माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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| १७२ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| यथोक्तोपायेन निगृहीतं चित्तं यदा सुषुप्ते न लीयते न च पुनविषयेषु विक्षिष्यते, अनिङ्गनमचलं निवातप्रदीपकल्पम्, अनाभासं न केनचित्कल्पितेन विषयभावेनावभासत इति, यदैवंलक्षणं चित्तं तदा निष्पन्नं ब्रह्म ब्रह्मस्वरूपेण निष्पन्नं चित्तं भवतीत्यर्थः ॥४६॥ | उपर्युक्त उपायसे निग्रह किया हुआ चित्त जिस समय सुषुप्तिमें लीन नहीं होता और न फिर विषयोंमें ही विक्षिप्त होता है तथा वायुशून्य स्थानमें रखे हुए दीपकके समान निश्चल और अनाभास अर्थात् जो किसी भी कल्पित विषयभावसे प्रकाशित नहीं होता—ऐसा जिस समय यह चित्त हो जाता है उस समय यह ब्रह्म ही हो जाता है; अर्थात् उस अवस्थामें चित्त ब्रह्मरूपसे निष्पन्न हो जाता है ॥४६॥ |
स्वस्थं शान्तं सनिर्वाणमकथ्यं सुखमुत्तमम् ।
अजमजेन ज्ञेयेन सर्वज्ञं परिचक्षते ॥ ४७ ॥
[ उस अवस्थामें जो आनन्द अनुभव होता है उसे ब्रह्मज्ञ लोग ] स्वस्थ, शान्त, निर्वाणयुक्त, अकथनीय, निरतिशयसुखस्वरूप, अजन्मा, अजन्मा ज्ञेय (ब्रह्म) से अभिन्न और सर्वज्ञ बतलाते हैं ॥ ४७ ॥
| यथोक्तं परमार्थसुखमात्मतत्वानुबोधलक्षणं स्वस्थं स्वात्मनि स्थितम्, शान्तं सर्वानर्थोपशमरूपम्, सनिर्वाणं निर्वृतिर्निर्वाणं कैवल्यं सह निर्वाणेन वर्तते, तथाकथ्यं न शक्यते कथयितुम्, अत्यन्तासाधारणविषयत्वात् ; | उपर्युक्त आत्मतत्त्वानुबोधरूप परमार्थ-सुख 'स्वस्थम्'—अपने आत्मामें ही स्थित, 'शान्तम्'—सब प्रकारके अनर्थकी निवृत्तिरूप, 'सनिर्वाणम्'—निर्वाण—निर्वृति अर्थात् कैवल्यको कहते हैं, उस निर्वाणके सहित, तथा 'अकथ्यम्'—जो कहा न जा सके, क्योंकि उसका विषय अत्यन्त अ- |