भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 214
१९४माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
क्वचिद्दृष्टः, अन्यथा वेत्यभिप्रायः ॥ १७ ॥कभी सम्बन्ध नहीं देखा गया—यह इसका अभिप्राय है ॥ १७ ॥

यदि हेतोः फलात्सिद्धिः फलसिद्धिश्च हेतुतः ।

कतरत्पूर्वनिष्पन्नं यस्य सिद्धिरपेक्षया ॥ १८ ॥

[ तुम्हारे मतमें ] यदि फलसे हेतुकी सिद्धि होती है और हेतुसे फलकी सिद्धि होती है तो उनमें पहले कौन हुआ ? जिसकी अपेक्षासे कि दूसरेका आविर्भाव माना जाय ? ॥ १८ ॥

असंबन्धतादोषेणापोदितेऽपि हेतुफलयोः कार्यकारणभावे यदि हेतुफलयोरन्योन्यसिद्धिरभ्युपगम्यत एव त्वया कतरत्पूर्वनिष्पन्नं हेतुफलयोर्यस्य पश्चाद्भाविनः सिद्धिः स्यात्पूर्वसिद्धयपेक्षया तद्ब्रूहीत्यर्थः ॥१८॥हेतु और फलके कार्य-कारणभावका असम्बन्धतादोषसे निराकरण कर दिया जानेपर भी यदि तुम हेतु और फलकी एक-दूसरेसे सिद्धि मानते ही हो तो इन हेतु और फलमेंसे पहले कौन हुआ—सो बतलाओ; जिसकी पूर्वसिद्धिकी अपेक्षासे पीछे होनेवालेकी सिद्धि मानी जाय ?—यह इसका तात्पर्य है ॥१८॥
अथैतन्न शक्यते वक्तुमिति मन्यसे,और यदि तुम ऐसा मानते हो, कि यह नहीं बतलाया जा सकता तो—

अशक्तिरपरिज्ञानं क्रमकोपोऽथ वा पुनः ।

एवं हि सर्वथा बुद्धैरजातिः परिदीपिता ॥ १९ ॥

यह अशक्ति (असामर्थ्य) अज्ञान है, अथवा फिर तो इससे उपर्युक्त क्रमका भी विपर्यय हो जाता है [ क्योंकि इनके पूर्वापरत्वका ज्ञान न होनेसे इनमें जो पूर्ववर्ती है वह कारण है और पीछे होनेवाला कार्य है ऐसा