भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण ११९


[आत्मनो व्यावहारिकबन्धमोक्षाद्युपपादनम्]
यथा द्रव्यगुणयोः । समवायो नित्यसम्बन्ध एवेति न वाच्यमिति चेत्तथा च समवायसम्बन्धवतां नित्यसम्बन्धप्रसङ्गात्पृथक्त्वानुपपत्तिः । अत्यन्तपृथक्त्वे च द्रव्यादीनां स्पर्शवदस्पर्शद्रव्ययोरिव षष्ठ्यर्थानुपपत्तिः ।सम्बन्ध बतलाना चाहिये, जैसा कि द्रव्य और गुणका है। और यदि कोई कहे कि समवाय तो नित्य सम्बन्ध ही है, इसलिये उसके साथ कोई सम्बन्ध बतलानेकी आवश्यकता नहीं है तो ऐसी अवस्थामें समवायसम्बन्धवालोंका नित्यसम्बन्ध होनेके कारण उनकी पृथक्ता सम्भव नहीं है। और यदि द्रव्यादिको परस्पर अत्यन्त भिन्न माना जाय तो जिस प्रकार स्पर्शवान् और स्पर्शहीन द्रव्योंमें परस्पर सम्बन्ध होना सम्भव नहीं है उसी प्रकार उसका सम्बन्ध ही नहीं हो सकता।
इच्छाद्युपजनापायवद्गुणवत्त्वे चात्मनोऽनित्यत्वप्रसङ्गः । देहफलादिवत्सावयवत्वं विक्रियावत्त्वं च देहादिवदेवेति दोषावपरिहार्यौ ।यदि आत्माको इच्छादि उत्पत्ति-विनाशशील गुणोंवाला माना जाय तो उसकी अनित्यताका प्रसंग उपस्थित हो जायगा। तथा उसके देह और फलादिके समान सावयवत्व एवं देहादिके समान ही विक्रियावत्त्व—ये दो दोष भी अपरिहार्य ही होंगे।
यथा त्वाकाशस्याविद्याध्यारोपितरजोधूममलवत्तादिदोषवत्त्वं तथात्मनोऽविद्याध्यारोपितबुद्ध्याद्युपाधिकृतसुखदुःखादिदोषवत्त्वे बन्धमोक्षादयो व्यावहारिका न विरुध्यन्ते । सर्ववादिभिरविद्या-जिस प्रकार कि आकाशका अविद्याध्यारोपित घटादिउपाधियोंके कारण ही धूलि, धूम और मलसे युक्त होना है उसी प्रकार आत्माका भी, अविद्यासे आरोपित बुद्धि आदि उपाधिके कारण सुख-दुःखादि दोषसे युक्त होनेपर, व्यावहारिक बन्ध, मोक्ष आदि होनेमें कोई विरोध नहीं है; क्योंकि सभी वादियोंने