| १९२ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| कथं तैरविरुद्धमभ्युपगम्यत इत्युच्यते— | वे किस प्रकार विरुद्ध मतको मानते हैं, सो बतलाया जाता है— |
हेतोरादिः फलं येषामादिर्हेतुः फलस्य च ।
तथा जन्म भवेत्तेषां पुत्राज्जन्म पितुर्यथा ॥ १५ ॥
जिनके मतमें हेतुका कारण फल है और फलका कारण हेतु है उनकी [ मानी हुई ] उत्पत्ति ऐसी ही है जैसे पुत्रसे पिताका जन्म होना ॥ १५ ॥
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| हेतुजन्यादेव फलाद्धेतोर्जन्माभ्युपगच्छतां तेषामीदृशो विरोध उक्तो भवति यथा पुत्राज्जन्म पितुः ॥ १५ ॥ | हेतुसे उत्पन्न होनेवाले फलसे ही हेतुका जन्म माननेवाले उन लोगोंके मतमें ऐसा ही विरोध कहा जाता है जैसे पुत्रसे पिताका जन्म बतलानेमें ॥ १५ ॥ |
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| यथोक्तो विरोधो न युक्तोऽभ्युपगन्तुमिति चेन्मन्यसे— | यदि तुम ऐसा मानते हो कि उपर्युक्त विरोध मानना उचित नहीं है तो— |
संभवे हेतुफलयोरेषितव्यः क्रमस्त्वया ।
युगपत्संभवे यस्मादसंबन्धो विषाणवत् ॥ १६ ॥
तुम्हें हेतु और फलकी उत्पत्तिमें क्रम स्वीकार करना चाहिये, क्योंकि उनके साथ-साथ उत्पन्न होनेमें तो [ दायें-बायें ] सींगोंके समान परस्पर [ कार्य-कारणरूप ] सम्बन्ध ही नहीं हो सकता ॥ १६ ॥
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| संभवे हेतुफलयोरुत्पत्तौ क्रम एषितव्यस्त्वयान्वेष्टव्यो हेतुः पूर्वं पश्चात्फलं चेति । इतश्च | तुम्हें हेतु और फलकी उत्पत्तिमें क्रम अर्थात् पहले हेतु होता है और फिर फल—इस प्रकार दोनोंका पौर्वापर्य खोजना चाहिये; क्योंकि |