भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 301 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 138
११८माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
ह्यत्यन्तभिन्ना एव द्रव्यात्स्यु-वे इच्छा आदि द्रव्यसे तथा आत्मासे अत्यन्त भिन्न ही हों तो ऐसा होनेपर तो द्रव्यके साथ उनका सम्बन्ध ही सिद्ध नहीं हो सकता।
रिच्छादयश्चात्मनस्तथा च सति
द्रव्येण तेषां सम्बन्धानुपपत्तिः ।
अयुतसिद्धानां समवायलक्षणःयदि कहो कि अयुतसिद्ध¹ पदार्थों- का समवाय-सम्बन्ध माननेमें विरोध नहीं है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं;* क्योंकि इच्छा आदि अनित्य धर्मोंसे नित्य आत्मा पूर्वसिद्ध होनेके कारण उनका परस्पर अयुतसिद्धत्व सम्भव नहीं है। यदि इच्छा आदि आत्माके साथ अयुतसिद्ध हों तो आत्मगत महत्त्वके समान उनकी भी नित्यता- का प्रसङ्ग उपस्थित हो जायगा । और यह बात इष्ट नहीं है, क्योंकि इससे आत्माके अनिर्मोक्षका प्रसङ्ग आ जाता है ।
संबन्धो न विरुध्यत इति चेत्,
न । इच्छादिभ्योऽनित्येभ्य
आत्मनो नित्यस्य पूर्वसिद्धत्वा-
न्नायुतसिद्धत्वोपपत्तिः। आत्मना-
युतसिद्धत्वे चेच्छादीनामात्म-
गतमहत्त्ववन्नित्यत्वप्रसङ्गः । स
चानिष्टः । आत्मनोऽनिर्मोक्ष-
प्रसङ्गात् ।
समवायस्य च द्रव्यादन्यत्वे सति द्रव्येण सम्बन्धान्तरं वाच्यंयदि समवाय द्रव्यसे भिन्न है तो द्रव्यके साथ उसका कोई अन्य

गुण एवं क्रिया आदि समवाय-सम्बन्धसे रहें। गुण—रूप, रस एवं गन्ध आदिको कहते हैं। कर्म—गमनादि क्रिया। सामान्य—जाति, मनुष्यत्व, पशुत्वादि। विशेष—परमाणुओंका परस्पर भेद करनेवाला धर्म, जिसके कारण विभिन्न प्रकारके परमाणुओंसे विभिन्न प्रकारका कार्य उत्पन्न होता है। समवाय—एक प्रकारका सम्बन्ध जैसा कि गुण एवं क्रिया आदिका द्रव्यके साथ है।

१. जो पदार्थ परस्पर मिलकर सिद्ध हुए हों।

* अयुतसिद्धत्वमें चार पक्ष हैं—१ अभिन्नकालमें होना; २ अभिन्न देशमें होना; ३ अभिन्न स्वभाववाले होना; ४ संयोग और वियोगकी अयोग्यतावाले होना। उनमेंसे प्रथम पक्षका खण्डन करते हैं—