भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 200
१८०माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

अद्वैतदर्शनकी वन्दना

अधुना अद्वैतदर्शनयोगस्य नमस्कारस्तत्स्तुतये--अब अद्वैतदर्शनयोगको, उसकी स्तुतिके लिये, नमस्कार किया जाता है—

अस्पर्शयोगो वै नाम सर्वसत्त्वसुखो हितः ।
अविवादोऽविरुद्धश्च देशितस्तं नमाम्यहम् ॥ २ ॥

[ शास्त्रोंमें ] जिस सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये सुखकर, हितकारी, निर्विवाद और अविरोधी अस्पर्शयोगका उपदेश किया गया है, उसे मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥

| स्पर्शनं स्पर्शः संबन्धो न विद्यते यस्य योगस्य केनचित्कदाचिदपि सोऽस्पर्शयोगो ब्रह्मस्वभाव एव, वै नामेति ब्रह्मविदामस्पर्शयोग इत्येवं-प्रसिद्ध इत्यर्थः । स च सर्वसत्त्वसुखः । भवति कश्चिदत्यन्तसुखसाधनविशिष्टोऽपि दुःखरूपः, यथा तपः । अयं तु न तथा । किं तर्हि सर्वसत्त्वानां सुखः । | जिस योगका किसीसे कभी स्पर्श यानी सम्बन्ध नहीं है उसे ‘अस्पर्शयोग’ कहते हैं; वह ब्रह्मस्वभाव ही है । ‘वै’ ‘नाम’ इन पदोंका यह तात्पर्य है कि वह ‘ब्रह्मवेत्ताओंका अस्पर्शयोग’ इस नामसे प्रसिद्ध है और वह समस्त प्राणियोंके लिये सुखकर होता है । कोई विषय तो अत्यन्त सुखसाधन-विशिष्ट होनेपर भी दुःखरूप होता है, जैसा कि तप । किन्तु यह ऐसा नहीं है । तो फिर कैसा है ? यह सभी प्राणियोंके लिये सुखदायक है । | | तथेह भवति कश्चिद्विषयोपभोगः सुखो न हितः । अयं तु | इसी प्रकार इस लोकमें कोई-कोई विषयसामग्री सुखदायक तो होती है किन्तु हितकर नहीं होती । |