माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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| १४६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| ननु प्रज्ञावचनो मायाशब्दः। | शंका—'माया' शब्द तो प्रज्ञावाचक है [इसलिये इससे सृष्टिका मिथ्यात्व सिद्ध नहीं होता]। |
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| सत्यम्; इन्द्रियप्रज्ञाया अविद्यामयत्वेन मायात्वाभ्युपगमाददोषः। मायाभिरिन्द्रियप्रज्ञाभिः अविद्यारूपाभिरित्यर्थः, "अजायमानो बहुधा विजायते" इति श्रुतेः, तस्मान्माययैव जायते तु सः। तुशब्दोऽवधारणार्थः— माययैवेति। न ह्यजायमानत्वं बहुधा जन्म चैकत्र सम्भवति, अग्नाविव शैत्यमौष्ण्यं च। | समाधान—ठीक है, आविद्यक होनेके कारण इन्द्रियप्रज्ञाका मायात्व माना गया है; इसलिये उसमें कोई दोष नहीं है। अतः मायासे अर्थात् अविद्यारूप इन्द्रियप्रज्ञासे; जैसा कि "उत्पन्न न होकर भी अनेक प्रकार से उत्पन्न होता है" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। अतः वह मायासे ही उत्पन्न होता है। यहाँ 'तु' शब्द निश्चयार्थक है। अर्थात् मायासे ही [उत्पन्न होता है]। अग्निमें शीतलता और उष्णताके समान जन्म न लेना और अनेक प्रकारसे जन्म लेना एक ही वस्तुमें सम्भव नहीं है। |
| फलवत्त्वाच्चात्मैकत्वदर्शनमेव श्रुतिनिश्चितोऽर्थः "तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः" (ई०उ० ७) इत्यादिमन्त्रवर्णात् ; "मृत्योः स मृत्युमाप्नोति" (क० उ० २।१।१०) इति निन्दितत्वाच्च सृष्ट्यादिभेददृष्टेः ॥२४॥ | "उस अवस्थामें एकत्वका साक्षात्कार करनेवाले पुरुषको क्या मोह और क्या शोक हो सकता है?" इत्यादि श्रुतिके अनुसार फलयुक्त होनेके कारण तथा "[जो नानात्व देखता है] वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है" इस श्रुतिसे सृष्टि आदि भेददृष्टिकी निन्दा की जानेके कारण भी आत्मैकत्वदर्शन ही श्रुतिका निश्चित अर्थ है ॥ २४ ॥ |