भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण १८३


शशविषाणवदित्येवं वदन्सां-शशशृङ्गके समान उत्पन्न नहीं हो
ख्योऽप्यसद्वादिपक्षमसज्जन्म प्रति-सकती'—ऐसा कहकर असद्वादीके
पक्ष असत्‌की उत्पत्तिका प्रतिषेध
षेधति। विवदन्तो विरुद्धं वदन्तो-करता है। इस प्रकार परस्पर विवाद
यानी विरुद्ध भाषण करनेवाले ये
ऽद्वया अद्वैतिनो ह्येते अन्योन्यस्यअद्वैतवादी—क्योंकि वस्तुतः ये अद्वैत-
पक्षौ सदसतोर्जन्मनी प्रतिषेधन्तो-वादी ही हैं—एक-दूसरेके पक्ष
सज्जन्म और असज्जन्मका खण्डन
ऽजातिमनुत्पत्तिमर्थात्ख्यापयन्तिकरते हुए अर्थतः अजाति—अनुत्पत्ति-
प्रकाशयन्ति ते ॥४॥को ही प्रकाशित करते हैं ॥ ४ ॥

द्वैतवादियोंद्वारा प्रदर्शित अजातिका अनुमोदन

ख्याप्यमानामजातिं तैरनुमोदामहे वयम् ।
विवदामो न तैः सार्धमविवादं निबोधत ॥ ५ ॥

उनके द्वारा प्रकाशित की हुई अजातिका हम भी अनुमोदन करते हैं। हम उनसे विवाद नहीं करते अतः तुम उस निर्विवाद [ परमार्थ-दर्शन ] को अच्छी तरह समझ लो ॥ ५ ॥

तैरेवं ख्याप्यमानामजातिमेव-उनके द्वारा इस प्रकार प्रकाशित
मस्त्वित्यनुमोदामहे केवलं नकी गयी अजातिका हम 'ऐसा ही
हो' इस प्रकार केवल अनुमोदन
तैः सार्धं विवदामः पक्षप्रतिपक्ष-करते हैं। तात्पर्य यह है कि पक्ष-
ग्रहणेन; यथा तेऽन्योन्यमित्य-प्रतिपक्ष लेकर उनके साथ विवाद
नहीं करते, जैसा कि वे आपसमें
भिप्रायः। अतस्तमविवादं विवाद-किया करते हैं। अतः हे शिष्यगण !
हमारेद्वारा उपदेश किये हुए उस
रहितं परमार्थदर्शनमनुज्ञातमस्मा-अविवाद—विवादरहित परमार्थदर्शन-
भिर्निबोधत हे शिष्याः ॥५॥को तुम अच्छी तरह समझ लो ॥५॥
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