माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
| १५४ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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जिस प्रकार स्वप्नकालमें मन मायासे ही द्वैताभासरूपसे स्फुरित होता है उसी प्रकार जाग्रत्कालमें भी वह मायासे ही द्वैताभासरूपसे स्फुरित होता है ॥ २९ ॥
| यथा रज्ज्वां विकल्पितः सर्पो रज्जुरूपेणावेक्ष्यमाणः सन्नैवं मनः परमार्थविज्ञप्त्यात्मरूपेणावेक्ष्यमाणं सद् ग्राह्यग्राहकरूपेण द्वयाभासं स्पन्दते स्वप्ने मायया, रज्ज्वामिव सर्पः । तथा तद्वदेव जाग्रज्जागरिते स्पन्दते मायया मनः स्पन्दत इवेत्यर्थः ॥ २९ ॥ | जिस प्रकार रज्जुमें कल्पना किया हुआ सर्प रज्जुरूपसे देखे जानेपर सत् है उसी प्रकार मन भी परमार्थज्ञानरूप आत्मस्वरूपसे देखा जानेपर सत् है । वह रज्जुमें सर्पके समान स्वप्नावस्थामें मायासे ही ग्राह्य-ग्राहकरूप द्वैतके आभासरूपसे स्फुरित होता है । इसी प्रकार यह मन ही जाग्रत्-अवस्थामें भी मायासे [विविध रूपोंमें] स्फुरित होता है; अर्थात् स्फुरित होता-सा मालूम होता है [वास्तवमें स्फुरित भी नहीं होता] ॥२९॥ |
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स्वप्न और जाग्रति मनके ही विलास हैं
अद्वयं च द्वयाभासं मनः स्वप्ने न संशयः ।
अद्वयं च द्वयाभासं तथा जाग्रन्न संशयः ॥ ३० ॥
इसमें सन्देह नहीं स्वप्नावस्थामें अद्वय मन ही द्वैतरूपसे भासनेवाला है; इसी प्रकार जाग्रत्कालमें भी निःसन्देह अद्वय मन ही द्वैतरूपसे भासता है ॥ ३० ॥
| रज्जुरूपेण सर्प इव परमार्थत आत्मरूपेणाद्वयं सद्दूयाभासं | रज्जुरूपसे सत् सर्पके समान परमार्थतः अद्वय आत्मरूपसे सत् |
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शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १५५
| मनः स्वप्ने न संशयः । न हि स्वप्ने हस्त्यादि ग्राह्यं तद्ग्राहकं वा चक्षुरादिद्वयं विज्ञानव्यतिरेकेणास्ति। जाग्रदपि तथैवेत्यर्थः। परमार्थसद्विज्ञानमात्राविशेषात् ३० | मन ही स्वप्नमें द्वैतरूपसे भासनेवाला है—इसमें सन्देह नहीं। स्वप्नमें हाथी आदि ग्राह्य पदार्थ और उन्हें ग्रहण करनेवाले चक्षु आदि दोनों ही विज्ञानके सिवा और कुछ नहीं हैं; ऐसा ही जाग्रतमें भी है—यह इसका तात्पर्य है, क्योंकि दोनों ही अवस्थाओंमें परमार्थ सत् विज्ञान ही समानरूपसे विद्यमान है ॥ ३० ॥ |
| रज्जुसर्पवद्विकल्पनारूपं द्वैतरूपेण मन एवेत्युक्तम् । तत्र किं प्रमाणमित्यन्वयव्यतिरेकलक्षणमनुमानमाह । कथम्— | रज्जुमें सर्पके समान विकल्पनारूप यह मन ही द्वैतरूपसे स्थित है—ऐसा पहले कहा गया । इसमें प्रमाण क्या है ? इसके लिये अन्वयव्यतिरेकरूप अनुमान प्रमाण कहा जाता है; सो किस प्रकार— |
मनोदृश्यमिदं द्वैतं यत्किंचित्सचराचरम् ।
मनसो ह्यमनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते ॥ ३१ ॥
यह जो कुछ चराचर द्वैत है सब मनका दृश्य है, क्योंकि मनका अमनीभाव ( संकल्पशून्यत्व ) हो जानेपर द्वैतकी उपलब्धि नहीं होती ॥ ३१ ॥
| तेन हि मनसा विकल्प्यमानेन दृश्यं मनोदृश्यमिदं द्वैतं सर्वं मन इति प्रतिज्ञा । तद्भावे | उस विकल्पित होनेवाले मनद्वारा दिखायी देने योग्य यह सम्पूर्ण द्वैत मन ही है—यह प्रतिज्ञा है, क्योंकि उसके वर्तमान रहनेपर यह भी |
| १५६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| भावात्तदभावेऽभावात् । मनसो ह्यमनीभावे निरोधे विवेकदर्शनाभ्यासवैराग्याभ्यां रज्ज्वामिव सर्पे लयं गते वा सुषुप्ते द्वैतं नैवोपलभ्यत इत्यभावात्सिद्धं द्वैतस्यासत्त्वमित्यर्थः ॥ ३१ ॥ | वर्तमान रहता है तथा उसका अभाव हो जानेपर इसका भी अभाव हो जाता है । मनका अमनीभाव—निरोध अर्थात् विवेकदृष्टिके अभ्यास और वैराग्यद्वारा रज्जुमें सर्पके समान लय हो जानेपर, अथवा सुषुप्ति-अवस्थामें द्वैतकी उपलब्धि नहीं होती । इस प्रकार अभाव हो जानेके कारण द्वैतकी असत्ता सिद्ध ही है—यह इसका तात्पर्य है॥३१॥ |
तत्त्वबोधसे अमनीभाव
| कथं पुनरमनीभावः ? इति उच्यते— | किन्तु यह अमनीभाव होता किस प्रकार है ? इस विषयमें कहा जाता है— |
आत्मसत्यानुबोधेन न सङ्कल्पयते यदा ।
अमनस्तां तदा याति ग्राह्याभावे तदग्रहम् ॥ ३२ ॥
जिस समय आत्मसत्यकी उपलब्धि होनेपर मन संकल्प नहीं करता उस समय वह अमनीभावको प्राप्त हो जाता है; उस अवस्थामें ग्राह्यका अभाव हो जानेके कारण वह ग्रहण करनेके विकल्पसे रहित हो जाता है ॥ ३२ ॥
| आत्मैव सत्यमात्मसत्यं मृत्तिकावत् “वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्” (छा० उ० ६।१।४) इति श्रुतेः । तस्य शास्त्राचार्योपदेश- | “[घटादि] वाणीसे आरम्भ होनेवाला विकार नाममात्र है, मृत्तिका ही सत्य है” इस श्रुतिके अनुसार मृत्तिकाके समान आत्मा ही सत्य है । उस आत्म-सत्यका शास्त्र और आचार्यके उपदेशके अनन्तर बोध |
| शां० भा० ] | अद्वैतप्रकरण | १५७ |
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| मन्यववोधः आत्मसत्यानुवोधः । तेन सङ्कल्प्याभावतया न सङ्कल्पयते, दाह्याभावे ज्वलनमिवाग्नेः, यदा यस्मिन्काले तदा तस्मिन्कालेऽमनस्ताममनोभावं याति; ग्राह्याभावे तन्मनोऽग्रहं ग्रहणविकल्पनावर्जितमित्यर्थः ३२ | होना आत्मसत्यानुबोध है । उसके कारण सङ्कल्पयोग्य वस्तुका अभाव हो जानेसे, दाह्य वस्तुका अभाव हो जानेपर अग्निके दाहकत्वके अभावके समान, जिस समय चित्त सङ्कल्प नहीं करता उस समय वह अमनस्कता अर्थात् अमनीभावको प्राप्त हो जाता है । ग्राह्य वस्तुका अभाव हो जानेसे वह मन अग्रह अर्थात् ग्रहण-विकल्पनासे रहित हो जाता है ॥३२॥ |
आत्मज्ञान किसे होता है ?
| यद्यसदिदं द्वैतं केन स्वमजमात्मतत्त्वं विबुध्यते ? इति उच्यते— | यदि यह सम्पूर्ण द्वैत असत्य है तो प्रकृत सत्य आत्मतत्त्वका ज्ञान किसे होता है ? इसपर कहते हैं— |
अकल्पकमजं ज्ञानं ज्ञेयाभिन्नं प्रचक्षते ।
ब्रह्मज्ञेयमजं नित्यमजेनाजं विबुध्यते ॥ ३३ ॥
उस सर्वकल्पनाशून्य अजन्मा ज्ञानको विवेकीलोग ज्ञेय ब्रह्मसे अभिन्न बतलाते हैं ? ब्रह्म जिसका विषय है वह ज्ञान अजन्मा और नित्य है । उस अजन्मा ज्ञानसे अजन्मा आत्मतत्त्व स्वयं ही जाना जाता है ॥३३॥
| अकल्पकं सर्वकल्पनावर्जितमत एवाजं ज्ञानं ज्ञप्तिमात्रं ज्ञेयेन परमार्थसता ब्रह्मणाभिन्नं | अकल्पक—सम्पूर्ण कल्पनाओंसे रहित अतएव अजन्मा अर्थात् ज्ञप्तिमात्र ज्ञानको ब्रह्मवेत्ता लोग ज्ञेय यानी परमार्थसत्स्वरूप ब्रह्मसे |
१५८ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
| प्रचक्षते कथयन्ति ब्रह्मविदः। न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽग्न्युष्णवत् "विज्ञानमानन्दं ब्रह्म" (बृ० उ० ३ । ९ । २८) "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" (तै० उ० २ । १) इत्यादि-श्रुतिभ्यः । | अभिन्न बतलाते हैं। अग्निकी उष्णता-के समान विज्ञाताके ज्ञानका कभी लोप नहीं होता । "ब्रह्म विज्ञान और आनन्दस्वरूप है" "ब्रह्म सत्य ज्ञान और अनन्त है" इत्यादि श्रुतियोंसे यही बात प्रमाणित होती है । |
| तस्यैव विशेषणं ब्रह्म ज्ञेयं यस्य स्वस्य तदिदं ब्रह्मज्ञेय-मौष्ण्यस्येवाग्निवदभिन्नम् । तेना-त्मस्वरूपेणाजेन ज्ञानेनाजं ज्ञेय-मात्मतत्त्वं स्वयमेव विबुध्यते-ऽवगच्छति । नित्यप्रकाशस्वरूप इव सविता नित्यविज्ञानैकरस-घनत्वान्न ज्ञानान्तरमपेक्षत इत्यर्थः ॥ ३३ ॥ | उस (ज्ञान) के ही विशेषण बतलाते हैं—'ब्रह्मज्ञेयम्' अर्थात् ब्रह्म जिसका ज्ञेय है वह ज्ञान अग्नि-से उष्णताके समान ब्रह्मसे अभिन्न है । उस आत्मस्वरूप अजन्मा ज्ञानसे अजन्मा ज्ञेयरूप आत्मतत्त्व स्वयं ही जाना जाता है । तात्पर्य यह है कि नित्यप्रकाशस्वरूप सूर्यके समान नित्यविज्ञानैकरसघनरूप होनेके कारण वह किसी अन्य ज्ञानकी अपेक्षा नहीं करता ॥ ३३ ॥ |
शान्तवृत्तिका स्वरूप
| आत्मसत्यानुबोधेन सङ्कल्पम-कुर्वद्वाह्यविषयाभावे निरिन्ध-नाग्निवत्प्रशान्तं निगृहीतं निरुद्धं | आत्मसत्यकी उपलब्धि होनेसे संकल्प न करता हुआ चित्त, बाह्य-विषयका अभाव हो जानेसे, इन्धन-रहित अग्निके समान शान्त होकर निगृहीत अर्थात् निरुद्ध हो जाता |
शां० भा० ] • अद्वैतप्रकरण १५९
| मनो भवतीत्युक्तम्। एवं च मनसो ह्यमनीभावे द्वैताभावश्चोक्तः। तस्यैवम्— | है—ऐसा कहा गया। इस प्रकार मनका अमनीभाव हो जानेपर द्वैतका भी अभाव बतलाया गया। उस इस प्रकार— |
निगृहीतस्य मनसो निर्विकल्पस्य धीमतः ।
प्रचारः स तु विज्ञेयः सुषुप्तेऽन्यो न तत्समः ॥ ३४ ॥
निगृहीत, निर्विकल्प और विवेक सम्पन्न चित्तका जो व्यापार है वह विशेषरूपसे ज्ञातव्य है। सुषुप्ति-अवस्था में जो चित्तकी वृत्ति है वह अन्य प्रकारकी है, वह उस (निरुद्धावस्था) के समान नहीं है ॥ ३४ ॥
| निगृहीतस्य निरुद्धस्य मनसो निर्विकल्पस्य सर्वकल्पनावर्जितस्य धीमतो विवेकवतः प्रचारो यः स तु प्रचारो विशेषेण ज्ञेयो योगिभिः। | निगृहीत—रोके हुए, निर्विकल्प—सब प्रकारकी कल्पनाओंसे रहित और धीमान्—विवेकसम्पन्न चित्तका जो प्रचार—व्यापार है, योगियोंको उसका वह व्यापार विशेषरूपसे जानना चाहिये। | | ननु सर्वप्रत्ययाभावे यादृशः सुषुप्तस्थस्य मनसः प्रचारस्तादृश एव निरुद्धस्यापि प्रत्ययाभावाविशेषात्किं तत्र विज्ञेयमिति । | शंका—सब प्रकारकी प्रतीतियोंका अभाव हो जानेपर जैसा व्यापार सुषुप्तिस्थ चित्तका होता है वैसा ही निरुद्धका भी होगा, क्योंकि प्रतीति-का अभाव दोनों ही अवस्थाओंमें समान है। उसमें विशेषरूपसे जाननेयोग्य कौन-सी बात है ? | | अत्रोच्यते—नैवम्; यस्मात् सुषुप्तेऽन्यः प्रचारोऽविद्यामोहतमोग्रस्तस्यान्तर्लीनानेकानर्थ- | समाधान—इस विषयमें हमारा कहना है कि ऐसी बात नहीं है, क्योंकि सुषुप्तिमें अविद्या-मोहरूप अन्धकारसे ग्रस्त हुए तथा जिसके |
| १६० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| प्रवृत्तिबीजवासनावतो मनस | भीतर अनेकों अनर्थ-प्रवृत्तिकी बीज- |
| भूत वासनाएँ लीन हैं उस मनका | |
| आत्मसत्यानुबोधहुताशविप्लुष्टा- | व्यापार दूसरे प्रकारका है और |
| आत्मसत्यके बोधरूप अग्निसे जिसकी | |
| विद्यानर्थप्रवृत्तिबीजस्य निरुद्ध- | अविद्यारूपी अनर्थ-प्रवृत्तिका बीज |
| दग्ध हो गया है तथा जिसके सब | |
| स्यान्य एव प्रशान्तसर्वक्लेशरजसः | प्रकारके क्लेशरूप दोष शान्त हो |
| गये हैं उस निरुद्ध चित्तका स्वतन्त्र | |
| स्वतन्त्रः प्रचारः । अतो न | प्रचार दूसरे ही प्रकारका है । अतः |
| वह उसके समान नहीं है। इसलिये | |
| तत्समः । तस्माद्युक्तः स विज्ञातु- | तात्पर्य यह है कि उसका ज्ञान |
| मित्यभिप्रायः ॥ ३४ ॥ | अवश्य प्राप्त करना चाहिये ॥३४॥ |
सुषुप्ति और समाधिका भेद
| प्रचारभेदे हेतुमाह— | उन दोनोंके प्रचारभेदमें हेतु बतलाते हैं— |
लीयते हि सुषुप्ते तन्निगृहीतं न लीयते ।
तदेव निर्भयं ब्रह्म ज्ञानालोकं समन्ततः ॥ ३५ ॥
सुषुप्ति-अवस्थामें मन [अविद्यामें] लीन हो जाता है, किन्तु निरुद्ध होनेपर वह उसमें लीन नहीं होता । उस समय तो सब ओरसे चित्प्रकाशमय निर्भय ब्रह्म ही रहता है ॥ ३५ ॥
| लीयते सुषुप्तौ हि यस्मात्सर्वा- | क्योंकि सुषुप्तिमें मन अविद्यादि |
| भिरविद्यादिप्रत्ययबीजवासनाभिः | सम्पूर्ण प्रतीतियोंकी बीजभूता |
| सह तमोरूपमविशेषरूपं बीज- | वासनाओंके सहित तमःस्वभाव |
| भावमापद्यते तद्विवेकाविज्ञानपूर्वकं | अविशेषरूप बीजभावको प्राप्त हो जाता है और उसके विवेक ज्ञान- |
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १६१
| निरुद्धं निगृहीतं सन्न लीयते तमोबीजभावं नापद्यते। तस्माद्युक्तः प्रचारभेदः सुषुप्तस्य समाहितस्य मनसः । | पूर्वक निरुद्ध किया जानेपर लीन नहीं होता, अर्थात् अज्ञानरूप बीजभावको प्राप्त नहीं होता । अतः सुषुप्त और समाहित चित्तका प्रचारभेद ठीक ही है । |
| यदा ग्राह्यग्राहकाविद्याकृतमलद्वयवर्जितं तदा परमद्वयं ब्रह्मैव तत्संवृत्तमित्यतस्तदेव निर्भयं द्वैतग्रहणस्य भयनिमित्तस्याभावात् । शान्तमभयं ब्रह्म, यद्विद्वान्न बिभेति कुतश्चन । | जिस समय चित्त ग्राह्य-ग्राहकरूप अविद्यासे होनेवाले दोनों प्रकारके मलोंसे रहित हो जाता है उस समय वह परम अद्वितीय ब्रह्मरूप ही हो जाता है। अतः द्वैतग्रहणरूप भयके कारणका अभाव हो जानेसे [ उस अवस्था में ] वही निर्भय होता है । ब्रह्म शान्त और अभयपद है, जिसे जान लेनेपर पुरुष किसीसे नहीं डरता । |
| तदेव विशेष्यते ज्ञप्तिर्ज्ञानमात्मस्वभावचैतन्यं तदेव ज्ञानमालोकः प्रकाशो यस्य तद्ब्रह्म ज्ञानालोकं विज्ञानैकरसघनमित्यर्थः । समन्ततः समन्तात्सर्वतो व्योमवन्नैरन्तर्येण व्यापकमित्यर्थः ॥ ३५ ॥ | उसीका विशेषण बतला रहे हैं—ज्ञानका अर्थ ज्ञप्ति अर्थात् आत्मस्वरूप चैतन्य है; वह ज्ञान ही जिसका आलोक यानी प्रकाश है वह ब्रह्म ज्ञानालोक अर्थात् विज्ञानैकरसस्वरूप है । समन्ततः-सब ओर अर्थात् आकाशके समान निरन्तरतासे सब ओर व्यापक है ॥ ३५ ॥ |
ब्रह्मका स्वरूप
अजमनिद्रमस्वप्नमनामकमरूपकम् ।
सकृद्विभातं सर्वज्ञं नोपचारः कथंचन ॥ ३६ ॥
| १६२ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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वह ब्रह्म जन्मरहित, [ अज्ञानरूप ] निद्रारहित, स्वप्नशून्य, नाम-रूपसे रहित, नित्य प्रकाशस्वरूप और सर्वज्ञ है; उसमें किसी प्रकारका कर्त्तव्य नहीं है ॥ ३६ ॥
| जन्मनिमित्ताभावात्सबाह्याभ्यन्तरमजम् । अविद्यानिमित्तं हि जन्म रज्जुसर्पवदित्यवोचाम। सा चाविद्यात्मसत्यानुबोधेन निरुद्धा यतोऽजमत एवानिद्रम् । अविद्यालक्षणानादिर्माया निद्रा । स्वापात्प्रबुद्धोऽद्वयस्वरूपेणात्मनातः अस्वप्नम् । अप्रबोधकृते ह्यस्य नामरूपे । प्रबोधाच्च ते रज्जुसर्पवद्विनष्टे इति न नाम्नाभिधीयते ब्रह्म रूप्यते वा न केनचित्प्रकारेणेत्यनामकमरूपकं च तत् । "यतो वाचो निवर्तन्ते" (तै० उ० २।४।१) इत्यादिश्रुतेः। | जन्मके कारणका अभाव होनेसे ब्रह्म बाह्याभ्यन्तरवर्ती और अजन्मा है। रज्जुमें सर्पके समान जीवका जन्म अविद्याके कारण है—ऐसा हम पहले कह चुके हैं; क्योंकि आत्मसत्यका अनुभव होनेसे उस अविद्याका निरोध हो गया है; इसलिये ब्रह्म अजन्मा है और इसीसे अनिद्र भी है। यहाँ अविद्यारूपा अनादिमाया ही निद्रा है। अपने अद्वयस्वरूपसे वह स्वप्नसे जगा हुआ है; इसलिये अस्वप्न है। उसके नामरूप भी अज्ञानके ही कारण हैं। ज्ञान होनेपर वे रज्जुमें प्रतीत होनेवाले सर्पके समान नष्ट हो जाते हैं। अतः ब्रह्म किसी नामद्वारा कथन नहीं किया जाता और न किसी प्रकार उसका रूप ही बतलाया जाता है, इसीलिये वह अनाम और अरूप है; जैसा कि "जहाँसे वाणी लौट आती है" इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध होता है । |
| किं च सकृद्विभातं सदैव विभातं सदा भारूपमग्रहणान्यथाग्रहणाविर्भावतिरोभाववर्जित- | यही नहीं; वह अग्रहण, अन्यथाग्रहण तथा आविर्भाव-तिरोभावसे रहित होनेके कारण सकृद्विभात—सदा ही भासनेवाला अर्थात् नित्य- |
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १६३
| त्वात् । ग्रहणाग्रहणे हि राज्यहनी तमश्चाविद्यालक्षणं सदाप्रभातत्त्वे कारणम् । तदभावान्नित्यचैतन्यभारूपत्वाच्च युक्तं सकृद्विभातमिति । अत एव सर्वं च तज्ज्ञस्वरूपं चेति सर्वज्ञम् । नेह ब्रह्मण्येवंविध उपचारणमुपचारः कर्तव्यः । यथान्येषाम आत्मस्वरूपव्यतिरेकेण समाधानाद्युपचारः । नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावत्वाद्ब्रह्मणः कथंचन न कथंचिदपि कर्तव्यसंभवोऽविद्यानाश इत्यर्थः ॥ ३६ ॥ | प्रकाशस्वरूप है । ग्रहण और अग्रहण ही रात्रि और दिन हैं तथा अविद्यारूप अन्धकार ही सर्वदा ब्रह्मके प्रकाशित न होनेमें कारण है । उसका अभाव होनेसे और नित्यचैतन्यस्वरूप होनेसे ब्रह्मका नित्यप्रकाशस्वरूप होना ठीक ही है। अतः सर्व और ज्ञप्तिरूप होनेसे वह सर्वज्ञ है । इस प्रकारके ब्रह्ममें कोई उपचार यानी कर्तव्य नहीं है, जिस प्रकार कि दूसरोंको आत्मस्वरूपसे भिन्न समाधि आदि कर्तव्य हैं । तात्पर्य यह है कि ब्रह्म नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव है; इसलिये अविद्याका नाश हो जानेपर विद्वान्को कुछ भी कर्तव्य रहना सम्भव नहीं है ॥ ३६ ॥ |
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| अनामकत्वाद्युक्तार्थसिद्धये हेतुमाह— | अनामकत्व आदि उपर्युक्त अर्थकी सिद्धिके लिये कारण बतलाते हैं— |
सर्वाभिलापविगतः सर्वचिन्तासमुत्थितः ।
सुप्रशान्तः सकृज्ज्योतिः समाधिरचलोऽभयः ॥ ३७ ॥
वह सब प्रकारके वाग्व्यापारसे रहित, सब प्रकारके चिन्तन ( अन्तःकरणके व्यापार ) से ऊपर, अत्यन्त शान्त, नित्यप्रकाश, समाधिस्वरूप, अचल और निर्भय है ॥ ३७ ॥
| १६४ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| अभिलप्यतेऽनेनेत्यभिलापो | जिसके द्वारा शब्दोच्चारण किया जाता है वह 'अभिलाप' अर्थात् 'वाक्' है, जो सब प्रकारके शब्दोच्चारणका साधन है, उससे रहित । यहाँ वागिन्द्रिय उपलक्षणके लिये है, अतः तात्पर्य यह है कि वह सब प्रकारकी बाह्य इन्द्रियोंसे रहित है । |
| वाक्करणं सर्वप्रकारस्याभिधानस्य, | |
| तस्माद्विगतः। वागत्रोपलक्षणार्था, | |
| सर्वबाह्यकरणवर्जित इत्येतत् । | |
| तथा सर्वचिन्तासमुत्थितः । | तथा सब प्रकारकी चिन्तासे उठा हुआ है । जिससे चिन्तन किया जाता है वह बुद्धि ही चिन्ता है, उससे उठा हुआ है अर्थात् अन्तःकरणसे रहित है; जैसा कि “प्राणरहित, मनोरहित और शुद्ध है तथा पर अक्षरसे भी पर है” इत्यादि श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है । |
| चिन्त्यतेऽनयेति चिन्ता बुद्धि- | |
| स्तस्याः समुत्थितोऽन्तःकरण- | |
| वर्जित इत्यर्थः “अप्राणो ह्यमनाः | |
| शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः” ( मु० | |
| उ० २ । १ । २) इत्यादिश्रुतेः । | |
| यस्मात्सर्वविषयवर्जितोऽतः | क्योंकि वह सम्पूर्ण विषयोंसे रहित है इसलिये अत्यन्त शान्त है, सकृज्ज्योति अर्थात् आत्मचैतन्यरूपसे सदा ही प्रकाशस्वरूप है, समाधिके कारणसे होनेवाली प्रज्ञासे उपलब्ध होनेके कारण समाधि है, अथवा इसमें चित्त समाहित किया जाता है इसलिये इसे समाधि कहते हैं, अचल अर्थात् अविकारी है और इसीसे विकारका अभाव होनेके कारण ही अभय है ॥ ३७ ॥ |
| सुप्रशान्तः, सकृज्ज्योतिः सदैव- | |
| ज्योतिरात्मचैतन्यस्वरूपेण, | |
| समाधिः समाधिनिमित्तप्रज्ञाव- | |
| गम्यत्वात्, समाधीयतेऽस्मिन्निति | |
| वा समाधिः, अचलोऽविक्रियः, | |
| अत एवाभयो विक्रियाभावात् ३७ |
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १६५
| यस्माद्ब्रह्मैव समाधिरचलोऽभय इत्युक्तमतो— | क्योंकि ब्रह्म ही 'समाधिस्वरूप, अचल और अभय है' ऐसा कहा गया है, इसलिये— |
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ग्रहो न तत्र नोत्सर्गश्चिन्ता यत्र न विद्यते ।
आत्मसंस्थं तदा ज्ञानमजाति समतां गतम् ॥ ३८ ॥
जिस (ब्रह्मपद) में किसी प्रकारका चिन्तन नहीं है उसमें किसी तरहका ग्रहण और त्याग भी नहीं है। उस अवस्थामें आत्मनिष्ठ ज्ञान जन्मरहित और समताको प्राप्त हुआ रहता है ॥ ३८ ॥
| न तत्र तस्मिन्ब्रह्मणि ग्रहो ग्रहणमुपादानम्, नोत्सर्ग उत्सर्जनं हानं वा विद्यते । यत्र हि विक्रिया तद्विषयत्वं वा तत्र हानोपादाने स्यातां न तद्द्वयमिह ब्रह्मणि संभवति । विकारहेतोरन्यस्याभावान्निरवयवत्वाच्च । अतो न तत्र हानोपादाने इत्यर्थः। चिन्ता यत्र न विद्यते । सर्वप्रकारैव चिन्ता न संभवति यत्रामनस्त्वात्कुतस्तत्र हानोपादाने इत्यर्थः । | वहाँ—उस ब्रह्ममें न तो ग्रह—ग्रहण यानी उपादान है और न उत्सर्ग—उत्सर्जन अर्थात् त्याग ही है । जहाँ विकार अथवा विकारकी विषयता (विकृत होनेकी योग्यता) होती है वहीं ग्रहण और त्याग भी रहते हैं; किन्तु यहाँ ब्रह्ममें उन दोनोंहीकी सम्भावना नहीं है, क्योंकि उसमें विकारका हेतुभूत कोई अन्य पदार्थ है नहीं और वह स्वयं निरवयव है। इसलिये तात्पर्य यह है कि उसमें ग्रहण और त्याग भी सम्भव नहीं हैं। जहाँ चिन्ता नहीं है अर्थात् मनोरहित होनेके कारण जिसमें किसी प्रकारकी चिन्ता सम्भव नहीं है वहाँ त्याग और ग्रहण कैसे रह सकते हैं ? |
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| १६६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| यदैवात्मसत्यानुबोधो जातस्तदैवात्मसंस्थं विषयाभावादग्न्युष्णवदात्मन्येव स्थितं ज्ञानम् ; अजाति जातिवर्जितम् , समतां गतं परं साम्यमापन्नं भवति । | जिस समय भी आत्मसत्यका बोध होता है उसी समय आत्मसंस्थ अर्थात् विषयका अभाव होनेके कारण अग्निकी उष्णताके समान आत्मामें ही स्थित ज्ञान अजाति—जन्मरहित और समताको प्राप्त हो जाता है । |
| यदादौ प्रतिज्ञातमतो वक्ष्याम्यकार्पण्यमजाति समतां गतमितीदं तदुपपत्तितः शास्त्रतथोक्तमुपसंह्रियते, अजाति समतां गतमिति। एतस्मादात्मसत्यानुबोधात्कार्पण्यविषयमन्यत् | पहले (इस प्रकरणके दूसरे श्लोकमें) जो प्रतिज्ञा की थी कि 'इसलिये मैं समान भावको प्राप्त, अजन्मा अकृपणताका वर्णन करूँगा' उस पूर्वकथनका ही यहाँ 'अजाति समतां गतम्' ऐसा कहकर युक्ति और शास्त्रद्वारा उपसंहार किया गया है । "हे गार्गि ! जो पुरुष इस अक्षर ब्रह्मको बिना जाने ही इस लोकसे चला जाता है वह कृपण है" इस श्रुतिके अनुसार कृपणताका विषय तो इस आत्मसत्यके बोधसे भिन्न ही है । तात्पर्य यह है कि इस तत्त्वको प्राप्त कर लेनेपर तो हर कोई कृतकृत्य ब्राह्मण (ब्रह्मनिष्ठ) हो जाता है ॥ ३८॥ |
| "यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्माल्लोकात्प्रैति स कृपणः" (बृ० उ० ३ । ८ । १०) इति श्रुतेः । प्राप्यैतत्सर्वः कृतकृत्यो ब्राह्मणो भवतीत्यभिप्रायः॥३८॥ |
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १६७
अस्पर्शयोगकी दुर्गमता
| यद्यपीदमित्थं परमार्थतत्त्वम् | यद्यपि यह परमार्थ तत्त्व ऐसा है [तथापि]— |
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अस्पर्शयोगो वै नाम दुर्दर्शः सर्वयोगिभिः ।
योगिनो बिभ्यति ह्यस्मादभये भयदर्शिनः ॥ ३९ ॥
[ सब प्रकारके स्पर्शसे रहित ] यह अस्पर्शयोग निश्चय ही योगियोंके लिये कठिनतासे दिखायी देनेवाला है । इस अभय पदमें भय देखनेवाले योगीलोग इससे भय मानते हैं ॥ ३९ ॥
| अस्पर्शयोगो नामार्यं सर्वसंबन्धाख्यस्पर्शवर्जितत्वादस्पर्शयोगो नाम वै स्मर्यते प्रसिद्धमुपनिषत्सु । दुःखेन दृश्यत इति दुर्दर्शः सर्वयोगिभिः वेदान्तविहितविज्ञानरहितैः सर्वयोगिभिः । आत्मसत्यानुबोधायासल्लभ्य एवेत्यर्थः । | यह अस्पर्शयोग नामवाला है अर्थात् सर्व-सम्बन्धरूप स्पर्शसे रहित होनेके कारण यह-उपनिषदोंमें अस्पर्श-योग नामसे प्रसिद्ध होकर स्मरण किया गया है। यह वेदान्त-विज्ञानसे रहित सभी योगियोंको कठिनतासे दिखायी देता है, इसलिये उनके लिये दुर्दर्श है । तात्पर्य यह है कि यह एकमात्र आत्मसत्यके अनुभव और [ श्रवण-मनन एवं प्राणायामादि ] आयासोंके द्वारा ही प्राप्त होने योग्य है । |
| योगिनो बिभ्यति ह्यस्मात्सर्वभयवर्जितादप्यात्मनाशरूपमिमं योगं मन्यमाना भयं कुर्वन्ति अभयेऽस्मिन्भयदर्शिनो भयनिमित्तात्मनाशदर्शनशीला अविवेकिन इत्यर्थः ॥ ३९ ॥ | क्योंकि सम्पूर्ण भयसे रहित होनेपर भी इस योगको आत्मनाशरूप माननेके कारण इस अभय योगमें भय देखनेवाले—भयका निमित्तभूत आत्मनाश देखनेवाले अर्थात् अविवेकी योगीलोग इससे भय मानते हैं ॥ ३९ ॥ |
१६८ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
अन्य योगियोंकी शान्ति मनोनिग्रहके अधीन है
| येषां पुनर्ब्रह्मस्वरूपव्यतिरेकेण रज्जुसर्पवत्कल्पितमेव मन इन्द्रियादि च न परमार्थतो विद्यते तेषां ब्रह्मस्वरूपाणामभयं मोक्षाख्या चाक्षया शान्तिः स्वभावत एव सिद्धा नान्यायत्ता नोपचारः कथंचनेत्यवोचाम । ये त्वतोऽन्ये योगिनो मार्गगा हीनमध्यमदृष्टयो मनोऽन्यदात्मव्यतिरिक्तात्मसंबन्धि पश्यन्ति तेषामात्मसत्यानुबोधरहितानाम् | जिनकी दृष्टिमें ब्रह्मस्वरूपसे अतिरिक्त मन और इन्द्रिय आदि रज्जुमें सर्पके समान कल्पित ही हैं—परमार्थतः हैं ही नहीं, उन ब्रह्मभूतोंकी निर्भयता और मोक्षसंज्ञक अक्षय शान्ति तो स्वभावसे ही सिद्ध है, किसी अन्यके अधीन नहीं है; जैसा कि 'उसके लिये कुछ भी कर्तव्य नहीं है' ऐसा हम पहले (छत्तीसवें श्लोकमें) कह चुके हैं। किन्तु जो इनसे अन्य परमार्थपथमें चलनेवाले हीन और मध्यम दृष्टिवाले योगी मनको आत्मासे भिन्न आत्माका सम्बन्धी मानते हैं, उन आत्मसत्यके बोधसे रहित— |
मनसो निग्रहायत्तमभयं सर्वयोगिनाम् ।
दुःखक्षयः प्रबोधश्चाप्यक्षया शान्तिरेव च ॥ ४० ॥
समस्त योगियोंके अभय, दुःखक्षय, प्रबोध और अक्षय शान्ति मनके निग्रहके ही अधीन हैं ॥ ४० ॥
| मनसो निग्रहायत्तमभयं सर्वेषां योगिनाम् । किं च दुःखक्षयोऽपि, न ह्यात्मसंबन्धिनि मनसि प्रचलिते दुःखक्षयोऽस्ति | समस्त योगियोंका अभय मनके निग्रहके अधीन है । यही नहीं, दुःखक्षय भी [ मनोनिग्रहके ही अधीन है ], क्योंकि आत्मासे सम्बन्ध रखनेवाले मनके चलायमान रहते हुए अविवेकी पुरुषोंका दुःख- |
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १६९
| अविवेकिनाम् । किं चात्मप्रबोधोऽपि मनोनिग्रहायत्त एव । तथाक्षयापि मोक्षाख्या शान्तिः तेषां मनोनिग्रहायत्तैव ॥४०॥ | क्षय नहीं हो सकता । इसके सिवा उनका आत्मज्ञान भी मनके निग्रहके ही अधीन है तथा मोक्षनाम्नी उनकी अक्षय शान्ति भी मनोनिग्रहके ही अधीन है ॥ ४० ॥ |
मनोनिग्रह धैर्यपूर्वक ही हो सकता है
उत्सेक उदधेर्यद्वत्कुशाग्रेणैकबिन्दुना ।
मनसो निग्रहस्तद्वद्भवेदपरिखेदतः ॥ ४१ ॥
जिस प्रकार [ उद्विग्नता छोड़कर ] कुशाके अग्रभागसे एक-एक बूँदद्वारा समुद्रको उलोचा जा सकता है उसी प्रकार सब प्रकारकी खिन्नताका त्याग कर देनेपर मनका निग्रह हो सकता है ॥ ४१ ॥
| मनोनिग्रहोऽपि तेषामुदधेः कुशाग्रेणैकबिन्दुना उत्सेचनेन शोषणव्यवसायवद्व्यवसायवतामनवस्रान्तःकरणानामनिर्वेदादपरिखेदतो भवतीत्यर्थः ॥४१॥ | कुशके अग्रभागसे एक-एक बूँदके द्वारा समुद्रके उत्सेचन अर्थात् सुखानेके प्रयत्नके समान अखिन्नचित्त और उद्यमशील रहनेवाले उन योगियोंके मनका निग्रह भी खेदशून्य रहनेसे ही होता है—यह इसका तात्पर्य है ॥ ४१ ॥ |
मनोनिग्रहके विघ्न
| किमपरिखिन्नव्यवसायमात्रमेव मनोनिग्रह उपायः ? न, इत्युच्यते । | तो क्या खेदरहित उद्योग ही मनोनिग्रहका उपाय है ? इसपर कहते हैं—'नहीं' |
| १७० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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उपायेन निगृह्णीयाद्विक्षिप्तं कामभोगयोः ।
सुप्रसन्नं लये चैव यथा कामो लयस्तथा ॥ ४२ ॥
काम्यविषय और भोगोंमें विक्षिप्त हुए चित्तका उपायपूर्वक निग्रह करे तथा लयावस्थामें अत्यन्त प्रसन्नताको प्राप्त हुए चित्तका भी संयम करे, क्योंकि जैसा [ अनर्थकारक ] काम है वैसा ही लय भी है ॥४२॥
| अपरिखिन्नव्यवसायवान्सन् वक्ष्यमाणेनोपायेन कामभोगविषयेषु विक्षिप्तं मनो निगृह्णीयान्निरुन्ध्यादात्मन्येवेत्यर्थः । किं च लीयतेऽस्मिन्निति सुषुप्तौ लयस्तस्मिँल्लये च सुप्रसन्नम् आयासवर्जितम् अपि इत्येतत्, निगृह्णीयादित्यनुवर्तते । | अथक उद्योगशील होकर आगे कहे जानेवाले उपायसे काम और भोगरूप विषयोंमें विक्षिप्त हुए चित्तका निग्रह करे, अर्थात् उसका आत्मामें ही निरोध करे । तथा, जिस अवस्थामें चित्त लीन हो जाता है उस सुषुप्तिका नाम लय है, उस लयावस्थामें अत्यन्त प्रसन्न अर्थात् आयासरहित स्थितिको प्राप्त हुए चित्तका भी निग्रह करे । यहाँ 'निगृह्णीयात्' इस पदकी अनुवृत्ति की जाती है। |
| सुप्रसन्नं चेत्कस्मान्निगृह्यत इत्युच्यते । यस्माद्यथा कामोऽनर्थहेतुस्तथा लयोऽपि । अतः कामविषयस्य मनसो निग्रहवल्लयादपि निरोद्धव्यमित्यर्थः ४२ | यदि उस अवस्थामें चित्त अत्यन्त प्रसन्न हो जाता है तो उसका निग्रह क्यों करना चाहिये ? इसपर कहा जाता है-क्योंकि जिस प्रकार काम अनर्थका कारण है उसी प्रकार लय भी है; इसलिये तात्पर्य यह है कि कामविषयक मनके निग्रहके समान उसका लयसे भी निरोध करना चाहिये ॥ ४२ ॥ |
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १७१
| कः स उपायः ? इत्युच्यते— | वह उपाय क्या है ? इस विषयमें कहा जाता है— |
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दुःखं सर्वमनुस्मृत्य कामभोगान्निवर्तयेत् ।
अजं सर्वमनुस्मृत्य जातं नैव तु पश्यति ॥ ४३ ॥
सम्पूर्ण द्वैत दुःखरूप है—ऐसा निरन्तर स्मरण करते हुए चित्तको कामजनित भोगोंसे हटाये। इस प्रकार निरन्तर सब वस्तुओंको अजन्मा ब्रह्मरूप स्मरण करता हुआ फिर कोई जात पदार्थ नहीं देखता ॥ ४३॥
| सर्वं द्वैतमविद्याविजृम्भितं दुःखमेवेत्यनुस्मृत्य कामभोगात्कामनिमित्तो भोग इच्छाविषयस्तस्माद्विप्रसृतं मनो निवर्तयेद्वैराग्यभावनयेत्यर्थः। अजं ब्रह्म सर्वमित्येतच्छास्त्राचार्योपदेशतोऽनुस्मृत्य तद्विपरीतं द्वैतजातं नैव तु पश्यति, अभावात् ॥४३॥ | अविद्यासे प्रतीत होनेवाला सारा द्वैत दुःखरूप ही है—ऐसा निरन्तर स्मरण करता हुआ कामभोगसे—कामनानिमित्तक भोगसे अर्थात् इच्छाजनित विषयसे उसमें फैले हुए चित्तको वैराग्यभावनाद्वारा निवृत्त करे—यह इसका तात्पर्य है। फिर ‘यह सब अजन्मा ब्रह्म ही है’ ऐसा शास्त्र और आचार्यके उपदेशानुसार निरन्तर स्मरण करता हुआ उससे विपरीत द्वैतजातको—उसका अभाव हो जानेके कारण—वह नहीं देखता ॥ ४३ ॥ |
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लये संबोधयेच्चित्तं विक्षिप्तं शमयेत्पुनः ।
सकषायं विजानीयात्समप्राप्तं न चालयेत् ॥ ४४ ॥
चित्त [ सुषुप्तिमें ] लीन होने लगे तो उसे आत्मविवेकमें नियुक्त करे, यदि विक्षिप्त हो जाय तो उसे पुनः शान्त करे और [ यदि इन दोनोंके बीचकी अवस्थामें रहे तो उसे ] सकषाय—रागयुक्त समझे। तथा साम्यावस्थाको प्राप्त हुए चित्तको चञ्चल न करे ॥ ४४ ॥
| १७२ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| एवमनेन ज्ञानाभ्यासवैराग्य- <br> द्वयोपायेन लये सुषुप्ते लीनं <br> संबोधयेन्मन आत्मविवेक- <br> दर्शनेन योजयेत् । चित्तं मन <br> इत्यनर्थान्तरम् । विक्षिप्तं च <br> कामभोगेषु शमयेत्पुनः । एवं <br> पुनः पुनरभ्यस्यतो लयातसंबोधितं <br> विषयेभ्यश्च व्यावर्तितं नापि <br> साम्यापन्नमन्तरालावस्थं सकषायं <br> सरागं बीजसंयुक्तं मन इति <br> विजानीयात् । ततोऽपि यत्नतः <br> साम्यमापादयेत् । यदा तु <br> सम्प्राप्तं भवति सम्प्राप्त्यभिमुखी- <br> भवतीत्यर्थः, ततस्तन्न विचाल- <br> येद्विषयाभिमुखं न कुर्यादि- <br> त्यर्थः ॥ ४४ ॥ | इस प्रकार ज्ञानाभ्यास और <br> वैराग्य—इन दो उपायोंसे, लय अर्थात् <br> सुषुप्तिमें लीन हुए चित्तको, सम्बोधित <br> अर्थात् आत्मविवेकदर्शनमें नियुक्त <br> करे । चित्त और मन—ये कोई भिन्न <br> पदार्थ नहीं हैं । तथा कामना और <br> भोगोंमें विक्षिप्त हुए, चित्तको पुनः <br> शान्त करे । इस प्रकार वारम्वार <br> अभ्यासद्वारा लयावस्थासे सम्बोधित <br> और विषयोंसे निवृत्त किया हुआ <br> चित्त जब अन्तरालावस्थामें स्थित <br> होकर समताको भी प्राप्त न हो <br> तो यह समझे कि इस समय <br> मन सकषाय—रागयुक्त अर्थात् बीजा- <br> वस्थासंयुक्त है । उस अवस्थासे भी <br> उसे यत्नपूर्वक साम्यावस्थामें स्थित <br> करे । किन्तु जिस समय वह <br> समताको प्राप्त हो अर्थात् साम्या- <br> वस्थाप्राप्तिके अभिमुख हो उस समय <br> उस अवस्थामें उसे विचलित न करे; <br> अर्थात् विषयाभिमुख न करे ॥४४॥ |
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नास्वादयेत्सुखं तत्र निःसङ्गः प्रज्ञया भवेत् ।
निश्चलं निश्चरच्चित्तमेकीकुर्यात्प्रयत्नतः ॥ ४५ ॥
उस साम्यावस्थामें [ प्राप्त होनेवाले ] सुखका आस्वादन न करे, बल्कि विवेकवती बुद्धिके द्वारा उससे निःसंग रहे । फिर यदि चित्त बाहर निकलने लगे तो उसे प्रयत्नपूर्वक निश्चल और एकाग्र करे ॥ ४५ ॥
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १७३
| समाधित्सतो योगिनो यत्सुखं जायते तन्नास्वादयेत्, तत्र न रज्येतेत्यर्थः । कथं तर्हि ? निःसङ्गो निःस्पृहः प्रज्ञया विवेकबुद्ध्या यदुपलभ्यते सुखं तदविद्यापरिकल्पितं मृषैवेति विभावयेत् । ततोऽपि सुखरागान्निगृह्णीयादित्यर्थः । | समाधिकी इच्छावाले योगीको जो सुख प्राप्त होता है उसका आस्वादन न करे अर्थात् उसमें राग न करे । तो फिर कैसे रहे ? निःसङ्ग अर्थात् निःस्पृह होकर प्रज्ञा-विवेकवती बुद्धिसे ऐसी भावना करे कि यह जो कुछ सुख अनुभव हो रहा है वह अविद्यापरिकल्पित और मिथ्या ही है । तात्पर्य यह कि उस सुखके रागसे भी चित्तका निग्रह करे । |
| यदा पुनः सुखरागानिवृत्तं निश्चलस्वभावं सन्निश्चरद्बहिर्निर्गच्छद्भवति चित्तं ततस्ततो नियम्योक्तोपायेनात्मन्येवैकीकुर्यात्प्रयत्नतः । चित्स्वरूपसत्तामात्रमेवापादयेदित्यर्थः ॥ ४५ ॥ | जिस समय सुखके रागसे निवृत्त होकर निश्चलस्वभाव हुआ चित्त फिर बाहर निकलने लगे तब उसे उपर्युक्त उपायसे वहाँसे भी रोककर प्रयत्नपूर्वक आत्मामें एकाग्र करे । तात्पर्य यह है कि उसे चित्स्वरूप सत्तामात्र ही सम्पादित करे ॥४५॥ |
मन कब ब्रह्मरूप होता है ?
यदा न लीयते चित्तं न च विक्षिप्यते पुनः ।
अनिङ्गनमनाभासं निष्पन्नं ब्रह्म तत्तदा ॥ ४६ ॥
जिस समय चित्त सुषुप्तिमें लीन न हो और फिर विक्षिप्त भी न हो तथा निश्चल और विषयाभाससे रहित हो जाय उस समय वह ब्रह्म ही हो जाता है ॥ ४६ ॥