भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १२९


पहले (उपनिषदोंके कर्मकाण्डमें) उत्पत्तिबोधक वाक्योंद्वारा जो जीव और परमात्माका पृथक्त्व बतलाया है वह भविष्यद्-वृत्तिसे गौण है, उसे मुख्य अर्थ मानना ठीक नहीं है ॥ १४ ॥

ननु श्रुत्यापि जीवपरमात्मनोः पृथक्त्वं यत्प्रागुत्पत्तेरुत्पत्त्यर्थोपनिषद्वाक्येभ्यः पूर्वं प्रकीर्तितं कर्मकाण्डे अनेकशः कामभेदत इदंकामोऽदःकाम इति; परश्च “स दाधार पृथिवीं द्याम्” (ऋ०सं० १०।१२१।१) इत्यादिमन्त्रवर्णैः; तत्र कथं कर्मज्ञानकाण्डवाक्यविरोधे ज्ञानकाण्डवाक्यार्थस्यैवैकत्वस्य सामञ्जस्यमवधार्यत इति ?**शंका—**जब श्रुतिने भी पहले—कर्मकाण्डमें उत्पत्ति-प्रतिपादक उपनिषद्-वाक्योंद्वारा 'इदंकामः' 'अदःकामः' आदि प्रकारसे [कर्मकाण्डमें भिन्न-भिन्न कामनाओंवाले कर्माधिकारी पुरुषके समान] अनेकों कामनाओंके भेदसे जीव और परमात्माका भेद प्रतिपादन किया है तथा परमात्माका “उसने पृथिवी और द्युलोकको धारण किया” इत्यादि मन्त्रवर्णोंसे पृथक् ही निर्देश किया है, तब इस प्रकार कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्डके वाक्योंमें विरोध उपस्थित होनेपर केवल ज्ञानकाण्डोक्त एकत्वका ही सामञ्जस्य (यथार्थत्व) किस प्रकार निश्चय किया जा सकता है ?
अत्रोच्यते—“यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते” (तै० उ० ३ । १) “यथाग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गाः” (बृ० उ० २ । १ । २०) “तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः” (तै० उ० २ । १ । २) “तदैक्षत” (छा० उ० ६ । २ । ३) “तत्तेजोऽसृजत” (छा० उ०**समाधान—**इस विषयमें हमारा कथन है कि “जहाँसे ये सब भूत उत्पन्न होते हैं” “जिस प्रकार अग्निसे नन्हीं-नन्हीं चिनगारियाँ [निकलती हैं]” “उसी इस आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ” “उसने ईक्षण किया” “उसने तेजको रचा”

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