माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
पृष्ठ 184, कुल 301 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 184
| १६४ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
|---|
| अभिलप्यतेऽनेनेत्यभिलापो | जिसके द्वारा शब्दोच्चारण किया जाता है वह 'अभिलाप' अर्थात् 'वाक्' है, जो सब प्रकारके शब्दोच्चारणका साधन है, उससे रहित । यहाँ वागिन्द्रिय उपलक्षणके लिये है, अतः तात्पर्य यह है कि वह सब प्रकारकी बाह्य इन्द्रियोंसे रहित है । |
| वाक्करणं सर्वप्रकारस्याभिधानस्य, | |
| तस्माद्विगतः। वागत्रोपलक्षणार्था, | |
| सर्वबाह्यकरणवर्जित इत्येतत् । | |
| तथा सर्वचिन्तासमुत्थितः । | तथा सब प्रकारकी चिन्तासे उठा हुआ है । जिससे चिन्तन किया जाता है वह बुद्धि ही चिन्ता है, उससे उठा हुआ है अर्थात् अन्तःकरणसे रहित है; जैसा कि “प्राणरहित, मनोरहित और शुद्ध है तथा पर अक्षरसे भी पर है” इत्यादि श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है । |
| चिन्त्यतेऽनयेति चिन्ता बुद्धि- | |
| स्तस्याः समुत्थितोऽन्तःकरण- | |
| वर्जित इत्यर्थः “अप्राणो ह्यमनाः | |
| शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः” ( मु० | |
| उ० २ । १ । २) इत्यादिश्रुतेः । | |
| यस्मात्सर्वविषयवर्जितोऽतः | क्योंकि वह सम्पूर्ण विषयोंसे रहित है इसलिये अत्यन्त शान्त है, सकृज्ज्योति अर्थात् आत्मचैतन्यरूपसे सदा ही प्रकाशस्वरूप है, समाधिके कारणसे होनेवाली प्रज्ञासे उपलब्ध होनेके कारण समाधि है, अथवा इसमें चित्त समाहित किया जाता है इसलिये इसे समाधि कहते हैं, अचल अर्थात् अविकारी है और इसीसे विकारका अभाव होनेके कारण ही अभय है ॥ ३७ ॥ |
| सुप्रशान्तः, सकृज्ज्योतिः सदैव- | |
| ज्योतिरात्मचैतन्यस्वरूपेण, | |
| समाधिः समाधिनिमित्तप्रज्ञाव- | |
| गम्यत्वात्, समाधीयतेऽस्मिन्निति | |
| वा समाधिः, अचलोऽविक्रियः, | |
| अत एवाभयो विक्रियाभावात् ३७ |