माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण १९५
कोई नियम भी नहीं रह सकता ] । इस प्रकार उन बुद्धिमानोंने सर्वथा अजातिको ही प्रकाशित किया है ॥ १९ ॥
| सेयमशक्तिरपरिज्ञानं तत्त्वाविवेको मूढतेत्यर्थः । अथ वा योऽयं त्वयोक्तः क्रमो हेतोः फलस्य सिद्धिः फलाच्च हेतोः सिद्धिरिनीतरेतरानन्तर्यलक्षणस्तस्य कोपो विपर्यासोऽन्यथाभावः स्यादित्यभिप्रायः । एवं हेतुफलयोः कार्यकारणभावादुपपत्तेरजातिः सर्वस्यानुत्पत्तिः परिदीपिता प्रकाशितान्त्योन्यपक्षदोषं ब्रुवद्भिर्वादिभिर्बुद्धैः पण्डितैरित्यर्थः ॥ १९ ॥ | यह अशक्ति [ तुम्हारा ] अपरिज्ञान-तत्त्वका अविवेक अर्थात् मूढ़ता ही है । अथवा तुमने जो एक-दूसरेका पौर्वापर्यरूप यह क्रम बतलाया है कि हेतुसे फलकी सिद्धि होती है और फलसे हेतुकी, उसका कोप-विपर्यास अर्थात् अन्यथाभाव हो जायगा—ऐसा इसका अभिप्राय है । इस प्रकार हेतु और फलका कार्यकारणभाव असम्भव होनेके कारण एक-दूसरेके पक्षका दोष बतलानेवाले प्रतिपक्षी बुद्धिमानों अर्थात् पण्डितोंने सबकी अजाति-अनुत्पत्ति ही प्रकाशित की है ॥ १९ ॥ |
| ननु हेतुफलयोः कार्यकारणभाव इत्यस्माभिरुक्तं शब्दमात्रमाश्रित्यच्छलमिदं त्वयोक्तं पुत्राज्जन्म पितुर्यथा, विषाणवच्चासंबन्ध इत्यादि । न ह्यस्माभिरसिद्धाद्धेतोः फलसिद्धिरसिद्धाद्वा फलाद्धेतुसिद्धिरभ्यु- | पूर्व०—हमने जो कहा कि हेतु और फलका परस्पर कार्य-कारणभाव है, सो तुमने हमारे शब्दमात्रको पकड़कर छलपूर्वक ऐसा कह दिया कि 'जैसे पुत्रसे पिताका जन्म होना है' '[ दायें-बायें ] सींगोंके समान [ उनका परस्पर ] सम्बन्ध ही नहीं हो सकता' इत्यादि । हमने असिद्ध हेतुसे फलकी सिद्धि अथवा असिद्ध फलसे हेतुकी सिद्धि कभी नहीं |