भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 216
१९६माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
पद्यता । किं तर्हि ? बीजाङ्कुर-वत्कार्यकारणभावोऽभ्युपगम्यत इति ।<br><br>अत्रोच्यते—मानी । तो फिर क्या माना है ? हम तो बीज और अङ्कुरके समान केवल उनका कार्य-कारणभाव मानते हैं ।<br><br>सिद्धान्ती—इसपर हमें यह कहना है कि—

बीजाङ्कुराख्यो दृष्टान्तः सदा साध्यसमो हि सः ।
न हि साध्यसमो हेतुः सिद्धौ साध्यस्य युज्यते ॥२०॥

बीजाङ्कुर नामका जो दृष्टान्त है वह तो सदा साध्यके ही समान है । और जो हेतु साध्यके ही सदृश होता है वह साध्यकी सिद्धिमें उपयोगी नहीं होता ॥ २० ॥

[बीजाङ्कुरदृष्टान्तस्य साध्यसमत्वम्]
बीजाङ्कुराख्यो दृष्टान्तो यः स साध्येन तुल्यो भवेदित्यभिप्रायः ।<br><br>ननु प्रत्यक्षः कार्यकारणभावो बीजाङ्कुरयोरनादिः ? न, पूर्वस्य पूर्वस्यापरवदादिमत्त्वाभ्युपगमात् । यथेदानीमुत्पन्नोऽपरोऽङ्कुरो बीजादादिमान्बीजं चापरमन्यस्मादङ्कुरादिति क्रमेणोत्पन्नत्वादादिमत् । एवं पूर्वः पूर्वोऽङ्कुरो बीजं च पूर्वं पूर्वमादिमदेवेतिबीजाङ्कुर नामका जो दृष्टान्त है वह तो साध्यके ही समान है—ऐसा मेरा अभिप्राय है । यदि कहो कि बीज और अङ्कुरका कार्य-कारणभाव तो प्रत्यक्ष ही अनादि है, तो ऐसी बात नहीं है क्योंकि उनमेंसे पूर्व-पूर्व [अङ्कुर और फल] को परवर्तियोंके समान आदिमान् माना गया है । जिस प्रकार इस समय बीजसे उत्पन्न हुआ दूसरा अङ्कुर आदिमान् है उसी प्रकार क्रमशः दूसरे अङ्कुरसे उत्पन्न हुआ दूसरा बीज भी आदिमान् है । इस प्रकार पूर्व-पूर्व अङ्कुर और पूर्व-पूर्व बीज आदिमान् ही है ।