माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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| १७८ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| तत्प्रतिषेधेनाद्वैतदर्शनसिद्धिरूप- | पेधद्वारा आवीतन्यायसे* अद्वैतदर्शन- |
| संहर्त्तव्यावीतन्यायेनेत्यलात- | की सिद्धिका उपसंहार करना है—इसी- |
| शान्तिरारभ्यते । | लिये अलातशान्तिप्रकरणका आरम्भ किया जाता है । |
| तत्राद्वैतदर्शनसम्प्रदायकर्तुः | उसमें अद्वैतदर्शनसम्प्रदायके |
| अद्वैतस्वरूपेणैव नमस्कारार्थो- | कर्ताको अद्वैतरूपसे ही नमस्कार |
| ऽयमाद्यश्लोकः । आचार्यपूजा | करनेके लिये यह पहला श्लोक है, |
| ह्यभिप्रेतार्थसिद्धयर्थेष्यते शास्त्रा- | क्योंकि शास्त्रके आरम्भमें आचार्यकी |
| रम्भे । | पूजा अभिप्रेत अर्थकी सिद्धिके लिये इष्ट ही है । |
नारायण-नमस्कार
ज्ञानेनाकाशकल्पेन धर्मान्यो गगनोपमान् ।
ज्ञेयाभिन्नेन संबुद्धस्तं वन्दे द्विपदां वरम् ॥ १ ॥
जिसने ज्ञेय (आत्मा) से अभिन्न आकाशसदृश ज्ञानसे आकाश-सदृश धर्मों (जीवों) को जाना है उस पुरुषोत्तमको नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥
| आकाशेनेषदसमाप्तमाकाश- | जो आकाशकी अपेक्षा कुछ |
| कल्पमाकाशतुल्यमेतत् । तेना- | असम्पूर्ण हो † उसे आकाशकल्प |
| काशकल्पेन ज्ञानेन, किम् ? | अर्थात् आकाशतुल्य कहते हैं । |
| धर्मान्आत्मनः, किविशिष्टान्-ग- | उस आकाशसदृश ज्ञानसे—किसे ? आत्माके धर्मोंको । किस प्रकारके |
* अनुमान दो प्रकारका है—अन्वयी और व्यतिरेकी । अन्वयी अनुमानमें एक वस्तुकी सत्तासे दूसरी वस्तुकी सत्ता सिद्ध की जाती है तथा व्यतिरेकीमें एक वस्तुके अभावसे दूसरी वस्तुका अभाव सिद्ध किया जाता है । इस व्यतिरेकी अनुमानका ही दूसरा नाम ‘आवीत अनुमान’ भी है ।
† असम्पूर्णका यह भाव नहीं समझना चाहिये कि ब्रह्म आकाशकी अपेक्षा कुछ न्यून है । इसका केवल यही भाव है कि वह सर्वथा आकाशरूप ही नहीं है—आकाशसे कुछ मिलता-जुलता है ।