माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
पृष्ठ 217, कुल 301 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 217
शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण ३९७
| प्रत्येकं सर्वस्य बीजाङ्कुरजातस्यादिमत्त्वात्कस्यचिदप्यनादित्वानुपपत्तिः। एवं हेतुफलानाम्। | अतः सम्पूर्ण बीजाङ्कुरवर्गका प्रत्येक बीज और अङ्कुर आदिमान् होनेके कारण किसीका भी अनादि होना असम्भव है। यही न्याय हेतु और फलके विषयमें भी समझना चाहिये। |
|---|---|
| अथ बीजाङ्कुरसन्ततेरनादिमत्त्वमिति चेत् ? न,<br>(बीजाङ्कुर-सन्ततिनिरासः)<br>एकत्वानुपपत्तेः। न हि बीजाङ्कुरव्यतिरेकेण बीजाङ्कुरसन्ततिर्नामैकाभ्युपगम्यते हेतुफलसन्ततिर्वा तदनादित्ववादिभिः। तस्मात्सूक्तं हेतोः फलस्य चानादिः कथं तैरुपवर्ण्यत इति। तथा चान्यदप्यनुपपत्तेर्नच्छलमित्यभिप्रायः। न च लोके साध्यसमो हेतुः साध्यसिद्धौ सिद्धिनिमित्तं प्रयुज्यते प्रमाणकुशलैरित्यर्थः। हेतुरिति दृष्टान्तोऽत्राभिप्रेतः, गमकत्वात्। प्रकृतो हि दृष्टान्तो न हेतुरिति ॥ २० ॥ | यदि कहो कि बीजाङ्कुरपरम्परा तो अनादि हो ही सकती है; तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि उसका एकत्व नहीं माना गया। हेतु-फलका अनादित्व प्रतिपादन करनेवालोंने बीज और अंकुरसे भिन्न बीजाङ्कुरपरम्परा अथवा हेतु-फलपरम्परा नामका कोई एक स्वतन्त्र पदार्थ नहीं माना। अतः 'वे लोग हेतु और फलका अनादित्व किस प्रकार प्रतिपादन करते हैं' यह कथन बहुत ठीक है। इसके सिवा अनुपपत्ति होनेके कारण भी हमारा कथन छल नहीं है—ऐसा इसका तात्पर्य है। अभिप्राय यह है कि लोकमें प्रमाणकुशल पुरुषोंद्वारा साध्यकी सिद्धिके लिये साध्यके ही सदृश हेतुका प्रयोग नहीं किया जाता। यहाँ 'हेतु' शब्दका अभिप्राय दृष्टान्त है, क्योंकि वह उसीका ज्ञापक है; यहाँ दृष्टान्तका ही प्रकरण भी है—हेतुका नहीं ॥ २० ॥ |