माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
पृष्ठ 220, कुल 301 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 220
| २०० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| संस्कृत (मूल/भाष्य) | हिन्दी अनुवाद |
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| तावेव शब्दप्रत्ययौ विवेकिभिः परीक्ष्येते किं सत्यमेदं तावुत मृषेति । यावता परीक्ष्यमाणे शब्दप्रत्ययविषयं वस्तु घटपुत्रादिलक्षणं शब्दमात्रमेव तत् । "वाचारम्भणम्" (छा० उ० ६।१।४) इति श्रुतेः । | करती हैं। विवेकी लोग तो उन शब्द और प्रतीतिकी—वे सत्य हैं अथवा मिथ्या—इस प्रकार परीक्षा किया करते हैं। किन्तु परीक्षा की जानेपर तो शब्द और उसकी प्रतीतिका विषयभूत घट अथवा पुत्रादिरूप वस्तु केवल शब्दमात्र ही है; जैसा कि "वाचारम्भणम्" इत्यादि श्रुतिसे प्रमाणित होता है। |
| सच्चेन्न जायते सत्त्वान्मृत्पित्रादिवत् । यद्यसत्तथापि न जायतेऽसत्त्वादेव शशविषाणादिवत् । | यदि वस्तु सत् (विद्यमान) है तो मृत्तिका और पिता आदिके समान सत् होनेके कारण ही उत्पन्न नहीं हो सकती। यदि असत् है, तो भी शशशृङ्गादिके समान असत् होनेके कारण ही उत्पन्न नहीं हो सकती। |
| अथ सदसत्तथापि न जायते विरुद्धस्यैकस्यासंभवात् । अतो न किंचिद्वस्तु जायत इति सिद्धम् । | और यदि सदसत् है तो भी उत्पन्न नहीं हो सकती क्योंकि एक ही वस्तु विरुद्ध स्वभाववाली होनी असम्भव है। अतः यही सिद्ध हुआ कि कोई भी वस्तु उत्पन्न नहीं होती। |
| येषां पुनर्जन्मिरेव जायत इति क्रियाकारकफलैकत्वम् अभ्युपगम्यते क्षणिकत्वं च वस्तुनः, ते दूरत एव | इसके विपरीत जिन (बौद्धों) के मतमें जन्मक्रियाका ही जन्म होता है—इस प्रकार जो क्रिया, कारक और फलकी एकता तथा वस्तुका क्षणिकत्व स्वीकार करते हैं वे तो बिल्कुल ही |