भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २०१


न्यायापेताः । इदमित्थमित्यव-<br><br>धारणक्षणान्तरानवस्थानादननु-<br><br>भूतस्य स्मृत्यनुपपत्तेश्च ॥ २२ ॥युक्तिशून्य हैं क्योंकि 'यह ऐसा है' इस प्रकार निश्चय करनेके क्षणसे दूसरे ही क्षणमें स्थिति न रहनेके कारण [ पदार्थका अनुभव नहीं हो सकता ]; और बिना अनुभव हुए पदार्थकी स्मृति होना असम्भव है ॥२२॥

हेतु-फलका अनादित्व उनकी अनुत्पत्तिका सूचक है

किं च हेतुफलयोरनादित्वम-<br><br>भ्युपगच्छता त्वया बलाद्धेतुफल-<br><br>योरजन्मैवाभ्युपगतं स्यात् ।<br><br>तत्कथम् ?यही नहीं, हेतु और फलका अनादित्व स्वीकार करनेवाले तुम्हारे द्वारा तो बलात्कारसे हेतु और फलकी अनुत्पत्ति ही स्वीकार कर ली गयी है।<br><br>सो किस प्रकार ?

हेतुर्न जायतेऽनादेः फलं चापि स्वभावतः ।
आदिर्न विद्यते यस्य तस्य ह्यादिर्न विद्यते ॥ २३ ॥

अनादि फलसे कोई हेतु उत्पन्न नहीं हो सकता और इसी प्रकार स्वभावसे ही [ अनादि हेतुसे ] फलकी भी उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि जिस वस्तुका कोई आदि ( कारण ) नहीं होता उसका आदि ( जन्म ) भी नहीं होता ॥ २३ ॥

अनादेरादिरहितात्फलाद्धेतुर्न<br><br>जायते । न ह्यनुत्पन्नादनादेः<br><br>फलाद्धेतोर्जन्मेष्यते त्वया । फलं<br><br>चादिरहितादनादेर्हेतोरजात्स्व-<br><br>भावत एव निर्निमित्तं जायत<br><br>इति नाभ्युपगम्यते ।अनादि अर्थात् आदिरहित फल-से हेतु उत्पन्न नहीं होता । जिसकी कभी उत्पत्ति नहीं हुई ऐसे अनादि फलसे तो तुम हेतुका जन्म मानते ही नहीं हो; और न ऐसा ही मानते हो कि अनादि—आदिरहित अर्थात् अजन्मा हेतुसे बिना किसी निमित्तके स्वभावतः ही फलकी उत्पत्ति हो जाती है ।