भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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विषयपृष्ठ
११७. हेतु-फलके अभिनिवेशमें दोष......२३२
११८. जीवोंका जन्म मायिक है......२३४
११९. आत्माकी अनिर्वचनीयता......२३६
१२०. द्वैताभावमें स्वप्नका दृष्टान्त......२३७
१२१. अजाति ही उत्तम सत्य है......२४१
१२२. चित्तकी असंगता......२४२
१२३. व्यावहारिक वस्तु परमार्थतः नहीं होती......२४३
१२४. आत्मा अज है—यह कल्पना भी व्यावहारिक है......२४४
१२५. द्वैताभावसे जन्माभाव......२४५
१२६. विद्वान्की अभयपदप्राप्ति......२४७
१२७. मनोवृत्तियोंकी सन्धिमें ब्रह्मसाक्षात्कार......२४९
१२८. आत्माकी दुर्दर्शताका हेतु......२५०
१२९. परमार्थका आवरण करनेवाले असदभिनिवेश......२५१
१३०. ज्ञानीका नैष्कर्म्य......२५३
१३१. त्रिविध ज्ञेय......२५५
१३२. त्रिविध ज्ञेय और ज्ञानका ज्ञाता सर्वज्ञ है......२५८
१३३. जीव आकाशके समान अनादि और अभिन्न हैं......२६०
१३४. आत्मतत्त्वनिरूपण......२६१
१३५. आत्मज्ञ ही अकृपण है......२६३
१३६. आत्मज्ञका महाज्ञानित्व......२६४
१३७. जातवादमें दोषप्रदर्शन......२६६
१३८. आत्माका स्वाभाविक स्वरूप......२६७
१३९. अजातवाद बौद्धदर्शन नहीं है......२६८
१४०. परमार्थपद-वन्दना......२७०
१४१. भाष्यकारकर्तृक वन्दना......२७०
१४२. शान्तिपाठ......२७३