माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशां० भा० ] अद्वैतप्रकरण ११७
[वैशेषिकमत-समीक्षा]
| ये त्वाहुर्वैशेषिकादय इच्छादय आत्मसमवायिन इति; तदप्यसत् । स्मृतिहेतूनां संस्काराणामप्रदेशवत्यात्मन्यसमवायात् । आत्ममनःसंयोगाच्च स्मृत्युत्पत्तेः स्मृतिनियमानुपपत्तिः । युगपद्वा सर्वस्मृत्युत्पत्तिप्रसङ्गः । | इसके सिवा वैशेषिकादि मतावलम्बी जो कहते हैं कि इच्छा आदि आत्माके धर्म हैं, सो उनका यह कथन भी ठीक नहीं है, क्योंकि स्मृतिके हेतुभूत संस्कारोंका प्रदेशहीन (निरवयव) आत्मासे समवाय सम्बन्ध नहीं हो सकता । यदि आत्मा और मनके संयोगसे स्मृतिकी उत्पत्ति मानी जाय तो स्मृतिका कोई नियम ही सम्भव नहीं है अथवा एक साथ ही सम्पूर्ण स्मृतियोंकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग उपस्थित हो जायगा । * |
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| [मन आदिभिः आत्मसंयोगानुपपत्तिः]<br><br>न च भिन्नजातीयानां स्पर्शादिहीनानामात्मनां मन आदिभिः संबन्धो युक्तः । न च द्रव्याद्रूपादयो गुणाः कर्मसामान्यविशेषसमवाया वा भिन्नाः सन्ति परेषाम् । यदि | इसके सिवा स्पर्शादिसे रहित भिन्नजातीय आत्माओंका मन आदिके साथ सम्बन्ध मानना ठीक भी नहीं है । तथा दूसरोंके मतमें द्रव्यसे रूप आदि उसके गुण एवं कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय भिन्न भी नहीं हैं । † यदि दूसरोंके मतमें |
* उस समय ऐसा नियम नहीं हो सकेगा कि वस्तुके प्रत्यक्ष अनुभवके समय उसकी स्मृति न हो, क्योंकि स्मृतिका असमवायी कारण आत्मा और मनका संयोग तो अनुभवकालमें भी है ही । इसके सिवा असमवायी कारणकी तुल्यताके कारण एक साथ समस्त स्मृतियोंकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग भी उपस्थित हो जायगा । यदि कहो कि स्मृतिके संस्कारोंका उद्बोध न होनेके कारण एक साथ स्मृति नहीं हो सकती तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि संस्कार और उनका उद्बोध ये दोनों आत्मामें ही रहते हैं—इस विषयमें उनका एक मत नहीं है । इसलिये इनकी गणना स्मृतिकी सामग्रीके अन्तर्गत नहीं हो सकती ।
† वैशेषिक मतमें साधारणतया द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय ये छः प्रकारके भाव पदार्थ हैं । उनमें द्रव्य उसे कहते हैं जिसके साथ