माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण १९१
हेतु और फलके अन्योन्यकारणत्वमें दोष
| “यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्” (बृ० उ० २।४।१४) इति परमार्थतो द्वैताभावः श्रुत्योक्तस्तमाश्रित्याह— | “जिस अवस्थामें इसकी दृष्टिमें सब आत्मा ही हो गया है” इस श्रुतिने जो परमार्थतः द्वैतका अभाव बतलाया है, उसीको आश्रित करके कहते हैं— |
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हेतोरादिः फलं येषामादिर्हेतुः फलस्य च ।
हेतोः फलस्य चानादिः कथं तैरुपवर्ण्यते ॥ १४ ॥
जिनके मतमें हेतुका कारण फल है और फलका कारण हेतु है वे हेतु और फलके अनादित्वका प्रतिपादन कैसे करते हैं ? ॥ १४ ॥
| हेतोर्धर्मादेरादिः कारणं देहादिसंघातः फलं येषां वादिनाम् । तथादिः कारणं हेतुर्धर्माधर्मादिः फलस्य च देहादिसंघातस्य । एवं हेतुफलयोरितरेतरकार्यकारणत्वेनादिमत्त्वं ब्रुवद्भिरेवं हेतोः फलस्य चानादित्वं कथं तैरुपवर्ण्यते ? विप्रतिषिद्धमित्यर्थः । न हि नित्यस्य कूटस्थस्यात्मनो हेतुफलात्मता संभवति ॥ १४ ॥ | जिन वादियोंके मतमें हेतु अर्थात् धर्मादिका आदि-कारण देहादिसंघातरूप फल है तथा देहादिसंघातरूप फलका आदि-कारण धर्माधर्मादि हेतु है*—इस प्रकार हेतु और फलका एक-दूसरेके कार्य-कारणरूपसे कारणत्व बतलानेवाले उन लोगोंद्वारा हेतु और फलका अनादित्व किस प्रकार प्रतिपादन किया जाता है ? अर्थात् उनका यह कथन सर्वथा विरुद्ध है । नित्य कूटस्थ आत्माकी हेतुफलात्मकता तो किसी प्रकार भी सम्भव नहीं है ॥ १४ ॥ |
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* अर्थात् जो धर्मादिको शरीरादिकी प्राप्तिका कारण और शरीरको धर्मादि-सम्पादनका कारण मानते हैं ।