माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १६३
| त्वात् । ग्रहणाग्रहणे हि राज्यहनी तमश्चाविद्यालक्षणं सदाप्रभातत्त्वे कारणम् । तदभावान्नित्यचैतन्यभारूपत्वाच्च युक्तं सकृद्विभातमिति । अत एव सर्वं च तज्ज्ञस्वरूपं चेति सर्वज्ञम् । नेह ब्रह्मण्येवंविध उपचारणमुपचारः कर्तव्यः । यथान्येषाम आत्मस्वरूपव्यतिरेकेण समाधानाद्युपचारः । नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावत्वाद्ब्रह्मणः कथंचन न कथंचिदपि कर्तव्यसंभवोऽविद्यानाश इत्यर्थः ॥ ३६ ॥ | प्रकाशस्वरूप है । ग्रहण और अग्रहण ही रात्रि और दिन हैं तथा अविद्यारूप अन्धकार ही सर्वदा ब्रह्मके प्रकाशित न होनेमें कारण है । उसका अभाव होनेसे और नित्यचैतन्यस्वरूप होनेसे ब्रह्मका नित्यप्रकाशस्वरूप होना ठीक ही है। अतः सर्व और ज्ञप्तिरूप होनेसे वह सर्वज्ञ है । इस प्रकारके ब्रह्ममें कोई उपचार यानी कर्तव्य नहीं है, जिस प्रकार कि दूसरोंको आत्मस्वरूपसे भिन्न समाधि आदि कर्तव्य हैं । तात्पर्य यह है कि ब्रह्म नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव है; इसलिये अविद्याका नाश हो जानेपर विद्वान्को कुछ भी कर्तव्य रहना सम्भव नहीं है ॥ ३६ ॥ |
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| अनामकत्वाद्युक्तार्थसिद्धये हेतुमाह— | अनामकत्व आदि उपर्युक्त अर्थकी सिद्धिके लिये कारण बतलाते हैं— |
सर्वाभिलापविगतः सर्वचिन्तासमुत्थितः ।
सुप्रशान्तः सकृज्ज्योतिः समाधिरचलोऽभयः ॥ ३७ ॥
वह सब प्रकारके वाग्व्यापारसे रहित, सब प्रकारके चिन्तन ( अन्तःकरणके व्यापार ) से ऊपर, अत्यन्त शान्त, नित्यप्रकाश, समाधिस्वरूप, अचल और निर्भय है ॥ ३७ ॥