माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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| १८६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| दीनाम् उष्णप्रकाशादिलक्षणा, सापि न कालान्तरे व्यभिचरति देशान्तरे च । तथा सहजा आत्मना सहैव जाता यथा पक्ष्यादीनामाकाशगमनादिलक्षणा ।<br><br>अन्यापि या काचिदकृता केनचिन्न कृता यथापां निम्नदेशगमनादिलक्षणा । अन्यापि या काचित्स्वभावं न जहाति सा सर्वा प्रकृतिरिति विज्ञेया लोके। मिथ्याकल्पितेषु लौकिकेष्वपि वस्तुषु प्रकृतिर्नान्यथा भवति किमुताजस्वभावेषु परमार्थवस्तुष्वमृतत्वलक्षणा प्रकृतिर्नान्यथा भवतीत्यभिप्रायः ॥ ९॥ | अग्नि आदिकी उष्णता एवं प्रकाशादिरूपा प्रकृति होती है । उसका भी कालान्तर और देशान्तरमें व्यभिचार नहीं होता । तथा 'सहजा'—अपने साथ ही उत्पन्न होनेवाली; जैसे कि पक्षी आदिकी आकाशगमनादिरूपा प्रकृति होती है ।<br><br>और भी जो कोई 'अकृता'—किसीके द्वारा सम्पादन न की हुई; जैसे कि जलोंकी प्रकृति निम्न प्रदेशकी ओर जानेकी है । तथा इसके सिवा अन्य भी जो कोई अपने स्वभावको नहीं छोड़ती उस सबको लोकमें 'प्रकृति' नामसे ही जानना चाहिये । मिथ्या कल्पना की हुई लौकिक वस्तुओंमें भी उनकी प्रकृति अन्यथा नहीं होती; फिर अजस्वभाव परमार्थ वस्तुओंमें उनकी अमृतत्वलक्षणा प्रकृति अन्यथा नहीं हो सकती—इसमें तो कहना ही क्या है ? यह इसका अभिप्राय है ॥९॥ |
जीवका जरामरण माननेमें दोष
| किंविषया पुनः सा प्रकृतिर्यस्या अन्यथाभावो वादिभिः | वादीलोग जिसके अन्यथाभावकी कल्पना करते हैं उस प्रकृतिका विषय क्या है ? और उनकी |