| १९४ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| क्वचिद्दृष्टः, अन्यथा वेत्यभिप्रायः ॥ १७ ॥ | कभी सम्बन्ध नहीं देखा गया—यह इसका अभिप्राय है ॥ १७ ॥ |
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यदि हेतोः फलात्सिद्धिः फलसिद्धिश्च हेतुतः ।
कतरत्पूर्वनिष्पन्नं यस्य सिद्धिरपेक्षया ॥ १८ ॥
[ तुम्हारे मतमें ] यदि फलसे हेतुकी सिद्धि होती है और हेतुसे फलकी सिद्धि होती है तो उनमें पहले कौन हुआ ? जिसकी अपेक्षासे कि दूसरेका आविर्भाव माना जाय ? ॥ १८ ॥
| असंबन्धतादोषेणापोदितेऽपि हेतुफलयोः कार्यकारणभावे यदि हेतुफलयोरन्योन्यसिद्धिरभ्युपगम्यत एव त्वया कतरत्पूर्वनिष्पन्नं हेतुफलयोर्यस्य पश्चाद्भाविनः सिद्धिः स्यात्पूर्वसिद्धयपेक्षया तद्ब्रूहीत्यर्थः ॥१८॥ | हेतु और फलके कार्य-कारणभावका असम्बन्धतादोषसे निराकरण कर दिया जानेपर भी यदि तुम हेतु और फलकी एक-दूसरेसे सिद्धि मानते ही हो तो इन हेतु और फलमेंसे पहले कौन हुआ—सो बतलाओ; जिसकी पूर्वसिद्धिकी अपेक्षासे पीछे होनेवालेकी सिद्धि मानी जाय ?—यह इसका तात्पर्य है ॥१८॥ |
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| अथैतन्न शक्यते वक्तुमिति मन्यसे, | और यदि तुम ऐसा मानते हो, कि यह नहीं बतलाया जा सकता तो— |
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अशक्तिरपरिज्ञानं क्रमकोपोऽथ वा पुनः ।
एवं हि सर्वथा बुद्धैरजातिः परिदीपिता ॥ १९ ॥
यह अशक्ति (असामर्थ्य) अज्ञान है, अथवा फिर तो इससे उपर्युक्त क्रमका भी विपर्यय हो जाता है [ क्योंकि इनके पूर्वापरत्वका ज्ञान न होनेसे इनमें जो पूर्ववर्ती है वह कारण है और पीछे होनेवाला कार्य है ऐसा