भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण १९९


स्वतो वा परतो वापि न किंचिद्वस्तु जायते ।
सदसत्सदसद्वापि न किंचिद्वस्तु जायते ॥ २२ ॥

स्वतः अथवा परतः [ किसी भी प्रकार ] कोई वस्तु उत्पन्न नहीं होती; क्योंकि सत्, असत् अथवा सदसत् ऐसी कोई भी वस्तु उत्पन्न नहीं होती ॥ २२ ॥

स्वतः परतः उभयतो वा सदसत्सदसद्वा न जायते न तस्य केनचिदपि प्रकारेण जन्म संभवति । न तावत्स्वयमेवापरिनिष्पन्नात्स्वतः स्वरूपात्स्वयमेव जायते यथा घटस्तस्मादेव घटात् । नापि परतोऽन्यस्मादन्यो यथा घटात्पटः पटात्पटान्तरम् । तथा नोभयतः, विरोधात्; यथा घटपटाभ्यां घटः पटो वा न जायते ।<br><br>ननु मृदो घटो जायते पितुश्च पुत्रः । सत्यम्, अस्ति जायत इति प्रत्ययः शब्दश्च मूढानाम् ।अपनेसे, दूसरेसे अथवा दोनोंहीसे सत्, असत् अथवा सदसद्रूपसे उत्पन्न नहीं होती—किसी भी प्रकार उसका जन्म होना सम्भव नहीं हैं । जिस प्रकार घड़ा उसी घड़ेसे उत्पन्न नहीं हो सकता उसी प्रकार कोई भी वस्तु स्वयं अपने अपरिनिष्पन्न ( पूर्णतया तैयार न हुए ) स्वरूपसे स्वतः ही उत्पन्न नहीं हो सकती । और न किसी अन्यसे ही अन्यकी उत्पत्ति हो सकती है; जैसे घटसे पटकी अथवा पटसे पटान्तरकी । तथा इसी तरह, विरोध होनेके कारण दोनोंसे भी किसीकी उत्पत्ति नहीं हो सकती; जिस प्रकार कि घट और पट दोनोंसे घट या पट कोई उत्पन्न नहीं हो सकता ।<br><br>यदि कहो कि मिट्टीसे घड़ा उत्पन्न होता है और पितासे पुत्रका जन्म होता है तो; ठीक है, परन्तु 'उत्पन्न होता है' ऐसा शब्द और उसकी प्रतीति मूर्खोंको ही हुआ