भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 165

शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १४५


वोचाम पूर्वग्रन्थैः। तदेव श्रुत्यर्थोप्रतिपादन कर चुके हैं वही श्रुतिका
भवति नेतरत्कदाचिदपि ॥२३॥तात्पर्य हो सकता है; अन्य अर्थ कभी और किसी अवस्थामें नहीं हो सकता ॥२३॥
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कथं श्रुतिनिश्चयः ? इत्याह—यह श्रुतिका निश्चय किस प्रकार है ? सो बतलाते हैं—

नेह नानेति चाम्नायादिन्द्रो मायाभिरित्यपि ।

अजायमानो बहुधा मायया जायते तु सः ॥ २४ ॥

‘नेह नानास्ति किंचन’ ‘इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते’ तथा ‘अजायमानो बहुधा विजायते’ इन श्रुतिवाक्योंके अनुसार वह परमात्मा मायासे ही उत्पन्न होता है ॥ २४ ॥

यदि हि भूतत एव सृष्टिः स्यात्ततः सत्यमेव नाना वस्त्विति तदभावप्रदर्शनार्थमाम्नायो न स्यात् । अस्ति च “नेह नानाऽस्ति किंचन” (क० उ० २।१।११) इत्यादिराम्नायो द्वैतभावप्रतिषेधार्थः । तस्मादात्मैकत्वप्रतिपत्त्यर्था कल्पिता सृष्टिरभूतैव प्राणसंवादवत् । “इन्द्रो मायाभिः” (बृ० उ० २।५।१९) इत्यभूतार्थप्रतिपादकेन मायाशब्देन व्यपदेशात् ।यदि वास्तवमें ही सृष्टि हुई है तो नाना वस्तु सत्य ही हैं; ऐसी अवस्थामें उनका अभाव प्रदर्शित करनेके लिये कोई शास्त्र-वचन नहीं होना चाहिये था। किन्तु द्वैतभावका निषेध करनेके लिये “यहाँ नाना वस्तु कुछ नहीं है” इत्यादि शास्त्र-वचन है ही । अतः प्राणसंवादके समान आत्मैकत्वकी प्राप्तिके लिये कल्पना की हुई सृष्टि अयथार्थ ही है; क्योंकि “इन्द्र मायासे [अनेकरूप हो जाता है]” इस श्रुतिमें सृष्टिका, अयथार्थत्वप्रतिपादक ‘माया’ शब्दसे निर्देश किया गया है ।
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