भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 198
१७८माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

तत्प्रतिषेधेनाद्वैतदर्शनसिद्धिरूप-पेधद्वारा आवीतन्यायसे* अद्वैतदर्शन-
संहर्त्तव्यावीतन्यायेनेत्यलात-की सिद्धिका उपसंहार करना है—इसी-
शान्तिरारभ्यते ।लिये अलातशान्तिप्रकरणका आरम्भ किया जाता है ।
तत्राद्वैतदर्शनसम्प्रदायकर्तुःउसमें अद्वैतदर्शनसम्प्रदायके
अद्वैतस्वरूपेणैव नमस्कारार्थो-कर्ताको अद्वैतरूपसे ही नमस्कार
ऽयमाद्यश्लोकः । आचार्यपूजाकरनेके लिये यह पहला श्लोक है,
ह्यभिप्रेतार्थसिद्धयर्थेष्यते शास्त्रा-क्योंकि शास्त्रके आरम्भमें आचार्यकी
रम्भे ।पूजा अभिप्रेत अर्थकी सिद्धिके लिये इष्ट ही है ।

नारायण-नमस्कार

ज्ञानेनाकाशकल्पेन धर्मान्यो गगनोपमान् ।
ज्ञेयाभिन्नेन संबुद्धस्तं वन्दे द्विपदां वरम् ॥ १ ॥

जिसने ज्ञेय (आत्मा) से अभिन्न आकाशसदृश ज्ञानसे आकाश-सदृश धर्मों (जीवों) को जाना है उस पुरुषोत्तमको नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥

आकाशेनेषदसमाप्तमाकाश-जो आकाशकी अपेक्षा कुछ
कल्पमाकाशतुल्यमेतत् । तेना-असम्पूर्ण हो † उसे आकाशकल्प
काशकल्पेन ज्ञानेन, किम् ?अर्थात् आकाशतुल्य कहते हैं ।
धर्मान्आत्मनः, किविशिष्टान्-ग-उस आकाशसदृश ज्ञानसे—किसे ? आत्माके धर्मोंको । किस प्रकारके

* अनुमान दो प्रकारका है—अन्वयी और व्यतिरेकी । अन्वयी अनुमानमें एक वस्तुकी सत्तासे दूसरी वस्तुकी सत्ता सिद्ध की जाती है तथा व्यतिरेकीमें एक वस्तुके अभावसे दूसरी वस्तुका अभाव सिद्ध किया जाता है । इस व्यतिरेकी अनुमानका ही दूसरा नाम ‘आवीत अनुमान’ भी है ।

† असम्पूर्णका यह भाव नहीं समझना चाहिये कि ब्रह्म आकाशकी अपेक्षा कुछ न्यून है । इसका केवल यही भाव है कि वह सर्वथा आकाशरूप ही नहीं है—आकाशसे कुछ मिलता-जुलता है ।