें नियुक्त <br> करे । चित्त और मन—ये कोई भिन्न <br> पदार्थ नहीं हैं । तथा कामना और <br> भोगोंमें विक्षिप्त हुए, चित्तको पुनः <br> शान्त करे । इस प्रकार वारम्वार <br> अभ्यासद्वारा लयावस्थासे सम्बोधित <br> और विषयोंसे निवृत्त किया हुआ <br> चित्त जब अन्तरालावस्थामें स्थित <br> होकर समताको भी प्राप्त न हो <br> तो यह समझे कि इस समय <br> मन सकषाय—रागयुक्त अर्थात् बीजा- <br> वस्थासंयुक्त है । उस अवस्थासे भी <br> उसे यत्नपूर्वक साम्यावस्थामें स्थित <br> करे । किन्तु जिस समय वह <br> समताको प्राप्त हो अर्थात् साम्या- <br> वस्थाप्राप्तिके अभिमुख हो उस समय <br> उस अवस्थामें उसे विचलित न करे; <br> अर्थात् विषयाभिमुख न करे ॥४४॥

नास्वादयेत्सुखं तत्र निःसङ्गः प्रज्ञया भवेत् ।
निश्चलं निश्चरच्चित्तमेकीकुर्यात्प्रयत्नतः ॥ ४५ ॥

उस साम्यावस्थामें [ प्राप्त होनेवाले ] सुखका आस्वादन न करे, बल्कि विवेकवती बुद्धिके द्वारा उससे निःसंग रहे । फिर यदि चित्त बाहर निकलने लगे तो उसे प्रयत्नपूर्वक निश्चल और एकाग्र करे ॥ ४५ ॥

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १७३


समाधित्सतो योगिनो यत्सुखं जायते तन्नास्वादयेत्, तत्र न रज्येतेत्यर्थः । कथं तर्हि ? निःसङ्गो निःस्पृहः प्रज्ञया विवेकबुद्ध्या यदुपलभ्यते सुखं तदविद्यापरिकल्पितं मृषैवेति विभावयेत् । ततोऽपि सुखरागान्निगृह्णीयादित्यर्थः ।समाधिकी इच्छावाले योगीको जो सुख प्राप्त होता है उसका आस्वादन न करे अर्थात् उसमें राग न करे । तो फिर कैसे रहे ? निःसङ्ग अर्थात् निःस्पृह होकर प्रज्ञा-विवेकवती बुद्धिसे ऐसी भावना करे कि यह जो कुछ सुख अनुभव हो रहा है वह अविद्यापरिकल्पित और मिथ्या ही है । तात्पर्य यह कि उस सुखके रागसे भी चित्तका निग्रह करे ।
यदा पुनः सुखरागानिवृत्तं निश्चलस्वभावं सन्निश्चरद्बहिर्निर्गच्छद्भवति चित्तं ततस्ततो नियम्योक्तोपायेनात्मन्येवैकीकुर्यात्प्रयत्नतः । चित्स्वरूपसत्तामात्रमेवापादयेदित्यर्थः ॥ ४५ ॥जिस समय सुखके रागसे निवृत्त होकर निश्चलस्वभाव हुआ चित्त फिर बाहर निकलने लगे तब उसे उपर्युक्त उपायसे वहाँसे भी रोककर प्रयत्नपूर्वक आत्मामें एकाग्र करे । तात्पर्य यह है कि उसे चित्स्वरूप सत्तामात्र ही सम्पादित करे ॥४५॥

मन कब ब्रह्मरूप होता है ?

यदा न लीयते चित्तं न च विक्षिप्यते पुनः ।
अनिङ्गनमनाभासं निष्पन्नं ब्रह्म तत्तदा ॥ ४६ ॥

जिस समय चित्त सुषुप्तिमें लीन न हो और फिर विक्षिप्त भी न हो तथा निश्चल और विषयाभाससे रहित हो जाय उस समय वह ब्रह्म ही हो जाता है ॥ ४६ ॥

४. चतुर्थ प्रकरण — अलातशान्तिप्रकरण (१०० कारिकाएँ)

१७२माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
यथोक्तोपायेन निगृहीतं चित्तं यदा सुषुप्ते न लीयते न च पुनविषयेषु विक्षिष्यते, अनिङ्गनमचलं निवातप्रदीपकल्पम्, अनाभासं न केनचित्कल्पितेन विषयभावेनावभासत इति, यदैवंलक्षणं चित्तं तदा निष्पन्नं ब्रह्म ब्रह्मस्वरूपेण निष्पन्नं चित्तं भवतीत्यर्थः ॥४६॥उपर्युक्त उपायसे निग्रह किया हुआ चित्त जिस समय सुषुप्तिमें लीन नहीं होता और न फिर विषयोंमें ही विक्षिप्त होता है तथा वायुशून्य स्थानमें रखे हुए दीपकके समान निश्चल और अनाभास अर्थात् जो किसी भी कल्पित विषयभावसे प्रकाशित नहीं होता—ऐसा जिस समय यह चित्त हो जाता है उस समय यह ब्रह्म ही हो जाता है; अर्थात् उस अवस्थामें चित्त ब्रह्मरूपसे निष्पन्न हो जाता है ॥४६॥

स्वस्थं शान्तं सनिर्वाणमकथ्यं सुखमुत्तमम् ।

अजमजेन ज्ञेयेन सर्वज्ञं परिचक्षते ॥ ४७ ॥

[ उस अवस्थामें जो आनन्द अनुभव होता है उसे ब्रह्मज्ञ लोग ] स्वस्थ, शान्त, निर्वाणयुक्त, अकथनीय, निरतिशयसुखस्वरूप, अजन्मा, अजन्मा ज्ञेय (ब्रह्म) से अभिन्न और सर्वज्ञ बतलाते हैं ॥ ४७ ॥

यथोक्तं परमार्थसुखमात्मतत्वानुबोधलक्षणं स्वस्थं स्वात्मनि स्थितम्, शान्तं सर्वानर्थोपशमरूपम्, सनिर्वाणं निर्वृतिर्निर्वाणं कैवल्यं सह निर्वाणेन वर्तते, तथाकथ्यं न शक्यते कथयितुम्, अत्यन्तासाधारणविषयत्वात् ;उपर्युक्त आत्मतत्त्वानुबोधरूप परमार्थ-सुख 'स्वस्थम्'—अपने आत्मामें ही स्थित, 'शान्तम्'—सब प्रकारके अनर्थकी निवृत्तिरूप, 'सनिर्वाणम्'—निर्वाण—निर्वृति अर्थात् कैवल्यको कहते हैं, उस निर्वाणके सहित, तथा 'अकथ्यम्'—जो कहा न जा सके, क्योंकि उसका विषय अत्यन्त अ-

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १७५


सुखमुत्तमं निरतिशयं हि तद्योगिप्रत्यक्षमेव । न जातमित्यजं यथा विषयविषयम् । अजेनानुत्पन्नेन ज्ञेयेनाव्यतिरिक्तं सत्त्वेन सर्वज्ञरूपेण सर्वज्ञं ब्रह्मैव सुखं परिचक्षते कथयन्ति ब्रह्मविदः ॥ ४७ ॥साधारण है, 'सुखमुत्तमम्'—योगियोंको ही प्रत्यक्ष होनेवाला होनेके कारण निरतिशय सुख है। तथा 'अजम्'—जो उत्पन्न न हो, जिस प्रकार कि विषयसम्बन्धी सुख हुआ करता है, और अज यानी उत्पन्न न होनेवाले ज्ञेयसे अभिन्न होनेके कारण अपने सर्वज्ञरूपसे स्वयं ब्रह्म ही वह सुख है—ऐसा ब्रह्मज्ञलोग [उसके विषयमें] कहते हैं ॥ ४७ ॥

परमार्थसत्य क्या है ?

सर्वोऽप्ययं मनोनिग्रहादिर्मृल्लोहादिवत्सृष्टिरुपासना चोक्ता परमार्थस्वरूपप्रतिपत्त्युपायतत्वेन न परमार्थसत्येति । परमार्थसत्यं तुमृत्तिका और लोहादिके समान ये मनोनिग्रहादि सम्पूर्ण सृष्टि तथा उपासना परमार्थस्वरूपकी प्राप्तिके उपायरूपसे ही कहे गये हैं; ये परमार्थसत्य नहीं हैं। परमार्थसत्य तो यही है कि—

न कश्चिज्जायते जीवः संभवोऽस्य न विद्यते ।
एतत्तदुत्तमं सत्यं यत्र किञ्चिन्न जायते ॥ ४८ ॥

कोई भी जीव उत्पन्न नहीं होता; क्योंकि उसका कोई कारण ही नहीं है। जिस अजन्मा ब्रह्ममें किसीकी उत्पत्ति नहीं होती वही सर्वोत्तम सत्य है ॥ ४८ ॥

१७६माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
न कश्चिज्जायते जीवः कर्ता भोक्ता च नोत्पद्यते केनचिदपि प्रकारेण । अतः स्वभावतोऽजस्यास्यैकस्यात्मनः संभवः कारणं न विद्यते नास्ति । यस्मान्न विद्यतेऽस्य कारणं तस्मान्न कश्चिज्जायते जीव इत्येतत् । पूर्वेषूपायत्वेनोक्तानां सत्यानामेतदुत्तमं सत्यं यस्मिन्सत्यस्वरूपे ब्रह्मण्यणुमात्रमपि किंचिन्न जायत इति ॥ ४८ ॥कोई भी जीव उत्पन्न नहीं होता—अर्थात् किसी भी प्रकारसे कर्ता-भोक्ताकी उत्पत्ति नहीं होती । अतः स्वभावसे ही इस एक अजन्मा आत्माका कोई सम्भव—कारण नहीं है। और क्योंकि इसका कोई कारण नहीं है इसलिये किसी जीवकी उत्पत्ति भी नहीं होती—यही इसका तात्पर्य है। पहले उपायरूपसे बतलाये हुए सत्योंमें यही उत्तम सत्य है, जिस सत्यस्वरूप ब्रह्ममें कोई भी वस्तु अणुमात्र भी उत्पन्न नहीं होती ॥४८॥

इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीशङ्करभगवतः कृतौ गौडपादीयागमशास्त्रभाष्येऽद्वैताख्यं
तृतीयं प्रकरणम् ॥ ३ ॥

ॐ तत्सत्

अलातशान्तिप्रकरणम्


प्रकरण-प्रयोजनम्ओङ्कारनिर्णयद्वारेणागमतः प्रतिज्ञातस्याद्वैतस्य बाह्यविषयभेदवैतथ्याच्च सिद्धस्य पुनरद्वैते शास्त्रयुक्तिभ्यां साक्षान्निर्धारितस्यैतदुत्तमं सत्यमित्युपसंहारः कृतोऽन्ते । तस्यैतस्यागमार्थस्याद्वैतदर्शनस्य प्रतिपक्षभूता द्वैतिनो वैनाशिकाश्च तेषां चान्योन्यविरोधाद्रागद्वेषादिक्लेशास्पदं दर्शनमिति मिथ्यादर्शनत्वं सूचितम् । क्लेशानास्पदत्वात्तत्सम्यग्दर्शनमित्यद्वैतदर्शनं स्तूयते । तदिह विस्तरेणान्योन्यविरुद्धतयाऽसम्यग्दर्शनत्वं प्रदर्श्यओंकारके निर्णयद्वारा आगमप्रकरणमें प्रतिज्ञा किये अद्वैतका—जिसे कि [वैतथ्यप्रकरणमें] बाह्य विषयभेदके मिथ्यात्वद्वारा सिद्ध किया है और फिर अद्वैत प्रकरणमें शास्त्र और युक्तियोंसे साक्षात् निश्चय किया है, [पिछले प्रकरणके] अन्तमें 'एतदुत्तमं सत्यम्' ऐसा कहकर उपसंहार किया गया । वेदके तात्पर्यभूत इस अद्वैतदर्शनके विरोधी जो द्वैतवादी और वैनाशिक (बौद्ध आदि) हैं उनके दर्शन परस्पर विरोधी होनेके कारण राग-द्वेषादि क्लेशोंके आश्रय हैं, अतः उनका मिथ्यादर्शनत्व सूचित होता है । और राग-द्वेषादि क्लेशोंका आश्रय न होनेके कारण अद्वैतदर्शन ही सम्यग्दर्शन है—इस प्रकार उसकी स्तुति की जाती है । अब यहाँ, परस्पर विरोधी होनेके कारण विस्तारपूर्वक उन (द्वैतवादी आदि दार्शनिकोंके दर्शन) का मिथ्यादर्शनत्व प्रदर्शित कर उनके प्रति-

२३–२४

१७८माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

तत्प्रतिषेधेनाद्वैतदर्शनसिद्धिरूप-पेधद्वारा आवीतन्यायसे* अद्वैतदर्शन-
संहर्त्तव्यावीतन्यायेनेत्यलात-की सिद्धिका उपसंहार करना है—इसी-
शान्तिरारभ्यते ।लिये अलातशान्तिप्रकरणका आरम्भ किया जाता है ।
तत्राद्वैतदर्शनसम्प्रदायकर्तुःउसमें अद्वैतदर्शनसम्प्रदायके
अद्वैतस्वरूपेणैव नमस्कारार्थो-कर्ताको अद्वैतरूपसे ही नमस्कार
ऽयमाद्यश्लोकः । आचार्यपूजाकरनेके लिये यह पहला श्लोक है,
ह्यभिप्रेतार्थसिद्धयर्थेष्यते शास्त्रा-क्योंकि शास्त्रके आरम्भमें आचार्यकी
रम्भे ।पूजा अभिप्रेत अर्थकी सिद्धिके लिये इष्ट ही है ।

नारायण-नमस्कार

ज्ञानेनाकाशकल्पेन धर्मान्यो गगनोपमान् ।
ज्ञेयाभिन्नेन संबुद्धस्तं वन्दे द्विपदां वरम् ॥ १ ॥

जिसने ज्ञेय (आत्मा) से अभिन्न आकाशसदृश ज्ञानसे आकाश-सदृश धर्मों (जीवों) को जाना है उस पुरुषोत्तमको नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥

आकाशेनेषदसमाप्तमाकाश-जो आकाशकी अपेक्षा कुछ
कल्पमाकाशतुल्यमेतत् । तेना-असम्पूर्ण हो † उसे आकाशकल्प
काशकल्पेन ज्ञानेन, किम् ?अर्थात् आकाशतुल्य कहते हैं ।
धर्मान्आत्मनः, किविशिष्टान्-ग-उस आकाशसदृश ज्ञानसे—किसे ? आत्माके धर्मोंको । किस प्रकारके

* अनुमान दो प्रकारका है—अन्वयी और व्यतिरेकी । अन्वयी अनुमानमें एक वस्तुकी सत्तासे दूसरी वस्तुकी सत्ता सिद्ध की जाती है तथा व्यतिरेकीमें एक वस्तुके अभावसे दूसरी वस्तुका अभाव सिद्ध किया जाता है । इस व्यतिरेकी अनुमानका ही दूसरा नाम ‘आवीत अनुमान’ भी है ।

† असम्पूर्णका यह भाव नहीं समझना चाहिये कि ब्रह्म आकाशकी अपेक्षा कुछ न्यून है । इसका केवल यही भाव है कि वह सर्वथा आकाशरूप ही नहीं है—आकाशसे कुछ मिलता-जुलता है ।

शां० भा० ]अलातशान्तिप्रकरण१७९

नोपमान्गगनमुपमा येषां ते गग-<br>नोपमास्तानात्मनो धर्मान् ।<br>ज्ञानस्यैव पुनर्विशेषणम्—<br>ज्ञेयैर्धर्मैरात्मभिरभिन्नमग्न्युष्ण-<br>वत्सचितृप्रकाशवच्च ज्ञानं तेन<br>ज्ञेयाभिन्नेन ज्ञानेनाकाशकल्पेन<br>ज्ञेयात्मस्वरुपान्व्यतिरिक्तेन गग-<br>नोपमान्धर्मान्यः संबुद्धः संबुद्धवा-<br>निति, अयमेवेश्वरो यो नारायणा-<br>ख्यस्तं वन्देऽभिवादये द्विपदां वरं<br>द्विपदोपलक्षितानां पुरुषाणां वरं<br>प्रधानं पुरुषोत्तममित्यभिप्रायः ।<br>उपदेष्टृनमस्कारमुखेन ज्ञान-<br>ज्ञेयज्ञातृभेदरहितं परमार्थतत्त्व-<br>दर्शनमिह प्रकरणे प्रतिपिपाद-<br>यिषितं प्रतिपक्षप्रतिषेधद्वारेण<br>प्रतिज्ञातं भवति ॥ १ ॥धर्मोंको ? गगनोपम धर्मोंको—गगन<br>( आकाश ) जिनकी उपमा हो<br>उन्हें गगनोपम कहते हैं—ऐसे आत्मा-<br>के धर्मोंको । ज्ञानका ही फिर<br>विशेषण देते हैं—अग्निसे उष्णता<br>और सूर्यसे प्रकाशके समान जो<br>ज्ञान ज्ञेय धर्मों अर्थात् आत्माओंसे<br>अभिन्न है उस ज्ञेयाभिन्न अर्थात्<br>ज्ञेय आत्माके स्वरूपसे अन्यतिरिक्त<br>आकाशसदृश ज्ञानसे जिसने<br>आकाशोपम धर्मोंको सदा ही सम्यक्<br>प्रकार जाना है—ऐसा जो नारायण-<br>संज्ञक* ईश्वर है उस द्विपदांवर—<br>दो पदोंसे उपलक्षित पुरुषोंमें श्रेष्ठ<br>यानी प्रधान पुरुषोत्तमकी वन्दना—<br>अभिवादन करता हूँ ।<br>उपदेष्टाको नमस्कार करनेसे<br>यह प्रतिज्ञा की जाती है कि इस<br>प्रकरणमें विरुद्ध पक्षके प्रतिषेधद्वारा<br>ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाताके भेदसे रहित<br>परमार्थदर्शनका प्रतिपादन करना<br>अभीष्ट है ॥ १ ॥

* यहाँ अद्वैतसम्प्रदायके आदि आचार्य बदरिकाश्रमाधीश्वर तापसाग्रगण्य श्रीनारायणकी वन्दना की गयी है ।

१८०माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

अद्वैतदर्शनकी वन्दना

अधुना अद्वैतदर्शनयोगस्य नमस्कारस्तत्स्तुतये--अब अद्वैतदर्शनयोगको, उसकी स्तुतिके लिये, नमस्कार किया जाता है—

अस्पर्शयोगो वै नाम सर्वसत्त्वसुखो हितः ।
अविवादोऽविरुद्धश्च देशितस्तं नमाम्यहम् ॥ २ ॥

[ शास्त्रोंमें ] जिस सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये सुखकर, हितकारी, निर्विवाद और अविरोधी अस्पर्शयोगका उपदेश किया गया है, उसे मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥

| स्पर्शनं स्पर्शः संबन्धो न विद्यते यस्य योगस्य केनचित्कदाचिदपि सोऽस्पर्शयोगो ब्रह्मस्वभाव एव, वै नामेति ब्रह्मविदामस्पर्शयोग इत्येवं-प्रसिद्ध इत्यर्थः । स च सर्वसत्त्वसुखः । भवति कश्चिदत्यन्तसुखसाधनविशिष्टोऽपि दुःखरूपः, यथा तपः । अयं तु न तथा । किं तर्हि सर्वसत्त्वानां सुखः । | जिस योगका किसीसे कभी स्पर्श यानी सम्बन्ध नहीं है उसे ‘अस्पर्शयोग’ कहते हैं; वह ब्रह्मस्वभाव ही है । ‘वै’ ‘नाम’ इन पदोंका यह तात्पर्य है कि वह ‘ब्रह्मवेत्ताओंका अस्पर्शयोग’ इस नामसे प्रसिद्ध है और वह समस्त प्राणियोंके लिये सुखकर होता है । कोई विषय तो अत्यन्त सुखसाधन-विशिष्ट होनेपर भी दुःखरूप होता है, जैसा कि तप । किन्तु यह ऐसा नहीं है । तो फिर कैसा है ? यह सभी प्राणियोंके लिये सुखदायक है । | | तथेह भवति कश्चिद्विषयोपभोगः सुखो न हितः । अयं तु | इसी प्रकार इस लोकमें कोई-कोई विषयसामग्री सुखदायक तो होती है किन्तु हितकर नहीं होती । |

शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण १८१


सुखो हितश्च नित्यमप्रचलित-स्वभावत्वात् । किं चाविवादो विरुद्धवदनं विवादः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहेण यस्मिन्न विद्यते सोऽविवादः । कस्मात् ? यतोऽविरुद्धश्च । य ईदृशो योगो देशितः उपदिष्टः शास्त्रेण तं नमाम्यहं प्रणमामीत्यर्थः ॥ २ ॥किन्तु यह तो सर्वदा अविचल-स्वभाव होनेके कारण सुखदायक भी है और हितकर भी। यही नहीं, यह अविवाद भी है। जिसमें पक्ष-प्रतिपक्ष स्वीकार करके विरुद्ध कथनस्वरूप विवाद नहीं होता उसे अविवाद कहते हैं। ऐसा यह क्यों है ? क्योंकि यह सबसे अविरुद्ध है। ऐसे जिस योगका शास्त्रने उपदेश किया है, उसे मैं नमस्कार यानी प्रणाम करता हूँ ॥ २ ॥

द्वैतवादियोंका पारस्परिक विरोध

कथं द्वैतिनः परस्परं विरुध्यन्ते ? इत्युच्यते--द्वैतवादियोंमें परस्पर किस प्रकार विरोध है ? सो बतलाया जाता है--

भूतस्य जातिमिच्छन्ति वादिनः केचिदेव हि ।
अभूतस्यापरे धीरा विवदन्तः परस्परम् ॥ ३ ॥

उनमेंसे कोई-कोई वादी तो सत् पदार्थकी उत्पत्ति मानते हैं और कोई दूसरे बुद्धिशाली परस्पर विवाद करते हुए असत्पदार्थकी उत्पत्ति स्वीकार करते हैं ॥ ३ ॥

भूतस्य विद्यमानस्य वस्तुनो जातिमुत्पत्तिमिच्छन्ति वादिनः केचिदेव हि सांख्या न सर्वकोई-कोई वादी—केवल सांख्य-मतावलम्बी, सम्पूर्ण द्वैतवादी नहीं—भूत यानी विद्यमान वस्तुकी जाति—उत्पत्ति मानते हैं; और क्योंकि