माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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अजातवाद-निरूपण
| कथं बुद्धैरजातिः परिदीपितेत्याह— | पण्डितोंने अजातिको ही किस प्रकार प्रकाशित किया है ? इसपर कहते हैं— |
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पूर्वापरापरिज्ञानमजातेः परिदीपकम् ।
जायमानाद्धि वै धर्मात्कथं पूर्वं न गृह्यते ॥ २१ ॥
[ हेतु और फलके ] पौर्वापर्यका जो अज्ञान है वह अनुत्पत्तिका ही प्रकाशक है, क्योंकि यदि कार्य [ सचमुच ] उत्पन्न हुआ होता तो उसका कारण क्यों न ग्रहण किया जाता ? ॥ २१ ॥
| यदेतद्धेतुफलयोः पूर्वापरापरि- | यह जो हेतु और फलके पौर्वा- | | ज्ञानं तच्चैतदजातेः परिदीपकम्- | पर्यका अज्ञान है वह अजातिका ही परिदीपक अर्थात् ज्ञापक है । यदि | | अवबोधकमित्यर्थः । जायमानो हि | कार्य उत्पन्न होता ग्रहण किया जाता है तो उससे पूर्ववर्ती कारण | | चेद्धर्मो गृह्यते, कथं तस्मात्पूर्वं | क्यों नहीं ग्रहण किया जाता ? उत्पन्न होनेवाली वस्तुको ग्रहण | | कारणं न गृह्यते । अवश्यं हि | करनेवाले पुरुषद्वारा उसकी उत्पत्ति- | | जायमानस्य ग्रहीत्रा तज्जनकं | का कारण भी अवश्य ही ग्रहण किया जाना चाहिये, क्योंकि जन्य | | ग्रहीतव्यम् । जन्यजनकयोः | और जनक पदार्थोंका सम्बन्ध | | संबन्धस्यानपेतत्वात् । तस्माद- | अनिवार्य है । इसलिये तात्पर्य यह है कि यह अजातिका ही प्रकाशक | | जातिपरिदीपकं तदित्यर्थः॥२१॥ | है ॥ २१ ॥ |
सदसदादिवादोंकी अनुपपत्ति
| इतश्च न जायते किंचित्, यज्जायमानं वस्तु— | इसलिये भी कोई वस्तु उत्पन्न नहीं होती, क्योंकि उत्पन्न होनेवाली वस्तु— |
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