माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १७३
| समाधित्सतो योगिनो यत्सुखं जायते तन्नास्वादयेत्, तत्र न रज्येतेत्यर्थः । कथं तर्हि ? निःसङ्गो निःस्पृहः प्रज्ञया विवेकबुद्ध्या यदुपलभ्यते सुखं तदविद्यापरिकल्पितं मृषैवेति विभावयेत् । ततोऽपि सुखरागान्निगृह्णीयादित्यर्थः । | समाधिकी इच्छावाले योगीको जो सुख प्राप्त होता है उसका आस्वादन न करे अर्थात् उसमें राग न करे । तो फिर कैसे रहे ? निःसङ्ग अर्थात् निःस्पृह होकर प्रज्ञा-विवेकवती बुद्धिसे ऐसी भावना करे कि यह जो कुछ सुख अनुभव हो रहा है वह अविद्यापरिकल्पित और मिथ्या ही है । तात्पर्य यह कि उस सुखके रागसे भी चित्तका निग्रह करे । |
| यदा पुनः सुखरागानिवृत्तं निश्चलस्वभावं सन्निश्चरद्बहिर्निर्गच्छद्भवति चित्तं ततस्ततो नियम्योक्तोपायेनात्मन्येवैकीकुर्यात्प्रयत्नतः । चित्स्वरूपसत्तामात्रमेवापादयेदित्यर्थः ॥ ४५ ॥ | जिस समय सुखके रागसे निवृत्त होकर निश्चलस्वभाव हुआ चित्त फिर बाहर निकलने लगे तब उसे उपर्युक्त उपायसे वहाँसे भी रोककर प्रयत्नपूर्वक आत्मामें एकाग्र करे । तात्पर्य यह है कि उसे चित्स्वरूप सत्तामात्र ही सम्पादित करे ॥४५॥ |
मन कब ब्रह्मरूप होता है ?
यदा न लीयते चित्तं न च विक्षिप्यते पुनः ।
अनिङ्गनमनाभासं निष्पन्नं ब्रह्म तत्तदा ॥ ४६ ॥
जिस समय चित्त सुषुप्तिमें लीन न हो और फिर विक्षिप्त भी न हो तथा निश्चल और विषयाभाससे रहित हो जाय उस समय वह ब्रह्म ही हो जाता है ॥ ४६ ॥