माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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१८२ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
| एव द्वैतिनः । यस्मादभूतस्या-विद्यमानस्यापरे वैशेषिका नैयायिकाश्च धीरा धीमन्तः प्राज्ञाभिमानिन इत्यर्थः विवदन्तो विरुद्धं वदन्तो ह्यन्योन्यमिच्छन्ति जेतुमित्यभिप्रायः॥३॥ | दूसरे धीर-बुद्धिमान् यानी प्राज्ञाभिमानी वैशेषिक और नैयायिक-लोग अभूत अर्थात् अविद्यमान वस्तु-का जन्म स्वीकार करते हैं, इसलिये परस्पर विवाद यानी विरुद्ध भाषण करते हुए वे एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छा करते रहते हैं—यह इसका तात्पर्य है ॥ ३ ॥ |
| तैरेवं विरुद्धवदनेनान्योन्यपक्षप्रतिषेधं कुर्वद्भिः किं ख्यापितं भवत्युच्यते— | परस्पर विवाद करके एक-दूसरेके पक्षका खण्डन करनेवाले उन वादियोंद्वारा किस सिद्धान्तका प्रकाश किया जाता है, सो बतलाते हैं— |
भूतं न जायते किंचिदभूतं नैव जायते ।
विवदन्तोऽद्वया ह्येवमजातिं ख्यापयन्ति ते ॥ ४ ॥
[ किन्हींका मत है—] 'कोई सद्वस्तु उत्पन्न नहीं होती' और [ कोई कहते हैं—] 'असद्वस्तुका जन्म नहीं होता'—इस प्रकार परस्पर विवाद करनेवाले ये अद्वैतवादी* अजाति (अजातवाद) को ही प्रकाशित करते हैं ॥ ४ ॥
| भूतं विद्यमानं वस्तु न जायते किंचिद्विद्यमानत्वादेवात्मवदित्येवं वदन्नसद्वादी सांख्यपक्षं प्रतिषेधति सज्जन्म । तथा भूतमविद्यमानमविद्यमानत्वान्नैव जायते | कोई भी भूत अर्थात् विद्यमान वस्तु, विद्यमान होनेके कारण ही, उत्पन्न नहीं होती; जैसे कि आत्मा—इस प्रकार कहकर असद्वादी, सांख्यके पक्ष सद्वादका, खण्डन करता है। तथा सांख्य भी 'अभूत—अविद्यमान वस्तु अविद्यमान होनेके कारण ही |
* यहाँ द्वैतवादियोंको ही व्यंगसे 'अद्वैतवादी' कहा है।