भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ]अलातशान्तिप्रकरण१७९

नोपमान्गगनमुपमा येषां ते गग-<br>नोपमास्तानात्मनो धर्मान् ।<br>ज्ञानस्यैव पुनर्विशेषणम्—<br>ज्ञेयैर्धर्मैरात्मभिरभिन्नमग्न्युष्ण-<br>वत्सचितृप्रकाशवच्च ज्ञानं तेन<br>ज्ञेयाभिन्नेन ज्ञानेनाकाशकल्पेन<br>ज्ञेयात्मस्वरुपान्व्यतिरिक्तेन गग-<br>नोपमान्धर्मान्यः संबुद्धः संबुद्धवा-<br>निति, अयमेवेश्वरो यो नारायणा-<br>ख्यस्तं वन्देऽभिवादये द्विपदां वरं<br>द्विपदोपलक्षितानां पुरुषाणां वरं<br>प्रधानं पुरुषोत्तममित्यभिप्रायः ।<br>उपदेष्टृनमस्कारमुखेन ज्ञान-<br>ज्ञेयज्ञातृभेदरहितं परमार्थतत्त्व-<br>दर्शनमिह प्रकरणे प्रतिपिपाद-<br>यिषितं प्रतिपक्षप्रतिषेधद्वारेण<br>प्रतिज्ञातं भवति ॥ १ ॥धर्मोंको ? गगनोपम धर्मोंको—गगन<br>( आकाश ) जिनकी उपमा हो<br>उन्हें गगनोपम कहते हैं—ऐसे आत्मा-<br>के धर्मोंको । ज्ञानका ही फिर<br>विशेषण देते हैं—अग्निसे उष्णता<br>और सूर्यसे प्रकाशके समान जो<br>ज्ञान ज्ञेय धर्मों अर्थात् आत्माओंसे<br>अभिन्न है उस ज्ञेयाभिन्न अर्थात्<br>ज्ञेय आत्माके स्वरूपसे अन्यतिरिक्त<br>आकाशसदृश ज्ञानसे जिसने<br>आकाशोपम धर्मोंको सदा ही सम्यक्<br>प्रकार जाना है—ऐसा जो नारायण-<br>संज्ञक* ईश्वर है उस द्विपदांवर—<br>दो पदोंसे उपलक्षित पुरुषोंमें श्रेष्ठ<br>यानी प्रधान पुरुषोत्तमकी वन्दना—<br>अभिवादन करता हूँ ।<br>उपदेष्टाको नमस्कार करनेसे<br>यह प्रतिज्ञा की जाती है कि इस<br>प्रकरणमें विरुद्ध पक्षके प्रतिषेधद्वारा<br>ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाताके भेदसे रहित<br>परमार्थदर्शनका प्रतिपादन करना<br>अभीष्ट है ॥ १ ॥

* यहाँ अद्वैतसम्प्रदायके आदि आचार्य बदरिकाश्रमाधीश्वर तापसाग्रगण्य श्रीनारायणकी वन्दना की गयी है ।