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माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
१८४माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

अजातस्यैव धर्मस्य जातिमिच्छन्ति वादिनः ।
अजातो ह्यमृतो धर्मो मर्त्यतां कथमेष्यति ॥ ६ ॥

ये वादीलोग अजात वस्तुका ही जन्म होना स्वीकार करते हैं। किन्तु जो पदार्थ निश्चय ही अजात और अमृत है वह मरणशीलताको कैसे प्राप्त हो सकता है ? ॥ ६ ॥

सदसद्वादिनः सर्वेऽपीति पुरस्तात्कृतभाष्यश्लोकः ॥ ६ ॥यहाँ [ 'वादिनः' पदसे ] सभी सद्वादी और असद्वादी अभिप्रेत हैं। इस श्लोकका भाष्य पहले * किया जा चुका है ॥ ६ ॥

स्वभावविपर्यय असम्भव है

न भवत्यमृतं मर्त्यं न मर्त्यममृतं तथा ।
प्रकृतेरन्यथाभावो न कथंचिद्भविष्यति ॥ ७ ॥

मरणरहित वस्तु कभी मरणशील नहीं हो सकती और मरणशील मरणहीन नहीं हो सकती, क्योंकि किसीके स्वभावका विपर्यय किसी प्रकार होनेवाला नहीं है ॥ ७ ॥

स्वभावेनामृतो यस्य धर्मो गच्छति मर्त्यताम् ।
कृतकेनामृतस्तस्य कथं स्थास्यति निश्चलः ॥ ८ ॥

जिसके मतमें स्वभावसे ही मरणहीन धर्म मरणशीलताको प्राप्त हो जाता है; उसके सिद्धान्तानुसार कृतक (जन्म) होनेके कारण वह अमृत पदार्थ निश्चल (चिरस्थायी) कैसे रह सकेगा ? ॥ ८ ॥


* देखिये अद्वैतप्रकरण श्लोक २० का अर्थ।

शां० भा० ]अलातशान्तिप्रकरण१८५
उक्तार्थानां श्लोकानामिहोपन्यासः परवादिपक्षाणामन्योन्यविरोधख्यापितानुत्पत्त्यनुमोदनप्रदर्शनार्थः ॥ ७-८ ॥जिनका अर्थ पहले कहा जा चुका है ऐसे उपर्युक्त [तीन] श्लोकोंका उल्लेख यहाँ विपक्षी वादियोंके पक्षोंके पारस्परिक विरोधसे प्रकाशित अजातिका अनुमोदन प्रदर्शित करनेके लिये किया गया है ॥ ७-८ ॥

यस्माल्लौकिक्यपि प्रकृतिर्न विपर्येति, कासावित्याह—क्योंकि लौकिकी प्रकृतिका भी विपर्यय नहीं होता [फिर पारमार्थिकीका तो कैसे होगा ?] किन्तु वह प्रकृति है क्या ? इसपर कहते हैं—

सांसिद्धिकी स्वाभाविकी सहजा अकृता च या ।
प्रकृतिः सेति विज्ञेया स्वभावं न जहाति या ॥ ९ ॥

जो उत्तम सिद्धिद्वारा प्राप्त, स्वभावसिद्धा, सहजा और अकृता है तथा कभी अपने स्वभावका परित्याग नहीं करती वही ‘प्रकृति’ है—ऐसा जानना चाहिये ॥ ९ ॥

सम्यक्सिद्धिः संसिद्धिस्तत्र भवा सांसिद्धिकी यथा योगिनां सिद्धानामणिमाद्यैश्वर्यप्राप्तिः प्रकृतिः । सा भूतभविष्यत्कालयोरपि योगिनां न विपर्येति तथैव सा । तथा स्वाभाविकी द्रव्यस्वभावत एव यथाग्न्या-सम्यक् सिद्धिका नाम संसिद्धि है; उससे होनेवालीको ‘सांसिद्धिकी’ कहते हैं; जिस प्रकार कि सिद्ध योगियोंको अणिमादि ऐश्वर्यकी प्राप्ति उनकी प्रकृति है । योगियोंकी उस प्रकृतिका भूत और भविष्यत् कालमें भी विपर्यय नहीं होता—वह जैसी-की-तैसी ही रहती है । तथा ‘स्वाभाविकी’ वस्तुके स्वभावसे सिद्ध; जैसी कि
१८६माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
दीनाम् उष्णप्रकाशादिलक्षणा, सापि न कालान्तरे व्यभिचरति देशान्तरे च । तथा सहजा आत्मना सहैव जाता यथा पक्ष्यादीनामाकाशगमनादिलक्षणा ।<br><br>अन्यापि या काचिदकृता केनचिन्न कृता यथापां निम्नदेशगमनादिलक्षणा । अन्यापि या काचित्स्वभावं न जहाति सा सर्वा प्रकृतिरिति विज्ञेया लोके। मिथ्याकल्पितेषु लौकिकेष्वपि वस्तुषु प्रकृतिर्नान्यथा भवति किमुताजस्वभावेषु परमार्थवस्तुष्वमृतत्वलक्षणा प्रकृतिर्नान्यथा भवतीत्यभिप्रायः ॥ ९॥अग्नि आदिकी उष्णता एवं प्रकाशादिरूपा प्रकृति होती है । उसका भी कालान्तर और देशान्तरमें व्यभिचार नहीं होता । तथा 'सहजा'—अपने साथ ही उत्पन्न होनेवाली; जैसे कि पक्षी आदिकी आकाशगमनादिरूपा प्रकृति होती है ।<br><br>और भी जो कोई 'अकृता'—किसीके द्वारा सम्पादन न की हुई; जैसे कि जलोंकी प्रकृति निम्न प्रदेशकी ओर जानेकी है । तथा इसके सिवा अन्य भी जो कोई अपने स्वभावको नहीं छोड़ती उस सबको लोकमें 'प्रकृति' नामसे ही जानना चाहिये । मिथ्या कल्पना की हुई लौकिक वस्तुओंमें भी उनकी प्रकृति अन्यथा नहीं होती; फिर अजस्वभाव परमार्थ वस्तुओंमें उनकी अमृतत्वलक्षणा प्रकृति अन्यथा नहीं हो सकती—इसमें तो कहना ही क्या है ? यह इसका अभिप्राय है ॥९॥

जीवका जरामरण माननेमें दोष

किंविषया पुनः सा प्रकृतिर्यस्या अन्यथाभावो वादिभिःवादीलोग जिसके अन्यथाभावकी कल्पना करते हैं उस प्रकृतिका विषय क्या है ? और उनकी

शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण १८७


कल्प्यते कल्पनायां वा को दोष इत्याह—कल्पनामें क्या दोष है ? इसपर कहते हैं—

जरामरणनिर्मुक्ताः सर्वे धर्माः स्वभावतः ।
जरामरणमिच्छन्तश्च्यवन्ते तन्मनीषया ॥ १० ॥

समस्त जीव स्वभावसे ही जरा-मरणसे रहित हैं। उनके जरा-मरण स्वीकार करनेवाले लोग, इस विचारके कारण ही, स्वभावसे च्युत हो जाते हैं ॥ १० ॥

| जरामरणनिर्मुक्ताः—जरा-मरणादिसर्वविक्रियावर्जिता इत्यर्थः । के ? सर्वे धर्माः सर्व आत्मान इत्येतत्स्वभावतः प्रकृतितः । एवंस्वभावाः सन्तो धर्मा जरामरणमिच्छन्त इच्छन्त इवेच्छन्तो रज्ज्वामिव सर्पमात्मनि कल्पयन्तश्च्यवन्ते स्वभावतश्चलन्तीत्यर्थः, तन्मनीषया जन्ममरणचिन्तया तद्भावभावितत्वदोषेणेत्यर्थः ॥ १० ॥ | ‘जरामरणनिर्मुक्ताः’ अर्थात् जरा-मरणादि सम्पूर्ण विकारोंसे रहित हैं। कौन ? सम्पूर्ण धर्म अर्थात् समस्त जीवात्मा, स्वभावतः यानी प्रकृतिसे ही । ऐसे स्वभाववाले होनेपर भी जरा-मरणके इच्छुकके समान इच्छा करनेवाले अर्थात् रज्जुमें सर्पकी भाँति आत्मामें जरा-मरणकी कल्पना करनेवाले जीव, उसकी मनीषा—जरामरणकी चिन्तासे अर्थात् उस भावसे भावित होनेके दोषवश अपने स्वभावसे च्युत—विचलित हो जाते हैं ॥ १० ॥ |


सांख्यमतपर वैशेषिककी आपत्ति

कथं सञ्जातिवादिभिः सांख्यैरनुपपन्नमुच्यत इत्याह वैशेषिकः—सञ्जातिवादी सांख्यमतावलम्बियोंका कथन किस प्रकार असङ्गत है ? सो वैशेषिकमतावलम्बी बतलाते हैं—
१८८माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

कारणं यस्य वै कार्यं कारणं तस्य जायते ।
जायमानं कथमजं भिन्नं नित्यं कथं च तत् ॥ ११ ॥

जिस (सांख्यमतावलम्बी) के मतमें कारण ही कार्य है उसके सिद्धान्तानुसार कारण ही उत्पन्न होता है । किन्तु जब कि वह जन्म लेनेवाला है तो अजन्मा कैसे हो सकता है और भिन्न (विदीर्ण) होनेपर भी नित्य कैसे हो सकता है ? ॥ ११ ॥

कारणं मृद्वदुपादानलक्षणं यस्य वादिनो वै कार्यं कारणमेव कार्याकारेण परिणमते यस्य वादिन इत्यर्थः, तस्याजमेव सत्प्रधानादि कारणं महदादि-कार्यरूपेण जायत इत्यर्थः । महदाद्याकारेण चेज्जायमानं प्रधानं कथमजमुच्यते तैरिति-प्रतिषिद्धं चेदं जायतेऽजं चेति ।<br><br>नित्यं च तैरूच्यते प्रधानं भिन्नं विदीर्णं स्फुटितमेकदेशेन सत्कथं नित्यं भवेदित्यर्थः । न हि सावयवं घटादि एकदेश-जिस वादीके मतमें मृत्तिकाके समान उपादान कारण ही कार्य है अर्थात् जिसके मतमें कारण ही कार्यरूपमें परिणत होता है उसके सिद्धान्तानुसार प्रधानादि कारण अजन्मा होता हुआ भी महदादि कार्यरूपसे उत्पन्न होता है—ऐसा इसका तात्पर्य है । किन्तु यदि प्रधान महदादिरूपसे उत्पन्न होने-वाला है तो वे उसे अजन्मा कैसे बतलाते हैं ? उत्पन्न होता है और अजन्मा भी है—ऐसा कथन तो परस्पर विरुद्ध है ।<br><br>इसके सिवा वे प्रधानको नित्य भी बतलाते हैं । किन्तु वह भिन्न—विदीर्ण अर्थात् एक देशमें स्फुटित यानी विकृत होनेवाला* होकर भी नित्य कैसे हो सकता है ? तात्पर्य यह कि घटादि सावयव पदार्थ, जो एक

* जैसे बीज अङ्कुररूपसे फूटता है ।

शां० भा० ]अलातशान्तिप्रकरण१८९
स्फुटनधर्मि नित्यं दृष्टं लोक इत्यर्थः । विदीर्णं च स्यादेकदेशेनाजं नित्यं चेति एतद्विप्रतिषिद्धं तैरभिधीयत इत्यभिप्रायः॥११॥देशमें स्फुटित होनेवाले हैं, लोकमें कभी नित्य नहीं देखे गये। वह अपने एक देशमें विदीर्ण होता है तथा अज और नित्य भी है—यह तो उनका विरुद्ध कथन ही है—ऐसा इसका अभिप्राय है ॥११॥

उक्तस्यैवार्थस्य स्पष्टीकरणार्थमाह—उपर्युक्त अभिप्रायका ही स्पष्टीकरण करनेके लिये कहते हैं—

कारणाद्यद्यनन्यत्वमतः कार्यमजं यदि ।
जायमानाद्धि वै कार्यात्कारणं ते कथं ध्रुवम् ॥ १२ ॥

यदि कारणसे कार्यकी अभिन्नता है तब तो तुम्हारे मतमें कार्य भी अजन्मा है; और यदि ऐसी बात है तो उत्पन्न होनेवाले कार्यसे अभिन्न होनेपर कारण भी किस प्रकार निश्चल रह सकता है ? ॥ १२ ॥

कारणादजात्कार्यस्य यद्यनन्यत्वमिष्टं त्वया ततःयदि तुम्हें अजन्मा कारणसे कार्यकी अनन्यता इष्ट है तो [तुम्हारे मतमें ] यह बात सिद्ध होती है कि
कार्यकारणयोः अभिन्नत्वे विप्रतिपत्तिःकार्यमजमिति प्राप्तम् । इदं चान्यद्विप्रतिषिद्धं कार्यमजं चेति तव । किं चान्यत्कार्यकारणयोरनन्यत्वे जायमानाद्धि वै कार्यात्कारणमनन्यन्नित्यं ध्रुवं च ते कथं भवेत् । न हि कुक्कुट्या एकदेशः पच्यत एकदेशः प्रसवाय कल्प्यते ॥ १२ ॥कार्य भी अजन्मा है। किन्तु कार्य है और अजन्मा है—यह तुम्हारे कथनमें एक दूसरा विरोध है। इसके सिवा, कार्य और कारणकी अनन्यता होनेपर उत्पत्तिशील कार्यसे अभिन्न उसका कारण नित्य और निश्चल कैसे रह सकता है ? ऐसा कभी नहीं हो सकता कि मुर्गीका एक अंश तो पकाया जाय और दूसरा सन्तानोत्पत्तिके योग्य बनाये रखा जाय ॥ १२ ॥
१९०माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
किं चान्यत्—इसके सिवा और भी—

अजाद्वै जायते यस्य दृष्टान्तस्तस्य नास्ति वै ।
जाताच्च जायमानस्य न व्यवस्था प्रसज्यते ॥ १३ ॥

जिसके मतमें अजन्मा वस्तुसे ही किसी कार्यकी उत्पत्ति होती है उसके पास निश्चय ही इसका कोई दृष्टान्त नहीं है। और यदि जात पदार्थसे ही कार्यकी उत्पत्ति मानी जाय तो अनवस्था उपस्थित हो जाती है ॥ १३ ॥

अजादनुत्पन्नाद्वस्तुनो जायते यस्य वादिनः कार्यं दृष्टान्तस्तस्य नास्ति वै, दृष्टान्ताभावेऽर्थादजान्न किञ्चिज्जायत इति सिद्धं भवतीत्यर्थः । यदा पुनर्जाताज्जायमानस्य वस्तुनः अभ्युपगमः, तदप्यन्यस्मात् जातात्तदप्यन्यस्मादिति न व्यवस्था प्रसज्यते । अनवस्थानं स्यादित्यर्थः ॥ १३ ॥ <br><br>(पार्श्व-टिप्पणी: जाताजातयोः उभयोरपि कारणत्वानुपपत्तिः)जिस वादीके मतमें अज–अनुत्पन्न वस्तुसे कार्यकी उत्पत्ति होती है उसके पास निश्चय ही कोई दृष्टान्त नहीं है । अतः तात्पर्य यह हुआ कि दृष्टान्तका अभाव होनेके कारण यह बात स्वयं सिद्ध हो जाती है कि अज वस्तुसे किसीकी उत्पत्ति नहीं होती । और जब किसी जात–उत्पन्न होनेवाली वस्तुसे कार्यवर्गकी उत्पत्ति मानी जाती है, तो वह भी किसी अन्य जात वस्तुसे उत्पन्न होनी चाहिये और वह किसी औरहीसे उत्पन्न होनी चाहिये—इस प्रकार कोई व्यवस्था ही नहीं रहती; अर्थात् अनवस्था उपस्थित हो जाती है ॥ १३ ॥

शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण १९१


हेतु और फलके अन्योन्यकारणत्वमें दोष

“यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्” (बृ० उ० २।४।१४) इति परमार्थतो द्वैताभावः श्रुत्योक्तस्तमाश्रित्याह—“जिस अवस्थामें इसकी दृष्टिमें सब आत्मा ही हो गया है” इस श्रुतिने जो परमार्थतः द्वैतका अभाव बतलाया है, उसीको आश्रित करके कहते हैं—

हेतोरादिः फलं येषामादिर्हेतुः फलस्य च ।
हेतोः फलस्य चानादिः कथं तैरुपवर्ण्यते ॥ १४ ॥

जिनके मतमें हेतुका कारण फल है और फलका कारण हेतु है वे हेतु और फलके अनादित्वका प्रतिपादन कैसे करते हैं ? ॥ १४ ॥

हेतोर्धर्मादेरादिः कारणं देहादिसंघातः फलं येषां वादिनाम् । तथादिः कारणं हेतुर्धर्माधर्मादिः फलस्य च देहादिसंघातस्य । एवं हेतुफलयोरितरेतरकार्यकारणत्वेनादिमत्त्वं ब्रुवद्भिरेवं हेतोः फलस्य चानादित्वं कथं तैरुपवर्ण्यते ? विप्रतिषिद्धमित्यर्थः । न हि नित्यस्य कूटस्थस्यात्मनो हेतुफलात्मता संभवति ॥ १४ ॥जिन वादियोंके मतमें हेतु अर्थात् धर्मादिका आदि-कारण देहादिसंघातरूप फल है तथा देहादिसंघातरूप फलका आदि-कारण धर्माधर्मादि हेतु है*—इस प्रकार हेतु और फलका एक-दूसरेके कार्य-कारणरूपसे कारणत्व बतलानेवाले उन लोगोंद्वारा हेतु और फलका अनादित्व किस प्रकार प्रतिपादन किया जाता है ? अर्थात् उनका यह कथन सर्वथा विरुद्ध है । नित्य कूटस्थ आत्माकी हेतुफलात्मकता तो किसी प्रकार भी सम्भव नहीं है ॥ १४ ॥

* अर्थात् जो धर्मादिको शरीरादिकी प्राप्तिका कारण और शरीरको धर्मादि-सम्पादनका कारण मानते हैं ।

१९२माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
कथं तैरविरुद्धमभ्युपगम्यत इत्युच्यते—वे किस प्रकार विरुद्ध मतको मानते हैं, सो बतलाया जाता है—

हेतोरादिः फलं येषामादिर्हेतुः फलस्य च ।
तथा जन्म भवेत्तेषां पुत्राज्जन्म पितुर्यथा ॥ १५ ॥

जिनके मतमें हेतुका कारण फल है और फलका कारण हेतु है उनकी [ मानी हुई ] उत्पत्ति ऐसी ही है जैसे पुत्रसे पिताका जन्म होना ॥ १५ ॥

हेतुजन्यादेव फलाद्धेतोर्जन्माभ्युपगच्छतां तेषामीदृशो विरोध उक्तो भवति यथा पुत्राज्जन्म पितुः ॥ १५ ॥हेतुसे उत्पन्न होनेवाले फलसे ही हेतुका जन्म माननेवाले उन लोगोंके मतमें ऐसा ही विरोध कहा जाता है जैसे पुत्रसे पिताका जन्म बतलानेमें ॥ १५ ॥

यथोक्तो विरोधो न युक्तोऽभ्युपगन्तुमिति चेन्मन्यसे—यदि तुम ऐसा मानते हो कि उपर्युक्त विरोध मानना उचित नहीं है तो—

संभवे हेतुफलयोरेषितव्यः क्रमस्त्वया ।
युगपत्संभवे यस्मादसंबन्धो विषाणवत् ॥ १६ ॥

तुम्हें हेतु और फलकी उत्पत्तिमें क्रम स्वीकार करना चाहिये, क्योंकि उनके साथ-साथ उत्पन्न होनेमें तो [ दायें-बायें ] सींगोंके समान परस्पर [ कार्य-कारणरूप ] सम्बन्ध ही नहीं हो सकता ॥ १६ ॥

संभवे हेतुफलयोरुत्पत्तौ क्रम एषितव्यस्त्वयान्वेष्टव्यो हेतुः पूर्वं पश्चात्फलं चेति । इतश्चतुम्हें हेतु और फलकी उत्पत्तिमें क्रम अर्थात् पहले हेतु होता है और फिर फल—इस प्रकार दोनोंका पौर्वापर्य खोजना चाहिये; क्योंकि

शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण १९३


युगपत्संभवे यस्माद्धेतुफलयोः कार्यकारणत्वेनासंबन्धः, यथा युगपत्संभवतोः सव्येतरगोविषाणयोः ॥ १६ ॥जिस प्रकार गौके साथ-साथ उत्पन्न होनेवाले दायें और बायें सींगोंका परस्पर सम्बन्ध नहीं होता उसी प्रकार साथ-साथ उत्पन्न होनेपर तो हेतु और फलका परस्पर कार्य-कारण-रूपसे सम्बन्ध ही नहीं होगा ॥१६॥

कथमसंबन्धः ? इत्याह—उनका किस प्रकार सम्बन्ध नहीं होगा ? सो बतलाते हैं—

फलादुत्पद्यमानः सन्न ते हेतुः प्रसिध्यति ।
अप्रसिद्धः कथं हेतुः फलमुत्पादयिष्यति ॥ १७ ॥

तुम्हारे मतमें यदि हेतु फलसे उत्पन्न होता है तो वह [ हेतुरूपसे ] सिद्ध ही नहीं हो सकता; और असिद्ध हेतु फलको उत्पन्न कैसे करेगा ? ॥१७॥

जन्यात्स्वतोलब्धात्मकात् फलादुत्पद्यमानः सञ्शशविषाणादेरिवासतो न हेतुः प्रसिध्यति जन्म न लभते । अलब्धात्मकोऽप्रसिद्धः सञ्शशविषाणादिकल्पस्तव कथं फलमुत्पादयिष्यति ? न हीतरेतरापेक्षसिद्धयोः शशविषाणकल्पयोः कार्यकारणभावेन संबन्धःजन्य अर्थात् जो स्वतः प्राप्त नहीं है उस शशशृङ्गके समान असत् फलसे उत्पन्न होनेवाला होनेपर तो हेतु ही सिद्ध नहीं होता अर्थात् उसीका जन्म नहीं हो सकता । इस प्रकार शशशृङ्गके समान जिसकी स्वतः उपलब्धि नहीं है वह अप्रसिद्ध हेतु तुम्हारे मतमें किस प्रकार फल उत्पन्न कर देगा ? एक-दूसरेकी अपेक्षासे सिद्ध होनेवाले तथा शशशृङ्गके समान सर्वथा असत् पदार्थोंका कार्य-कारणभावसे अथवा किसी और प्रकार

२५–२६

१९४माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
क्वचिद्दृष्टः, अन्यथा वेत्यभिप्रायः ॥ १७ ॥कभी सम्बन्ध नहीं देखा गया—यह इसका अभिप्राय है ॥ १७ ॥

यदि हेतोः फलात्सिद्धिः फलसिद्धिश्च हेतुतः ।

कतरत्पूर्वनिष्पन्नं यस्य सिद्धिरपेक्षया ॥ १८ ॥

[ तुम्हारे मतमें ] यदि फलसे हेतुकी सिद्धि होती है और हेतुसे फलकी सिद्धि होती है तो उनमें पहले कौन हुआ ? जिसकी अपेक्षासे कि दूसरेका आविर्भाव माना जाय ? ॥ १८ ॥

असंबन्धतादोषेणापोदितेऽपि हेतुफलयोः कार्यकारणभावे यदि हेतुफलयोरन्योन्यसिद्धिरभ्युपगम्यत एव त्वया कतरत्पूर्वनिष्पन्नं हेतुफलयोर्यस्य पश्चाद्भाविनः सिद्धिः स्यात्पूर्वसिद्धयपेक्षया तद्ब्रूहीत्यर्थः ॥१८॥हेतु और फलके कार्य-कारणभावका असम्बन्धतादोषसे निराकरण कर दिया जानेपर भी यदि तुम हेतु और फलकी एक-दूसरेसे सिद्धि मानते ही हो तो इन हेतु और फलमेंसे पहले कौन हुआ—सो बतलाओ; जिसकी पूर्वसिद्धिकी अपेक्षासे पीछे होनेवालेकी सिद्धि मानी जाय ?—यह इसका तात्पर्य है ॥१८॥
अथैतन्न शक्यते वक्तुमिति मन्यसे,और यदि तुम ऐसा मानते हो, कि यह नहीं बतलाया जा सकता तो—

अशक्तिरपरिज्ञानं क्रमकोपोऽथ वा पुनः ।

एवं हि सर्वथा बुद्धैरजातिः परिदीपिता ॥ १९ ॥

यह अशक्ति (असामर्थ्य) अज्ञान है, अथवा फिर तो इससे उपर्युक्त क्रमका भी विपर्यय हो जाता है [ क्योंकि इनके पूर्वापरत्वका ज्ञान न होनेसे इनमें जो पूर्ववर्ती है वह कारण है और पीछे होनेवाला कार्य है ऐसा

शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण १९५


कोई नियम भी नहीं रह सकता ] । इस प्रकार उन बुद्धिमानोंने सर्वथा अजातिको ही प्रकाशित किया है ॥ १९ ॥

सेयमशक्तिरपरिज्ञानं तत्त्वाविवेको मूढतेत्यर्थः । अथ वा योऽयं त्वयोक्तः क्रमो हेतोः फलस्य सिद्धिः फलाच्च हेतोः सिद्धिरिनीतरेतरानन्तर्यलक्षणस्तस्य कोपो विपर्यासोऽन्यथाभावः स्यादित्यभिप्रायः । एवं हेतुफलयोः कार्यकारणभावादुपपत्तेरजातिः सर्वस्यानुत्पत्तिः परिदीपिता प्रकाशितान्त्योन्यपक्षदोषं ब्रुवद्भिर्वादिभिर्बुद्धैः पण्डितैरित्यर्थः ॥ १९ ॥यह अशक्ति [ तुम्हारा ] अपरिज्ञान-तत्त्वका अविवेक अर्थात् मूढ़ता ही है । अथवा तुमने जो एक-दूसरेका पौर्वापर्यरूप यह क्रम बतलाया है कि हेतुसे फलकी सिद्धि होती है और फलसे हेतुकी, उसका कोप-विपर्यास अर्थात् अन्यथाभाव हो जायगा—ऐसा इसका अभिप्राय है । इस प्रकार हेतु और फलका कार्यकारणभाव असम्भव होनेके कारण एक-दूसरेके पक्षका दोष बतलानेवाले प्रतिपक्षी बुद्धिमानों अर्थात् पण्डितोंने सबकी अजाति-अनुत्पत्ति ही प्रकाशित की है ॥ १९ ॥

ननु हेतुफलयोः कार्यकारणभाव इत्यस्माभिरुक्तं शब्दमात्रमाश्रित्यच्छलमिदं त्वयोक्तं पुत्राज्जन्म पितुर्यथा, विषाणवच्चासंबन्ध इत्यादि । न ह्यस्माभिरसिद्धाद्धेतोः फलसिद्धिरसिद्धाद्वा फलाद्धेतुसिद्धिरभ्यु-पूर्व०—हमने जो कहा कि हेतु और फलका परस्पर कार्य-कारणभाव है, सो तुमने हमारे शब्दमात्रको पकड़कर छलपूर्वक ऐसा कह दिया कि 'जैसे पुत्रसे पिताका जन्म होना है' '[ दायें-बायें ] सींगोंके समान [ उनका परस्पर ] सम्बन्ध ही नहीं हो सकता' इत्यादि । हमने असिद्ध हेतुसे फलकी सिद्धि अथवा असिद्ध फलसे हेतुकी सिद्धि कभी नहीं
१९६माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
पद्यता । किं तर्हि ? बीजाङ्कुर-वत्कार्यकारणभावोऽभ्युपगम्यत इति ।<br><br>अत्रोच्यते—मानी । तो फिर क्या माना है ? हम तो बीज और अङ्कुरके समान केवल उनका कार्य-कारणभाव मानते हैं ।<br><br>सिद्धान्ती—इसपर हमें यह कहना है कि—

बीजाङ्कुराख्यो दृष्टान्तः सदा साध्यसमो हि सः ।
न हि साध्यसमो हेतुः सिद्धौ साध्यस्य युज्यते ॥२०॥

बीजाङ्कुर नामका जो दृष्टान्त है वह तो सदा साध्यके ही समान है । और जो हेतु साध्यके ही सदृश होता है वह साध्यकी सिद्धिमें उपयोगी नहीं होता ॥ २० ॥

[बीजाङ्कुरदृष्टान्तस्य साध्यसमत्वम्]
बीजाङ्कुराख्यो दृष्टान्तो यः स साध्येन तुल्यो भवेदित्यभिप्रायः ।<br><br>ननु प्रत्यक्षः कार्यकारणभावो बीजाङ्कुरयोरनादिः ? न, पूर्वस्य पूर्वस्यापरवदादिमत्त्वाभ्युपगमात् । यथेदानीमुत्पन्नोऽपरोऽङ्कुरो बीजादादिमान्बीजं चापरमन्यस्मादङ्कुरादिति क्रमेणोत्पन्नत्वादादिमत् । एवं पूर्वः पूर्वोऽङ्कुरो बीजं च पूर्वं पूर्वमादिमदेवेतिबीजाङ्कुर नामका जो दृष्टान्त है वह तो साध्यके ही समान है—ऐसा मेरा अभिप्राय है । यदि कहो कि बीज और अङ्कुरका कार्य-कारणभाव तो प्रत्यक्ष ही अनादि है, तो ऐसी बात नहीं है क्योंकि उनमेंसे पूर्व-पूर्व [अङ्कुर और फल] को परवर्तियोंके समान आदिमान् माना गया है । जिस प्रकार इस समय बीजसे उत्पन्न हुआ दूसरा अङ्कुर आदिमान् है उसी प्रकार क्रमशः दूसरे अङ्कुरसे उत्पन्न हुआ दूसरा बीज भी आदिमान् है । इस प्रकार पूर्व-पूर्व अङ्कुर और पूर्व-पूर्व बीज आदिमान् ही है ।

शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण ३९७


प्रत्येकं सर्वस्य बीजाङ्कुरजातस्यादिमत्त्वात्कस्यचिदप्यनादित्वानुपपत्तिः। एवं हेतुफलानाम्।अतः सम्पूर्ण बीजाङ्कुरवर्गका प्रत्येक बीज और अङ्कुर आदिमान् होनेके कारण किसीका भी अनादि होना असम्भव है। यही न्याय हेतु और फलके विषयमें भी समझना चाहिये।
अथ बीजाङ्कुरसन्ततेरनादिमत्त्वमिति चेत् ? न,<br>(बीजाङ्कुर-सन्ततिनिरासः)<br>एकत्वानुपपत्तेः। न हि बीजाङ्कुरव्यतिरेकेण बीजाङ्कुरसन्ततिर्नामैकाभ्युपगम्यते हेतुफलसन्ततिर्वा तदनादित्ववादिभिः। तस्मात्सूक्तं हेतोः फलस्य चानादिः कथं तैरुपवर्ण्यत इति। तथा चान्यदप्यनुपपत्तेर्नच्छलमित्यभिप्रायः। न च लोके साध्यसमो हेतुः साध्यसिद्धौ सिद्धिनिमित्तं प्रयुज्यते प्रमाणकुशलैरित्यर्थः। हेतुरिति दृष्टान्तोऽत्राभिप्रेतः, गमकत्वात्। प्रकृतो हि दृष्टान्तो न हेतुरिति ॥ २० ॥यदि कहो कि बीजाङ्कुरपरम्परा तो अनादि हो ही सकती है; तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि उसका एकत्व नहीं माना गया। हेतु-फलका अनादित्व प्रतिपादन करनेवालोंने बीज और अंकुरसे भिन्न बीजाङ्कुरपरम्परा अथवा हेतु-फलपरम्परा नामका कोई एक स्वतन्त्र पदार्थ नहीं माना। अतः 'वे लोग हेतु और फलका अनादित्व किस प्रकार प्रतिपादन करते हैं' यह कथन बहुत ठीक है। इसके सिवा अनुपपत्ति होनेके कारण भी हमारा कथन छल नहीं है—ऐसा इसका तात्पर्य है। अभिप्राय यह है कि लोकमें प्रमाणकुशल पुरुषोंद्वारा साध्यकी सिद्धिके लिये साध्यके ही सदृश हेतुका प्रयोग नहीं किया जाता। यहाँ 'हेतु' शब्दका अभिप्राय दृष्टान्त है, क्योंकि वह उसीका ज्ञापक है; यहाँ दृष्टान्तका ही प्रकरण भी है—हेतुका नहीं ॥ २० ॥

१९८ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


अजातवाद-निरूपण

कथं बुद्धैरजातिः परिदीपितेत्याह—पण्डितोंने अजातिको ही किस प्रकार प्रकाशित किया है ? इसपर कहते हैं—

पूर्वापरापरिज्ञानमजातेः परिदीपकम् ।
जायमानाद्धि वै धर्मात्कथं पूर्वं न गृह्यते ॥ २१ ॥

[ हेतु और फलके ] पौर्वापर्यका जो अज्ञान है वह अनुत्पत्तिका ही प्रकाशक है, क्योंकि यदि कार्य [ सचमुच ] उत्पन्न हुआ होता तो उसका कारण क्यों न ग्रहण किया जाता ? ॥ २१ ॥

| यदेतद्धेतुफलयोः पूर्वापरापरि- | यह जो हेतु और फलके पौर्वा- | | ज्ञानं तच्चैतदजातेः परिदीपकम्- | पर्यका अज्ञान है वह अजातिका ही परिदीपक अर्थात् ज्ञापक है । यदि | | अवबोधकमित्यर्थः । जायमानो हि | कार्य उत्पन्न होता ग्रहण किया जाता है तो उससे पूर्ववर्ती कारण | | चेद्धर्मो गृह्यते, कथं तस्मात्पूर्वं | क्यों नहीं ग्रहण किया जाता ? उत्पन्न होनेवाली वस्तुको ग्रहण | | कारणं न गृह्यते । अवश्यं हि | करनेवाले पुरुषद्वारा उसकी उत्पत्ति- | | जायमानस्य ग्रहीत्रा तज्जनकं | का कारण भी अवश्य ही ग्रहण किया जाना चाहिये, क्योंकि जन्य | | ग्रहीतव्यम् । जन्यजनकयोः | और जनक पदार्थोंका सम्बन्ध | | संबन्धस्यानपेतत्वात् । तस्माद- | अनिवार्य है । इसलिये तात्पर्य यह है कि यह अजातिका ही प्रकाशक | | जातिपरिदीपकं तदित्यर्थः॥२१॥ | है ॥ २१ ॥ |


सदसदादिवादोंकी अनुपपत्ति

इतश्च न जायते किंचित्, यज्जायमानं वस्तु—इसलिये भी कोई वस्तु उत्पन्न नहीं होती, क्योंकि उत्पन्न होनेवाली वस्तु—

शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण १९९


स्वतो वा परतो वापि न किंचिद्वस्तु जायते ।
सदसत्सदसद्वापि न किंचिद्वस्तु जायते ॥ २२ ॥

स्वतः अथवा परतः [ किसी भी प्रकार ] कोई वस्तु उत्पन्न नहीं होती; क्योंकि सत्, असत् अथवा सदसत् ऐसी कोई भी वस्तु उत्पन्न नहीं होती ॥ २२ ॥

स्वतः परतः उभयतो वा सदसत्सदसद्वा न जायते न तस्य केनचिदपि प्रकारेण जन्म संभवति । न तावत्स्वयमेवापरिनिष्पन्नात्स्वतः स्वरूपात्स्वयमेव जायते यथा घटस्तस्मादेव घटात् । नापि परतोऽन्यस्मादन्यो यथा घटात्पटः पटात्पटान्तरम् । तथा नोभयतः, विरोधात्; यथा घटपटाभ्यां घटः पटो वा न जायते ।<br><br>ननु मृदो घटो जायते पितुश्च पुत्रः । सत्यम्, अस्ति जायत इति प्रत्ययः शब्दश्च मूढानाम् ।अपनेसे, दूसरेसे अथवा दोनोंहीसे सत्, असत् अथवा सदसद्रूपसे उत्पन्न नहीं होती—किसी भी प्रकार उसका जन्म होना सम्भव नहीं हैं । जिस प्रकार घड़ा उसी घड़ेसे उत्पन्न नहीं हो सकता उसी प्रकार कोई भी वस्तु स्वयं अपने अपरिनिष्पन्न ( पूर्णतया तैयार न हुए ) स्वरूपसे स्वतः ही उत्पन्न नहीं हो सकती । और न किसी अन्यसे ही अन्यकी उत्पत्ति हो सकती है; जैसे घटसे पटकी अथवा पटसे पटान्तरकी । तथा इसी तरह, विरोध होनेके कारण दोनोंसे भी किसीकी उत्पत्ति नहीं हो सकती; जिस प्रकार कि घट और पट दोनोंसे घट या पट कोई उत्पन्न नहीं हो सकता ।<br><br>यदि कहो कि मिट्टीसे घड़ा उत्पन्न होता है और पितासे पुत्रका जन्म होता है तो; ठीक है, परन्तु 'उत्पन्न होता है' ऐसा शब्द और उसकी प्रतीति मूर्खोंको ही हुआ
२००माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

संस्कृत (मूल/भाष्य)हिन्दी अनुवाद
तावेव शब्दप्रत्ययौ विवेकिभिः परीक्ष्येते किं सत्यमेदं तावुत मृषेति । यावता परीक्ष्यमाणे शब्दप्रत्ययविषयं वस्तु घटपुत्रादिलक्षणं शब्दमात्रमेव तत् । "वाचारम्भणम्" (छा० उ० ६।१।४) इति श्रुतेः ।करती हैं। विवेकी लोग तो उन शब्द और प्रतीतिकी—वे सत्य हैं अथवा मिथ्या—इस प्रकार परीक्षा किया करते हैं। किन्तु परीक्षा की जानेपर तो शब्द और उसकी प्रतीतिका विषयभूत घट अथवा पुत्रादिरूप वस्तु केवल शब्दमात्र ही है; जैसा कि "वाचारम्भणम्" इत्यादि श्रुतिसे प्रमाणित होता है।
सच्चेन्न जायते सत्त्वान्मृत्पित्रादिवत् । यद्यसत्तथापि न जायतेऽसत्त्वादेव शशविषाणादिवत् ।यदि वस्तु सत् (विद्यमान) है तो मृत्तिका और पिता आदिके समान सत् होनेके कारण ही उत्पन्न नहीं हो सकती। यदि असत् है, तो भी शशशृङ्गादिके समान असत् होनेके कारण ही उत्पन्न नहीं हो सकती।
अथ सदसत्तथापि न जायते विरुद्धस्यैकस्यासंभवात् । अतो न किंचिद्वस्तु जायत इति सिद्धम् ।और यदि सदसत् है तो भी उत्पन्न नहीं हो सकती क्योंकि एक ही वस्तु विरुद्ध स्वभाववाली होनी असम्भव है। अतः यही सिद्ध हुआ कि कोई भी वस्तु उत्पन्न नहीं होती।
येषां पुनर्जन्मिरेव जायत इति क्रियाकारकफलैकत्वम् अभ्युपगम्यते क्षणिकत्वं च वस्तुनः, ते दूरत एवइसके विपरीत जिन (बौद्धों) के मतमें जन्मक्रियाका ही जन्म होता है—इस प्रकार जो क्रिया, कारक और फलकी एकता तथा वस्तुका क्षणिकत्व स्वीकार करते हैं वे तो बिल्कुल ही

शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २०१


न्यायापेताः । इदमित्थमित्यव-<br><br>धारणक्षणान्तरानवस्थानादननु-<br><br>भूतस्य स्मृत्यनुपपत्तेश्च ॥ २२ ॥युक्तिशून्य हैं क्योंकि 'यह ऐसा है' इस प्रकार निश्चय करनेके क्षणसे दूसरे ही क्षणमें स्थिति न रहनेके कारण [ पदार्थका अनुभव नहीं हो सकता ]; और बिना अनुभव हुए पदार्थकी स्मृति होना असम्भव है ॥२२॥

हेतु-फलका अनादित्व उनकी अनुत्पत्तिका सूचक है

किं च हेतुफलयोरनादित्वम-<br><br>भ्युपगच्छता त्वया बलाद्धेतुफल-<br><br>योरजन्मैवाभ्युपगतं स्यात् ।<br><br>तत्कथम् ?यही नहीं, हेतु और फलका अनादित्व स्वीकार करनेवाले तुम्हारे द्वारा तो बलात्कारसे हेतु और फलकी अनुत्पत्ति ही स्वीकार कर ली गयी है।<br><br>सो किस प्रकार ?

हेतुर्न जायतेऽनादेः फलं चापि स्वभावतः ।
आदिर्न विद्यते यस्य तस्य ह्यादिर्न विद्यते ॥ २३ ॥

अनादि फलसे कोई हेतु उत्पन्न नहीं हो सकता और इसी प्रकार स्वभावसे ही [ अनादि हेतुसे ] फलकी भी उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि जिस वस्तुका कोई आदि ( कारण ) नहीं होता उसका आदि ( जन्म ) भी नहीं होता ॥ २३ ॥

अनादेरादिरहितात्फलाद्धेतुर्न<br><br>जायते । न ह्यनुत्पन्नादनादेः<br><br>फलाद्धेतोर्जन्मेष्यते त्वया । फलं<br><br>चादिरहितादनादेर्हेतोरजात्स्व-<br><br>भावत एव निर्निमित्तं जायत<br><br>इति नाभ्युपगम्यते ।अनादि अर्थात् आदिरहित फल-से हेतु उत्पन्न नहीं होता । जिसकी कभी उत्पत्ति नहीं हुई ऐसे अनादि फलसे तो तुम हेतुका जन्म मानते ही नहीं हो; और न ऐसा ही मानते हो कि अनादि—आदिरहित अर्थात् अजन्मा हेतुसे बिना किसी निमित्तके स्वभावतः ही फलकी उत्पत्ति हो जाती है ।

२०२ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


तस्मादनादित्वमभ्युपगच्छता त्वया हेतुफलयोरजन्मैवाभ्युपगम्यते । यस्यानादिः कारणं न विद्यते यस्य लोके तस्य ह्यादिः पूर्वोक्ता जातिर्न विद्यते । कारणवत एव ह्यादिरभ्युपगम्यते नाकारणवतः ॥ २३ ॥अतः हेतु और फलका अनादित्व माननेवाले तुम्हारे द्वारा उनकी अनुत्पत्ति ही स्वीकार कर ली जाती है, क्योंकि लोकमें जिस वस्तुका आदि-कारण नहीं होता उसका आदि अर्थात् पूर्वोक्त जन्म भी नहीं होता। जिसका कोई कारण होता है उसीका जन्म भी माना जाता है; कारणरहित पदार्थका नहीं ॥२३॥

बाह्यार्थवाद-निरूपण

उक्तस्यैवार्थस्य दृढीकरणचिकीर्षया पुनराक्षिपति—पूर्वोक्त अर्थको ही पुष्ट करनेकी इच्छासे फिर दोष प्रदर्शित करते हैं—

प्रज्ञप्तेः सनिमित्तत्वमन्यथा द्वयनाशतः ।
संक्लेशस्योपलब्धेश्च परतन्त्रास्तिता मता ॥ २४ ॥

प्रज्ञप्ति (शब्दस्पर्शादि ज्ञान) को सनिमित्त (बाह्यविषययुक्त) मानना चाहिये; नहीं तो [शब्दस्पर्शादि] द्वैतका नाश हो जायगा । इसके सिवा [अग्निदाह आदि] क्लेशकी उपलब्धिसे भी अन्य मतावलम्बियोंके शास्त्रद्वारा प्रतिपादित द्वैतकी सत्ता मानी गयी है ॥ २४ ॥

प्रज्ञानं प्रज्ञप्तिः शब्दादिप्रतीतिस्तस्याः सनिमित्तत्वम्; निमित्तं कारणं विषय इत्येतत्सनिमित्तत्वं सविषयत्वं स्वात्मव्यतिरिक्तविषयतेत्येतत् प्रतिजानीमहे । न हि निर्विषयाप्रज्ञान अर्थात् शब्दादि-प्रतीतिका नाम प्रज्ञप्ति है । वह सनिमित्त है । निमित्त—कारण अर्थात् विषयको कहते हैं; अतः सनिमित्त—सविषय यानी अपनेसे अतिरिक्त विषयके सहित है—ऐसी हम [उसके विषयमें] प्रतिज्ञा करते हैं ।
शां० भा० ]अलातशान्तिप्रकरण२०३
प्रज्ञप्तिः शब्दादिप्रतीतिः स्यात् , तस्याः सनिमित्तत्वात् । अन्यथा निर्विषयत्वे शब्दस्पर्शनीलपीत-लोहितादिप्रत्ययवैचित्र्यस्य द्वयस्य नाशतो नाशोऽभावः प्रसज्येतेत्यर्थः । न च प्रत्ययवैचित्र्यस्य द्वयस्याभावोऽस्ति प्रत्यक्षत्वात् । अतः प्रत्ययवैचित्र्यस्य द्वयस्य दर्शनात्, परेषां तन्त्रं परतन्त्रमित्यन्यशास्त्रम्, तस्य परतन्त्रस्य परतन्त्राश्रयस्य बाह्यार्थस्य ज्ञानव्यतिरिक्तस्यास्तिता मताभिप्रेता । <br><br> न हि प्रज्ञप्तेः प्रकाशमात्रस्वरूपाया नीलपीतादिबाह्यालम्बनवैचित्र्यमन्तरेण स्वभावभेदेनैव वैचित्र्यं संभवति । स्फटिकस्येव नीलाद्युपाध्याश्रयैर्विना वैचित्र्यं न घटत इत्यभिप्रायः ।हमारा कथन है कि ] प्रज्ञप्ति यानी शब्दादि-प्रतीति निर्विषया नहीं हो सकती, क्योंकि वह सनिमित्ता है । अन्यथा उसे निर्विषय माननेपर तो शब्द, स्पर्श एवं नील, पीत और लोहित आदि प्रतीतिकी विचित्रतारूप द्वैतका नाश हो जायगा अर्थात् उसके नाश यानी अभावका प्रसंग उपस्थित हो जायगा और प्रत्यक्ष-सिद्ध होनेके कारण प्रत्ययवैचित्र्यरूप द्वैतका अभाव है नहीं । अतः प्रत्ययवैचित्र्यरूप द्वैतकी उपलब्धिसे, परतन्त्र यानी दूसरोंके शास्त्र; उन परकीय तन्त्रोंका अर्थात् परकीय तन्त्रोंके आश्रित जो प्रज्ञानके अतिरिक्त अन्य बाह्य पदार्थ हैं उनका अस्तित्व भी स्वीकार किया गया है । <br><br> केवल प्रकाशमात्रस्वरूपा प्रज्ञप्तिकी यह विचित्रता नील-पीतादि बाह्य आलम्बनोंकी विचित्रताके सिवा केवल स्वभावभेदसे ही होनी सम्भव नहीं है । तात्पर्य यह है कि स्फटिकके समान, नील-पीतादि उपाधियोंको आश्रय किये बिना, यह विचित्रता नहीं हो सकती ।