भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ]अलातशान्तिप्रकरण१८५
उक्तार्थानां श्लोकानामिहोपन्यासः परवादिपक्षाणामन्योन्यविरोधख्यापितानुत्पत्त्यनुमोदनप्रदर्शनार्थः ॥ ७-८ ॥जिनका अर्थ पहले कहा जा चुका है ऐसे उपर्युक्त [तीन] श्लोकोंका उल्लेख यहाँ विपक्षी वादियोंके पक्षोंके पारस्परिक विरोधसे प्रकाशित अजातिका अनुमोदन प्रदर्शित करनेके लिये किया गया है ॥ ७-८ ॥

यस्माल्लौकिक्यपि प्रकृतिर्न विपर्येति, कासावित्याह—क्योंकि लौकिकी प्रकृतिका भी विपर्यय नहीं होता [फिर पारमार्थिकीका तो कैसे होगा ?] किन्तु वह प्रकृति है क्या ? इसपर कहते हैं—

सांसिद्धिकी स्वाभाविकी सहजा अकृता च या ।
प्रकृतिः सेति विज्ञेया स्वभावं न जहाति या ॥ ९ ॥

जो उत्तम सिद्धिद्वारा प्राप्त, स्वभावसिद्धा, सहजा और अकृता है तथा कभी अपने स्वभावका परित्याग नहीं करती वही ‘प्रकृति’ है—ऐसा जानना चाहिये ॥ ९ ॥

सम्यक्सिद्धिः संसिद्धिस्तत्र भवा सांसिद्धिकी यथा योगिनां सिद्धानामणिमाद्यैश्वर्यप्राप्तिः प्रकृतिः । सा भूतभविष्यत्कालयोरपि योगिनां न विपर्येति तथैव सा । तथा स्वाभाविकी द्रव्यस्वभावत एव यथाग्न्या-सम्यक् सिद्धिका नाम संसिद्धि है; उससे होनेवालीको ‘सांसिद्धिकी’ कहते हैं; जिस प्रकार कि सिद्ध योगियोंको अणिमादि ऐश्वर्यकी प्राप्ति उनकी प्रकृति है । योगियोंकी उस प्रकृतिका भूत और भविष्यत् कालमें भी विपर्यय नहीं होता—वह जैसी-की-तैसी ही रहती है । तथा ‘स्वाभाविकी’ वस्तुके स्वभावसे सिद्ध; जैसी कि