भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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१८४माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

अजातस्यैव धर्मस्य जातिमिच्छन्ति वादिनः ।
अजातो ह्यमृतो धर्मो मर्त्यतां कथमेष्यति ॥ ६ ॥

ये वादीलोग अजात वस्तुका ही जन्म होना स्वीकार करते हैं। किन्तु जो पदार्थ निश्चय ही अजात और अमृत है वह मरणशीलताको कैसे प्राप्त हो सकता है ? ॥ ६ ॥

सदसद्वादिनः सर्वेऽपीति पुरस्तात्कृतभाष्यश्लोकः ॥ ६ ॥यहाँ [ 'वादिनः' पदसे ] सभी सद्वादी और असद्वादी अभिप्रेत हैं। इस श्लोकका भाष्य पहले * किया जा चुका है ॥ ६ ॥

स्वभावविपर्यय असम्भव है

न भवत्यमृतं मर्त्यं न मर्त्यममृतं तथा ।
प्रकृतेरन्यथाभावो न कथंचिद्भविष्यति ॥ ७ ॥

मरणरहित वस्तु कभी मरणशील नहीं हो सकती और मरणशील मरणहीन नहीं हो सकती, क्योंकि किसीके स्वभावका विपर्यय किसी प्रकार होनेवाला नहीं है ॥ ७ ॥

स्वभावेनामृतो यस्य धर्मो गच्छति मर्त्यताम् ।
कृतकेनामृतस्तस्य कथं स्थास्यति निश्चलः ॥ ८ ॥

जिसके मतमें स्वभावसे ही मरणहीन धर्म मरणशीलताको प्राप्त हो जाता है; उसके सिद्धान्तानुसार कृतक (जन्म) होनेके कारण वह अमृत पदार्थ निश्चल (चिरस्थायी) कैसे रह सकेगा ? ॥ ८ ॥


* देखिये अद्वैतप्रकरण श्लोक २० का अर्थ।