माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
पृष्ठ 213, कुल 301 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 213
शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण १९३
| युगपत्संभवे यस्माद्धेतुफलयोः कार्यकारणत्वेनासंबन्धः, यथा युगपत्संभवतोः सव्येतरगोविषाणयोः ॥ १६ ॥ | जिस प्रकार गौके साथ-साथ उत्पन्न होनेवाले दायें और बायें सींगोंका परस्पर सम्बन्ध नहीं होता उसी प्रकार साथ-साथ उत्पन्न होनेपर तो हेतु और फलका परस्पर कार्य-कारण-रूपसे सम्बन्ध ही नहीं होगा ॥१६॥ |
|---|
| कथमसंबन्धः ? इत्याह— | उनका किस प्रकार सम्बन्ध नहीं होगा ? सो बतलाते हैं— |
|---|
फलादुत्पद्यमानः सन्न ते हेतुः प्रसिध्यति ।
अप्रसिद्धः कथं हेतुः फलमुत्पादयिष्यति ॥ १७ ॥
तुम्हारे मतमें यदि हेतु फलसे उत्पन्न होता है तो वह [ हेतुरूपसे ] सिद्ध ही नहीं हो सकता; और असिद्ध हेतु फलको उत्पन्न कैसे करेगा ? ॥१७॥
| जन्यात्स्वतोलब्धात्मकात् फलादुत्पद्यमानः सञ्शशविषाणादेरिवासतो न हेतुः प्रसिध्यति जन्म न लभते । अलब्धात्मकोऽप्रसिद्धः सञ्शशविषाणादिकल्पस्तव कथं फलमुत्पादयिष्यति ? न हीतरेतरापेक्षसिद्धयोः शशविषाणकल्पयोः कार्यकारणभावेन संबन्धः | जन्य अर्थात् जो स्वतः प्राप्त नहीं है उस शशशृङ्गके समान असत् फलसे उत्पन्न होनेवाला होनेपर तो हेतु ही सिद्ध नहीं होता अर्थात् उसीका जन्म नहीं हो सकता । इस प्रकार शशशृङ्गके समान जिसकी स्वतः उपलब्धि नहीं है वह अप्रसिद्ध हेतु तुम्हारे मतमें किस प्रकार फल उत्पन्न कर देगा ? एक-दूसरेकी अपेक्षासे सिद्ध होनेवाले तथा शशशृङ्गके समान सर्वथा असत् पदार्थोंका कार्य-कारणभावसे अथवा किसी और प्रकार |
|---|
२५–२६