माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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| १३० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० ] |
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| ६ । २ । ३) इत्याद्युत्पत्त्यर्थोपनि- | इत्यादि उत्पादक उपनिषद्वाक्योंसे |
| षद्वाक्येभ्यः प्राक्पृथक्त्वं कर्मकाण्डे | पहले कर्मकाण्डमें जो पृथक्त्वका |
| प्रकीर्तितं यत्तन्न परमार्थम् । किं | प्रतिपादन किया गया है वह |
| तर्हि ? गौणं महाकाशघटा- | परमार्थतः नहीं है। तो कैसा है ? |
| काशादिभेदवत् । यथौदनं | वह महाकाश और घटाकाशादिके |
| पचतीति भविष्यद्वृत्त्या तद्वत् । | भेदके समान गौण है और जिस |
| न हि भेदवाक्यानां कदाचिदपि | प्रकार भविष्यद्वृत्तिसे 'भात पकाता |
| मुख्यभेदार्थत्वमुपपद्यते । स्वाभा- | है'* ऐसा कहा जाता है उसीके |
| विकाविद्यावत्प्राणिभेददृष्ट्यनुवा- | समान है। आत्म-भेदवाक्योंका मुख्य |
| दित्वाद्रास्तभेदवाक्यानाम् । | भेदप्रतिपादकत्व कभी सम्भव नहीं |
| है; क्योंकि भेदवाक्य तो अज्ञानी | |
| जीवोंकी स्वाभाविक भेददृष्टिका ही | |
| अनुवाद करनेवाले हैं। | |
| इह चोपनिषत्सूत्पत्तिप्रलयादि- | यहाँ उपनिषदोंमें तो "तू वह |
| वाक्यैर्जीवपरमात्मनोरेकत्वमेव | है" "यह अन्य है और मैं अन्य |
| प्रतिपिपादयिषितम् "तत्त्वमसि" | हूँ—ऐसा जो जानता है वह |
| (छा० उ० ६ । ८–१६) "अन्योऽ- | नहीं जानता" इत्यादि श्रुतियोंके |
| सावन्योऽहमस्मीति न स वेद" | अनुसार उत्पत्ति-प्रलयादि-बोधक |
| (बृ० उ० १ । ४ । १०) | वाक्योंसे भी जीव और परमा- |
| इत्यादिभिः । अत उपनिषत्सु | त्माका एकत्व ही प्रतिपादन करना |
| एकत्वं श्रुत्या प्रतिपिपादयिषितं | इष्ट है। अतः उपनिषदोंमें श्रुतिको |
| भविष्यतीति भाविनीमेकत्ववृत्ति- | एकत्व ही प्रतिपादन करना इष्ट |
| माश्रित्य लोके भेददृष्ट्यनुवादो | होगा—इस भविष्यद्वृत्तिको आश्रय |
| गौण एवेत्यभिप्रायः । | करके लोकमें भेददृष्टिका अनुवाद |
| गौण ही है—यह इसका अभिप्राय है। |
* 'भात' उबले हुए चावलोंको कहते हैं; जो चावल पकाये जाते हैं उनकी संज्ञा 'भात' नहीं है। अतः इस वाक्यमें जो उनके लिये 'भात' शब्दका प्रयोग हुआ है वह भविष्यदृष्टिसे है।