माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण १९५
कोई नियम भी नहीं रह सकता ] । इस प्रकार उन बुद्धिमानोंने सर्वथा अजातिको ही प्रकाशित किया है ॥ १९ ॥
| सेयमशक्तिरपरिज्ञानं तत्त्वाविवेको मूढतेत्यर्थः । अथ वा योऽयं त्वयोक्तः क्रमो हेतोः फलस्य सिद्धिः फलाच्च हेतोः सिद्धिरिनीतरेतरानन्तर्यलक्षणस्तस्य कोपो विपर्यासोऽन्यथाभावः स्यादित्यभिप्रायः । एवं हेतुफलयोः कार्यकारणभावादुपपत्तेरजातिः सर्वस्यानुत्पत्तिः परिदीपिता प्रकाशितान्त्योन्यपक्षदोषं ब्रुवद्भिर्वादिभिर्बुद्धैः पण्डितैरित्यर्थः ॥ १९ ॥ | यह अशक्ति [ तुम्हारा ] अपरिज्ञान-तत्त्वका अविवेक अर्थात् मूढ़ता ही है । अथवा तुमने जो एक-दूसरेका पौर्वापर्यरूप यह क्रम बतलाया है कि हेतुसे फलकी सिद्धि होती है और फलसे हेतुकी, उसका कोप-विपर्यास अर्थात् अन्यथाभाव हो जायगा—ऐसा इसका अभिप्राय है । इस प्रकार हेतु और फलका कार्यकारणभाव असम्भव होनेके कारण एक-दूसरेके पक्षका दोष बतलानेवाले प्रतिपक्षी बुद्धिमानों अर्थात् पण्डितोंने सबकी अजाति-अनुत्पत्ति ही प्रकाशित की है ॥ १९ ॥ |
| ननु हेतुफलयोः कार्यकारणभाव इत्यस्माभिरुक्तं शब्दमात्रमाश्रित्यच्छलमिदं त्वयोक्तं पुत्राज्जन्म पितुर्यथा, विषाणवच्चासंबन्ध इत्यादि । न ह्यस्माभिरसिद्धाद्धेतोः फलसिद्धिरसिद्धाद्वा फलाद्धेतुसिद्धिरभ्यु- | पूर्व०—हमने जो कहा कि हेतु और फलका परस्पर कार्य-कारणभाव है, सो तुमने हमारे शब्दमात्रको पकड़कर छलपूर्वक ऐसा कह दिया कि 'जैसे पुत्रसे पिताका जन्म होना है' '[ दायें-बायें ] सींगोंके समान [ उनका परस्पर ] सम्बन्ध ही नहीं हो सकता' इत्यादि । हमने असिद्ध हेतुसे फलकी सिद्धि अथवा असिद्ध फलसे हेतुकी सिद्धि कभी नहीं |
| १९६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| पद्यता । किं तर्हि ? बीजाङ्कुर-वत्कार्यकारणभावोऽभ्युपगम्यत इति ।<br><br>अत्रोच्यते— | मानी । तो फिर क्या माना है ? हम तो बीज और अङ्कुरके समान केवल उनका कार्य-कारणभाव मानते हैं ।<br><br>सिद्धान्ती—इसपर हमें यह कहना है कि— |
बीजाङ्कुराख्यो दृष्टान्तः सदा साध्यसमो हि सः ।
न हि साध्यसमो हेतुः सिद्धौ साध्यस्य युज्यते ॥२०॥
बीजाङ्कुर नामका जो दृष्टान्त है वह तो सदा साध्यके ही समान है । और जो हेतु साध्यके ही सदृश होता है वह साध्यकी सिद्धिमें उपयोगी नहीं होता ॥ २० ॥
| [बीजाङ्कुरदृष्टान्तस्य साध्यसमत्वम्] | |
|---|---|
| बीजाङ्कुराख्यो दृष्टान्तो यः स साध्येन तुल्यो भवेदित्यभिप्रायः ।<br><br>ननु प्रत्यक्षः कार्यकारणभावो बीजाङ्कुरयोरनादिः ? न, पूर्वस्य पूर्वस्यापरवदादिमत्त्वाभ्युपगमात् । यथेदानीमुत्पन्नोऽपरोऽङ्कुरो बीजादादिमान्बीजं चापरमन्यस्मादङ्कुरादिति क्रमेणोत्पन्नत्वादादिमत् । एवं पूर्वः पूर्वोऽङ्कुरो बीजं च पूर्वं पूर्वमादिमदेवेति | बीजाङ्कुर नामका जो दृष्टान्त है वह तो साध्यके ही समान है—ऐसा मेरा अभिप्राय है । यदि कहो कि बीज और अङ्कुरका कार्य-कारणभाव तो प्रत्यक्ष ही अनादि है, तो ऐसी बात नहीं है क्योंकि उनमेंसे पूर्व-पूर्व [अङ्कुर और फल] को परवर्तियोंके समान आदिमान् माना गया है । जिस प्रकार इस समय बीजसे उत्पन्न हुआ दूसरा अङ्कुर आदिमान् है उसी प्रकार क्रमशः दूसरे अङ्कुरसे उत्पन्न हुआ दूसरा बीज भी आदिमान् है । इस प्रकार पूर्व-पूर्व अङ्कुर और पूर्व-पूर्व बीज आदिमान् ही है । |
शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण ३९७
| प्रत्येकं सर्वस्य बीजाङ्कुरजातस्यादिमत्त्वात्कस्यचिदप्यनादित्वानुपपत्तिः। एवं हेतुफलानाम्। | अतः सम्पूर्ण बीजाङ्कुरवर्गका प्रत्येक बीज और अङ्कुर आदिमान् होनेके कारण किसीका भी अनादि होना असम्भव है। यही न्याय हेतु और फलके विषयमें भी समझना चाहिये। |
|---|---|
| अथ बीजाङ्कुरसन्ततेरनादिमत्त्वमिति चेत् ? न,<br>(बीजाङ्कुर-सन्ततिनिरासः)<br>एकत्वानुपपत्तेः। न हि बीजाङ्कुरव्यतिरेकेण बीजाङ्कुरसन्ततिर्नामैकाभ्युपगम्यते हेतुफलसन्ततिर्वा तदनादित्ववादिभिः। तस्मात्सूक्तं हेतोः फलस्य चानादिः कथं तैरुपवर्ण्यत इति। तथा चान्यदप्यनुपपत्तेर्नच्छलमित्यभिप्रायः। न च लोके साध्यसमो हेतुः साध्यसिद्धौ सिद्धिनिमित्तं प्रयुज्यते प्रमाणकुशलैरित्यर्थः। हेतुरिति दृष्टान्तोऽत्राभिप्रेतः, गमकत्वात्। प्रकृतो हि दृष्टान्तो न हेतुरिति ॥ २० ॥ | यदि कहो कि बीजाङ्कुरपरम्परा तो अनादि हो ही सकती है; तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि उसका एकत्व नहीं माना गया। हेतु-फलका अनादित्व प्रतिपादन करनेवालोंने बीज और अंकुरसे भिन्न बीजाङ्कुरपरम्परा अथवा हेतु-फलपरम्परा नामका कोई एक स्वतन्त्र पदार्थ नहीं माना। अतः 'वे लोग हेतु और फलका अनादित्व किस प्रकार प्रतिपादन करते हैं' यह कथन बहुत ठीक है। इसके सिवा अनुपपत्ति होनेके कारण भी हमारा कथन छल नहीं है—ऐसा इसका तात्पर्य है। अभिप्राय यह है कि लोकमें प्रमाणकुशल पुरुषोंद्वारा साध्यकी सिद्धिके लिये साध्यके ही सदृश हेतुका प्रयोग नहीं किया जाता। यहाँ 'हेतु' शब्दका अभिप्राय दृष्टान्त है, क्योंकि वह उसीका ज्ञापक है; यहाँ दृष्टान्तका ही प्रकरण भी है—हेतुका नहीं ॥ २० ॥ |
१९८ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
अजातवाद-निरूपण
| कथं बुद्धैरजातिः परिदीपितेत्याह— | पण्डितोंने अजातिको ही किस प्रकार प्रकाशित किया है ? इसपर कहते हैं— |
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पूर्वापरापरिज्ञानमजातेः परिदीपकम् ।
जायमानाद्धि वै धर्मात्कथं पूर्वं न गृह्यते ॥ २१ ॥
[ हेतु और फलके ] पौर्वापर्यका जो अज्ञान है वह अनुत्पत्तिका ही प्रकाशक है, क्योंकि यदि कार्य [ सचमुच ] उत्पन्न हुआ होता तो उसका कारण क्यों न ग्रहण किया जाता ? ॥ २१ ॥
| यदेतद्धेतुफलयोः पूर्वापरापरि- | यह जो हेतु और फलके पौर्वा- | | ज्ञानं तच्चैतदजातेः परिदीपकम्- | पर्यका अज्ञान है वह अजातिका ही परिदीपक अर्थात् ज्ञापक है । यदि | | अवबोधकमित्यर्थः । जायमानो हि | कार्य उत्पन्न होता ग्रहण किया जाता है तो उससे पूर्ववर्ती कारण | | चेद्धर्मो गृह्यते, कथं तस्मात्पूर्वं | क्यों नहीं ग्रहण किया जाता ? उत्पन्न होनेवाली वस्तुको ग्रहण | | कारणं न गृह्यते । अवश्यं हि | करनेवाले पुरुषद्वारा उसकी उत्पत्ति- | | जायमानस्य ग्रहीत्रा तज्जनकं | का कारण भी अवश्य ही ग्रहण किया जाना चाहिये, क्योंकि जन्य | | ग्रहीतव्यम् । जन्यजनकयोः | और जनक पदार्थोंका सम्बन्ध | | संबन्धस्यानपेतत्वात् । तस्माद- | अनिवार्य है । इसलिये तात्पर्य यह है कि यह अजातिका ही प्रकाशक | | जातिपरिदीपकं तदित्यर्थः॥२१॥ | है ॥ २१ ॥ |
सदसदादिवादोंकी अनुपपत्ति
| इतश्च न जायते किंचित्, यज्जायमानं वस्तु— | इसलिये भी कोई वस्तु उत्पन्न नहीं होती, क्योंकि उत्पन्न होनेवाली वस्तु— |
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शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण १९९
स्वतो वा परतो वापि न किंचिद्वस्तु जायते ।
सदसत्सदसद्वापि न किंचिद्वस्तु जायते ॥ २२ ॥
स्वतः अथवा परतः [ किसी भी प्रकार ] कोई वस्तु उत्पन्न नहीं होती; क्योंकि सत्, असत् अथवा सदसत् ऐसी कोई भी वस्तु उत्पन्न नहीं होती ॥ २२ ॥
| स्वतः परतः उभयतो वा सदसत्सदसद्वा न जायते न तस्य केनचिदपि प्रकारेण जन्म संभवति । न तावत्स्वयमेवापरिनिष्पन्नात्स्वतः स्वरूपात्स्वयमेव जायते यथा घटस्तस्मादेव घटात् । नापि परतोऽन्यस्मादन्यो यथा घटात्पटः पटात्पटान्तरम् । तथा नोभयतः, विरोधात्; यथा घटपटाभ्यां घटः पटो वा न जायते ।<br><br>ननु मृदो घटो जायते पितुश्च पुत्रः । सत्यम्, अस्ति जायत इति प्रत्ययः शब्दश्च मूढानाम् । | अपनेसे, दूसरेसे अथवा दोनोंहीसे सत्, असत् अथवा सदसद्रूपसे उत्पन्न नहीं होती—किसी भी प्रकार उसका जन्म होना सम्भव नहीं हैं । जिस प्रकार घड़ा उसी घड़ेसे उत्पन्न नहीं हो सकता उसी प्रकार कोई भी वस्तु स्वयं अपने अपरिनिष्पन्न ( पूर्णतया तैयार न हुए ) स्वरूपसे स्वतः ही उत्पन्न नहीं हो सकती । और न किसी अन्यसे ही अन्यकी उत्पत्ति हो सकती है; जैसे घटसे पटकी अथवा पटसे पटान्तरकी । तथा इसी तरह, विरोध होनेके कारण दोनोंसे भी किसीकी उत्पत्ति नहीं हो सकती; जिस प्रकार कि घट और पट दोनोंसे घट या पट कोई उत्पन्न नहीं हो सकता ।<br><br>यदि कहो कि मिट्टीसे घड़ा उत्पन्न होता है और पितासे पुत्रका जन्म होता है तो; ठीक है, परन्तु 'उत्पन्न होता है' ऐसा शब्द और उसकी प्रतीति मूर्खोंको ही हुआ |
| २०० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| संस्कृत (मूल/भाष्य) | हिन्दी अनुवाद |
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| तावेव शब्दप्रत्ययौ विवेकिभिः परीक्ष्येते किं सत्यमेदं तावुत मृषेति । यावता परीक्ष्यमाणे शब्दप्रत्ययविषयं वस्तु घटपुत्रादिलक्षणं शब्दमात्रमेव तत् । "वाचारम्भणम्" (छा० उ० ६।१।४) इति श्रुतेः । | करती हैं। विवेकी लोग तो उन शब्द और प्रतीतिकी—वे सत्य हैं अथवा मिथ्या—इस प्रकार परीक्षा किया करते हैं। किन्तु परीक्षा की जानेपर तो शब्द और उसकी प्रतीतिका विषयभूत घट अथवा पुत्रादिरूप वस्तु केवल शब्दमात्र ही है; जैसा कि "वाचारम्भणम्" इत्यादि श्रुतिसे प्रमाणित होता है। |
| सच्चेन्न जायते सत्त्वान्मृत्पित्रादिवत् । यद्यसत्तथापि न जायतेऽसत्त्वादेव शशविषाणादिवत् । | यदि वस्तु सत् (विद्यमान) है तो मृत्तिका और पिता आदिके समान सत् होनेके कारण ही उत्पन्न नहीं हो सकती। यदि असत् है, तो भी शशशृङ्गादिके समान असत् होनेके कारण ही उत्पन्न नहीं हो सकती। |
| अथ सदसत्तथापि न जायते विरुद्धस्यैकस्यासंभवात् । अतो न किंचिद्वस्तु जायत इति सिद्धम् । | और यदि सदसत् है तो भी उत्पन्न नहीं हो सकती क्योंकि एक ही वस्तु विरुद्ध स्वभाववाली होनी असम्भव है। अतः यही सिद्ध हुआ कि कोई भी वस्तु उत्पन्न नहीं होती। |
| येषां पुनर्जन्मिरेव जायत इति क्रियाकारकफलैकत्वम् अभ्युपगम्यते क्षणिकत्वं च वस्तुनः, ते दूरत एव | इसके विपरीत जिन (बौद्धों) के मतमें जन्मक्रियाका ही जन्म होता है—इस प्रकार जो क्रिया, कारक और फलकी एकता तथा वस्तुका क्षणिकत्व स्वीकार करते हैं वे तो बिल्कुल ही |
शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २०१
| न्यायापेताः । इदमित्थमित्यव-<br><br>धारणक्षणान्तरानवस्थानादननु-<br><br>भूतस्य स्मृत्यनुपपत्तेश्च ॥ २२ ॥ | युक्तिशून्य हैं क्योंकि 'यह ऐसा है' इस प्रकार निश्चय करनेके क्षणसे दूसरे ही क्षणमें स्थिति न रहनेके कारण [ पदार्थका अनुभव नहीं हो सकता ]; और बिना अनुभव हुए पदार्थकी स्मृति होना असम्भव है ॥२२॥ |
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हेतु-फलका अनादित्व उनकी अनुत्पत्तिका सूचक है
| किं च हेतुफलयोरनादित्वम-<br><br>भ्युपगच्छता त्वया बलाद्धेतुफल-<br><br>योरजन्मैवाभ्युपगतं स्यात् ।<br><br>तत्कथम् ? | यही नहीं, हेतु और फलका अनादित्व स्वीकार करनेवाले तुम्हारे द्वारा तो बलात्कारसे हेतु और फलकी अनुत्पत्ति ही स्वीकार कर ली गयी है।<br><br>सो किस प्रकार ? |
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हेतुर्न जायतेऽनादेः फलं चापि स्वभावतः ।
आदिर्न विद्यते यस्य तस्य ह्यादिर्न विद्यते ॥ २३ ॥
अनादि फलसे कोई हेतु उत्पन्न नहीं हो सकता और इसी प्रकार स्वभावसे ही [ अनादि हेतुसे ] फलकी भी उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि जिस वस्तुका कोई आदि ( कारण ) नहीं होता उसका आदि ( जन्म ) भी नहीं होता ॥ २३ ॥
| अनादेरादिरहितात्फलाद्धेतुर्न<br><br>जायते । न ह्यनुत्पन्नादनादेः<br><br>फलाद्धेतोर्जन्मेष्यते त्वया । फलं<br><br>चादिरहितादनादेर्हेतोरजात्स्व-<br><br>भावत एव निर्निमित्तं जायत<br><br>इति नाभ्युपगम्यते । | अनादि अर्थात् आदिरहित फल-से हेतु उत्पन्न नहीं होता । जिसकी कभी उत्पत्ति नहीं हुई ऐसे अनादि फलसे तो तुम हेतुका जन्म मानते ही नहीं हो; और न ऐसा ही मानते हो कि अनादि—आदिरहित अर्थात् अजन्मा हेतुसे बिना किसी निमित्तके स्वभावतः ही फलकी उत्पत्ति हो जाती है । |
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२०२ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
| तस्मादनादित्वमभ्युपगच्छता त्वया हेतुफलयोरजन्मैवाभ्युपगम्यते । यस्यानादिः कारणं न विद्यते यस्य लोके तस्य ह्यादिः पूर्वोक्ता जातिर्न विद्यते । कारणवत एव ह्यादिरभ्युपगम्यते नाकारणवतः ॥ २३ ॥ | अतः हेतु और फलका अनादित्व माननेवाले तुम्हारे द्वारा उनकी अनुत्पत्ति ही स्वीकार कर ली जाती है, क्योंकि लोकमें जिस वस्तुका आदि-कारण नहीं होता उसका आदि अर्थात् पूर्वोक्त जन्म भी नहीं होता। जिसका कोई कारण होता है उसीका जन्म भी माना जाता है; कारणरहित पदार्थका नहीं ॥२३॥ |
बाह्यार्थवाद-निरूपण
| उक्तस्यैवार्थस्य दृढीकरणचिकीर्षया पुनराक्षिपति— | पूर्वोक्त अर्थको ही पुष्ट करनेकी इच्छासे फिर दोष प्रदर्शित करते हैं— |
प्रज्ञप्तेः सनिमित्तत्वमन्यथा द्वयनाशतः ।
संक्लेशस्योपलब्धेश्च परतन्त्रास्तिता मता ॥ २४ ॥
प्रज्ञप्ति (शब्दस्पर्शादि ज्ञान) को सनिमित्त (बाह्यविषययुक्त) मानना चाहिये; नहीं तो [शब्दस्पर्शादि] द्वैतका नाश हो जायगा । इसके सिवा [अग्निदाह आदि] क्लेशकी उपलब्धिसे भी अन्य मतावलम्बियोंके शास्त्रद्वारा प्रतिपादित द्वैतकी सत्ता मानी गयी है ॥ २४ ॥
| प्रज्ञानं प्रज्ञप्तिः शब्दादिप्रतीतिस्तस्याः सनिमित्तत्वम्; निमित्तं कारणं विषय इत्येतत्सनिमित्तत्वं सविषयत्वं स्वात्मव्यतिरिक्तविषयतेत्येतत् प्रतिजानीमहे । न हि निर्विषया | प्रज्ञान अर्थात् शब्दादि-प्रतीतिका नाम प्रज्ञप्ति है । वह सनिमित्त है । निमित्त—कारण अर्थात् विषयको कहते हैं; अतः सनिमित्त—सविषय यानी अपनेसे अतिरिक्त विषयके सहित है—ऐसी हम [उसके विषयमें] प्रतिज्ञा करते हैं । |
| शां० भा० ] | अलातशान्तिप्रकरण | २०३ |
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| प्रज्ञप्तिः शब्दादिप्रतीतिः स्यात् , तस्याः सनिमित्तत्वात् । अन्यथा निर्विषयत्वे शब्दस्पर्शनीलपीत-लोहितादिप्रत्ययवैचित्र्यस्य द्वयस्य नाशतो नाशोऽभावः प्रसज्येतेत्यर्थः । न च प्रत्ययवैचित्र्यस्य द्वयस्याभावोऽस्ति प्रत्यक्षत्वात् । अतः प्रत्ययवैचित्र्यस्य द्वयस्य दर्शनात्, परेषां तन्त्रं परतन्त्रमित्यन्यशास्त्रम्, तस्य परतन्त्रस्य परतन्त्राश्रयस्य बाह्यार्थस्य ज्ञानव्यतिरिक्तस्यास्तिता मताभिप्रेता । <br><br> न हि प्रज्ञप्तेः प्रकाशमात्रस्वरूपाया नीलपीतादिबाह्यालम्बनवैचित्र्यमन्तरेण स्वभावभेदेनैव वैचित्र्यं संभवति । स्फटिकस्येव नीलाद्युपाध्याश्रयैर्विना वैचित्र्यं न घटत इत्यभिप्रायः । | हमारा कथन है कि ] प्रज्ञप्ति यानी शब्दादि-प्रतीति निर्विषया नहीं हो सकती, क्योंकि वह सनिमित्ता है । अन्यथा उसे निर्विषय माननेपर तो शब्द, स्पर्श एवं नील, पीत और लोहित आदि प्रतीतिकी विचित्रतारूप द्वैतका नाश हो जायगा अर्थात् उसके नाश यानी अभावका प्रसंग उपस्थित हो जायगा और प्रत्यक्ष-सिद्ध होनेके कारण प्रत्ययवैचित्र्यरूप द्वैतका अभाव है नहीं । अतः प्रत्ययवैचित्र्यरूप द्वैतकी उपलब्धिसे, परतन्त्र यानी दूसरोंके शास्त्र; उन परकीय तन्त्रोंका अर्थात् परकीय तन्त्रोंके आश्रित जो प्रज्ञानके अतिरिक्त अन्य बाह्य पदार्थ हैं उनका अस्तित्व भी स्वीकार किया गया है । <br><br> केवल प्रकाशमात्रस्वरूपा प्रज्ञप्तिकी यह विचित्रता नील-पीतादि बाह्य आलम्बनोंकी विचित्रताके सिवा केवल स्वभावभेदसे ही होनी सम्भव नहीं है । तात्पर्य यह है कि स्फटिकके समान, नील-पीतादि उपाधियोंको आश्रय किये बिना, यह विचित्रता नहीं हो सकती । |
२०४ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
इतश्च परतन्त्राश्रयस्य बाह्यार्थस्य ज्ञानव्यतिरिक्तस्यास्तित्वम् । संक्लेशनं संक्लेशो दुःखमित्यर्थः । उपलभ्यते ह्यग्निदाहादिनिमित्तं दुःखम् । यद्यग्न्यादिबाह्यं दाहादिनिमित्तं विज्ञानव्यतिरिक्तं न स्यात्ततो दाहादिदुःखं नोपलभ्येत । उपलभ्यते तु । अतस्तेन मन्यामहेऽस्ति बाह्योऽर्थ इति । न हि विज्ञानमात्रे संक्लेशो युक्तः, अन्यत्रादर्शनादित्यभिप्रायः ॥२४॥
इसके सिवा इसलिये भी दूसरोंके शास्त्रोंके आश्रित ज्ञानव्यतिरिक्त बाह्य पदार्थोंका अस्तित्व स्वीकार किया गया है कि अग्निदाहादिके कारणसे होनेवाला संक्लेश यानी दुःख उपलब्ध होता है । संक्लेशका अर्थ संक्लेशन अर्थात् दुःख है । यदि विज्ञानसे अतिरिक्त दाहादिका निमित्तभूत अग्नि आदि कोई बाह्य पदार्थ न होता तो दाहादिजनित दुःख उपलब्ध नहीं होना चाहिये था । किन्तु उपलब्ध होता ही है; इससे हम मानते हैं कि बाह्य पदार्थ अवश्य हैं । अभिप्राय यह है कि केवल विज्ञानमात्रमें क्लेश होना सम्भव नहीं है, क्योंकि अन्यत्र ऐसा नहीं देखा गया ॥ २४ ॥
विज्ञानवादिकर्तृक बाह्यार्थवादनिषेध
अत्रोच्यते—
इस विषयमें हमारा कथन है कि
प्रज्ञप्तेः सनिमित्तत्वमिष्यते युक्तिदर्शनात् ।
निमित्तस्यानिमित्तत्वमिष्यते भूतदर्शनात् ॥ २५ ॥
पूर्वोक्त युक्तिके अनुसार तुम प्रज्ञप्तिका सविषयत्व स्वीकार करते हो । परन्तु तत्त्वदृष्टिसे हम उस विषयका अविषयत्व मानते हैं ॥ २५ ॥
बाढमेवं प्रज्ञप्तेः सनिमित्तत्वं द्वयसंक्लेशोपलब्धियुक्तिदर्शना-
ठीक है, इस प्रकार दुःखमय द्वैतकी उपलब्धिरूप युक्तिके अनुसार
| शां० भा० ] | अलातशान्तिप्रकरण | २०५ |
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| दिष्यते त्वया । स्थिरीभव तावत्त्वं युक्तिदर्शनं वस्तुनस्तथात्वाभ्युपगमे कारणमित्यत्र । | तुम प्रज्ञप्तिका सविषयत्व स्वीकार करते हो; परन्तु 'युक्तिदर्शन वस्तुकी यथार्थताके ज्ञानमें कारण है'—अपने इस सिद्धान्तमें तुम स्थिर हो जाओ। |
| ब्रूहि किं तत इति । | बाह्यार्थवादी— कहिये, उससे क्या आपत्ति होती है? |
| उच्यते । निमित्तस्य प्रज्ञप्त्यालम्बनाभिमतस्य घटादेर्निमित्तत्वमनालम्बनत्वं वैचित्र्याहेतुत्वमिष्यतेऽस्माभिः । कथम् ? भूतदर्शनात्परमार्थदर्शनादित्येतत् । न हि घटो यथाभूतमृद्रूपदर्शने सति तद्व्यतिरेकेणास्ति, यथाश्वान्महिषः पटो वा तन्तुव्यतिरेकेण, तन्तवश्चांशुव्यतिरेकेणेत्येवमुत्तरोत्तरभूतदर्शन आ शब्दप्रत्ययनिरोधान्नैव निमित्तमुपलभामह इत्यर्थः । | विज्ञानवादी— हमारा कथन है कि प्रज्ञप्तिके आश्रयरूपसे स्वीकार किये हुए घटादि विषयका हम अविषयत्व—प्रतीतिका अनाश्रयत्व अर्थात् विचित्रताका अहेतुत्व मानते हैं। कैसे मानते हैं ? भूतदृष्टिसे अर्थात् परमार्थदृष्टिसे। जिस प्रकार अश्वसे महिष पृथक् है, उस प्रकार मृत्तिकाके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान होनेपर, घट उससे पृथक् सिद्ध नहीं होता। इसी प्रकार तन्तुसे पृथक् पट और अंशुसे पृथक् तन्तु भी सिद्ध नहीं होते। तात्पर्य यह है कि इसी तरह उत्तरोत्तर यथार्थ तत्त्वको देखते-देखते शब्द प्रतीतिका निरोध हो जानेपर हम कोई भी विषय नहीं देखते। |
| अथ चाभूतदर्शनाद्वाह्यार्थस्यानिमित्तत्वमिष्यते, रज्ज्वादाविव सर्पादिरित्यर्थः । भ्रान्ति- | अथवा [ यों समझो कि ] जिस प्रकार रज्जु आदिमें आरोपित सर्पादि वस्तुतः प्रतीतिके आलम्बन नहीं हैं उसी प्रकार अभूतदर्शनके कारण हम बाह्यार्थोंको प्रतीतिका आलम्बन |
| २०६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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दर्शनविषयत्वाच्च निमित्तस्या- | नहीं मानते। भ्रान्तिदृष्टिके विषय होनेके कारण इन निमित्तोंका अ- निमित्तत्वं भवेत् । तदभावे- | निमित्तत्व है, क्योंकि उसका अभाव ऽभावात् । न हि सुषुप्तसमाहित- | होनेपर इनकी भी उपलब्धि नहीं होती। सोये हुए, समाधिस्थ और मुक्तानां भ्रान्तिदर्शनाभाव | मुक्त पुरुषोंको, उनकी भ्रान्तिदृष्टिका आत्मव्यतिरिक्तो बाह्योऽर्थ | अभाव हो जानेपर, आत्मासे अतिरिक्त किसी बाह्य पदार्थकी उपलब्धि नहीं उपलभ्यते । न ह्युन्मत्तावगतं | होती। उन्मत्त पुरुषको दिखायी देनेवाली वस्तु उन्मादशून्य मनुष्यको वस्त्वनुन्मत्तैरपि तथाभूतं गम्यते । | भी यथार्थ नहीं जान पड़ती। इस एतेन द्वयदर्शनं संक्लेशोपलब्धिश्च | कथनसे द्वैतदर्शन और क्लेशकी उपलब्धि दोनोंहीका निराकरण प्रत्युक्ता ॥२५॥ | किया गया है ॥ २५ ॥
यस्मान्नास्ति बाह्यं निमित्तमतः | क्योंकि बाह्य विषय हैं ही नहीं, इसलिये—
चित्तं न संस्पृशत्यर्थं नार्थाभासं तथैव च ।
अभूतो हि यतश्चार्थो नार्थाभासस्ततः पृथक् ॥ २६ ॥
चित्त किसी पदार्थका स्पर्श नहीं करता और इसी प्रकार न किसी अर्थाभासका ही ग्रहण करता है। क्योंकि पदार्थ है ही नहीं इसलिये पदार्थाभास भी उस चित्तसे पृथक् नहीं है ॥ २६ ॥
चित्तं न स्पृशत्यर्थं बाह्या- | चित्त, चित्त होनेके कारण ही लम्बनविषयम्, नाप्यर्थाभासं | स्वप्नचित्तके समान, बाह्य आलम्बन- चित्तत्वात्स्वप्नचित्तवत् । अभूतो | के विषयभूत किसी पदार्थको स्पर्श नहीं करता और न अर्थाभासको ही
| शां० भा० ] | अलातशान्तिप्रकरण | २०७ |
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| हि जागरितेऽपि स्वप्नार्थवदेव बाह्यः शब्दाद्यर्थो यत उक्तहेतुत्वाच्च । नाप्यर्थाभासाश्चित्तात्पृथक्किञ्चित्तमेव हि घटाद्यर्थवदवभासते यथा स्वप्ने ॥ २६ ॥ | ग्रहण करता है, क्योंकि उपर्युक्त हेतुसे ही स्वप्नगत पदार्थोंके समान जागरित अवस्थामें भी शब्दादि बाह्य पदार्थ हैं नहीं, और न चित्तसे पृथक् अर्थाभास ही है। घटादि पदार्थोंके समान चित्त ही भासता है, जैसा कि वह स्वप्नमें भासा करता है ॥ २६ ॥ |
| ननु विपर्यासस्तर्ह्यसति घटादौ घटाद्याभासता चित्तस्य । तथा च सत्यविपर्यासः क्वचिद्वक्तव्य इति । अत्रोच्यते— | घटादिके न होनेपर भी चित्तको घटादिकी प्रतीति होना—यह तो विपरीत ज्ञान है। ऐसी अवस्थामें अविपरीत (सम्यक्) ज्ञान कब होगा? यह बतलाना चाहिये। इसपर कहते हैं— |
निमित्तं न सदा चित्तं संस्पृशत्यध्वसु त्रिषु ।
अनिमित्तो विपर्यासः कथं तस्य भविष्यति ॥ २७ ॥
[भूत, भविष्यत् और वर्तमान] तीनों अवस्थाओंमें चित्त कभी किसी विषयको स्पर्श नहीं करता। फिर उसे बिना निमित्तके ही विपरीत ज्ञान कैसे हो सकता है? ॥ २७ ॥
| निमित्तं विषयमतीतानागतवर्त्तमानाध्वसु त्रिष्वपि सदा चित्तं न स्पृशेदेव हि । यदि हि क्वचित् संस्पृशेत् सोऽविपर्यासः परमार्थ इति । अतस्तदपेक्षया- | अतीत, अनागत और वर्तमान—इन तीनों ही अवस्थाओंमें चित्त कभी निमित्त यानी विषयको स्पर्श नहीं करता। यदि वह कभी उसे स्पर्श करता तो 'वह अविपर्यास अर्थात् परमार्थ है' ऐसा माना जाता। अतः |
| २०८ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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सति घटे घटाभासता विपर्यासः स्यान्न तु तदस्ति कदाचिदपि चित्तस्यार्थसंस्पर्शनम् । तस्मादनिमित्तो विपर्यासः कथं तस्य चित्तस्य भविष्यति; न कथंचिद्विपर्यासोऽस्तीत्यभिप्रायः । अयमेव हि स्वभावश्चित्तस्य यदुतासति निमित्ते घटादौ तद्वदवभासनम् २७ | उसकी अपेक्षासे ही घटके न होनेपर भी घटका प्रतीत होना विपर्यास कहलाता । किन्तु चित्तका पदार्थके साथ कभी स्पर्श है ही नहीं। अतः बिना निमित्तके ही उस चित्तको विपरीत ज्ञान कैसे हो सकता है ? तात्पर्य यह है कि उसे किसी प्रकार विपरीत ज्ञान है ही नहीं। चित्तका यही स्वभाव है कि घटादि निमित्तके न होनेपर भी उनकी प्रतीति होती रहे ॥ २७ ॥
विज्ञानवादका खण्डन
'प्रज्ञप्तेः सनिमित्तत्वमित्याद्ये-' तदन्तं विज्ञानवादिनो बौद्धस्य वचनं बाह्यार्थवादिपक्षप्रतिषेधपरमाचार्येणानुमोदितम् । तदेव हेतुं कृत्वा तत्पक्षप्रतिषेधाय तदिदमुच्यते— | "प्रज्ञप्तेः सनिमित्तत्वम्" इस (पच्चीसवें) श्लोकसे लेकर यहाँतक आचार्यने विज्ञानवादी बौद्धके, बाह्यार्थवादीके पक्षका प्रतिषेध करनेवाले वचनका अनुमोदन किया। अब उसीको हेतु बनाकर उसीके पक्षका प्रतिषेध करनेके लिये इस प्रकार कहा जाता है—
तस्मान्न जायते चित्तं चित्तदृश्यं न जायते ।
तस्य पश्यन्ति ये जातिं खे वै पश्यन्ति ते पदम् ॥ २८ ॥
इसलिये चित्त भी उत्पन्न नहीं होता और न चित्तका दृश्य ही उत्पन्न होता है । जो लोग उसका जन्म देखते हैं वे निश्चय ही आकाशमें [ पक्षी आदिके ] चरण ( चरण-चिह्न ) देखते हैं ॥ २८ ॥
यस्मादसत्येव घटादौ घटाद्याभासता चित्तस्य विज्ञानवादिना- | क्योंकि विज्ञानवादीने घटादिके न होनेपर भी चित्तको घटादिकी प्रतीति होनी स्वीकार की है और
शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २०९
| भ्युपगता तदनुमोदितम् अस्माभिरपि भूतदर्शनात्, तस्मात्तस्यापि चित्तस्य जायमानावभासतासत्येव जन्मनि युक्ता भवितुमित्यतो न जायते चित्तम्, यथा चित्तदृश्यं न जायते ।<br><br>अतस्तस्य चित्तस्य ये जातिं पश्यन्ति विज्ञानवादिनः क्षणिकत्वदुःखित्वशून्यत्वानात्मत्वादि च, तेनैव चित्तेन चित्तस्वरूपं द्रष्टुमशक्यं पश्यन्तः खे वै पश्यन्ति ते पदं पक्ष्यादीनाम् । अत इतरेभ्योऽपि द्वैतिभ्योऽत्यन्तसाहसिका इत्यर्थः । येऽपि शून्यवादिनः पश्यन्त एव सर्वशून्यतां स्वदर्शनस्यापि शून्यतां प्रतिजानते ते ततोऽपि साहसिकतराः खं मुष्टिनापि जिघृक्षन्ति ॥ २८ ॥ | यथार्थदृष्टि होनेके कारण उसका हमने भी अनुमोदन किया है, इसलिये उसकी मानी हुई चित्तकी उत्पत्तिकी प्रतीति भी उसकी उत्पत्तिके अभावमें ही होनी सम्भव है । अतः जिस प्रकार चित्तके दृश्यका जन्म नहीं होता उसी प्रकार चित्तकी भी उत्पत्ति नहीं होती ।<br><br>इसलिये जो विज्ञानवादी उस चित्तकी उत्पत्ति तथा उसके क्षणिकत्व, दुःखित्व, शून्यत्व एवं अनात्मत्व आदि देखते हैं—उस चित्तसे ही, जिसका देखना सर्वथा असम्भव है ऐसे चित्तके स्वरूपको देखनेवाले वे निश्चय ही आकाशमें पक्षी आदिके चरण देखते हैं। अतः तात्पर्य यह है कि वे अन्य द्वैतवादियोंकी अपेक्षा भी अधिक साहसी हैं। और जो शून्यवादी सबकी शून्यता देखते हुए अपने दर्शनकी भी शून्यताकी प्रतिज्ञा करते हैं वे तो उनसे भी बढ़कर साहसी हैं—वे आकाशको मुट्ठीसे ही पकड़ना चाहते हैं ॥ २८ ॥ |
| २१० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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उपक्रमका उपसंहार
| उक्तैर्हेतुभिरजमेकं ब्रह्मेति सिद्धं यत्पुनरादौ प्रतिज्ञातं तत्फलोपसंहारार्थोऽयं श्लोकः— | पूर्वोक्त हेतुओंसे यह सिद्ध हुआ कि एक अजन्मा ब्रह्म ही है । अब, पहले जिसकी प्रतिज्ञा की है उसके फलका उपसंहार करनेके लिये यह श्लोक है— |
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अजातं जायते यस्मादजातिः प्रकृतिस्ततः ।
प्रकृतेरन्यथाभावो न कथंचिद्भविष्यति ॥ २९ ॥
क्योंकि अजन्मा [चित्त] का ही जन्म होता है इसलिये अजाति ही उसका स्वभाव है; और स्वभावकी विपरीतता किसी प्रकार नहीं होगी ॥ २९ ॥
| अजातं यच्चित्तं ब्रह्मैव जायत इति वादिभिः परिकल्प्यते तदजातं जायते यस्मादजातिः प्रकृतिस्तस्य । ततस्तस्मादजातरूपायाः प्रकृतेरन्यथाभावो जन्म न कथंचिद्भविष्यति ॥ २९ ॥ | अजात जो ब्रह्मरूप चित्त है वही उत्पन्न होता है—ऐसी वादियोंद्वारा कल्पना की जाती है; क्योंकि उस अजातका ही जन्म होता है इसलिये अजाति उसका स्वभाव है। तब, इसीलिये उस अजातरूप स्वभावका जन्मरूप विपरीतभाव किसी प्रकार नहीं होगा ॥ २९ ॥ |
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| अयं चापर आत्मनः संसारमोक्षयोः परमार्थसद्भाववादिनां दोष उच्यते— | आत्माके संसार और मोक्ष—दोनोंहीका पारमार्थिक अस्तित्व स्वीकार करनेवाले वादियोंके पक्षका यह एक दूसरा दोष बतलाया जाता है— |
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| शां० भा० ] | अलातशान्तिप्रकरण | २११ |
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अनादेरन्तवत्त्वं च संसारस्य न सेत्स्यति ।
अनन्तता चादिमतो मोक्षस्य न भविष्यति ॥ ३० ॥
अनादि संसारका तो कभी अन्तवत्त्व सिद्ध नहीं हो सकेगा और सादि मोक्षकी कभी अनन्तता नहीं हो सकेगी ॥ ३० ॥
| अनादेरतीतकोटिरहितस्य संसारस्यान्तवत्त्वं समाप्तिर्न सेत्स्यति युक्तितः सिद्धिं नोपयास्यति । न ह्यनादिः सन्नन्तवान्कश्चित्पदार्थो दृष्टो लोके । बीजाङ्कुरसंबन्धनैरन्तर्यविच्छेदो दृष्ट इति चेत्, न; एकवस्त्वभावेनापोदितत्वात् । | अनादि-अतीतकोटिसे रहित संसारका अन्तवत्त्व अर्थात् समाप्त होना युक्तिसे सिद्ध नहीं होगा। लोकमें कोई भी पदार्थ अनादि होकर अन्तवान् होता नहीं देखा गया है। यदि कहो कि बीजाङ्कुरसम्बन्धकी निरन्तरताका विच्छेद होता देखा गया है ? तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि बीजाङ्कुरसन्तति कोई एक पदार्थ न होनेके कारण उसके अनादित्वका निराकरण तो पहले कर दिया गया है। |
| तथानन्ततापि विज्ञानप्राप्तिकालप्रभवस्य मोक्षस्यादिमतो न भविष्यति, घटादिष्वदर्शनात् । घटादिविनाशवदवस्तुत्वाददोष इति चेत्, तथा च मोक्षस्य परमार्थसद्भावप्रतिज्ञाहानिः । | इसी प्रकार विज्ञानप्राप्तिके समय होनेवाले सादि मोक्षकी अनन्तता भी नहीं होगी, क्योंकि घटादि [जन्य पदार्थों] में ऐसा देखा नहीं गया । यदि कहो कि घटादिनाशके समान अवस्तुरूप होनेसे [मोक्षमें] यह दोष नहीं आ सकता तो इससे मोक्षके पारमार्थिक सद्भावविषयक प्रतिज्ञाकी हानि होगी। इसके सिवा |
| २१२ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| असत्त्वादेव शशविषाणस्येवा- | भी ] शशशृङ्गके समान असत् होनेके कारण भी उसके आदिमत्त्व- |
| दिमत्त्वाभावश्च ॥ ३० ॥ | का अभाव ही है ॥ ३० ॥ |
प्रपञ्चके असत्यत्वमें हेतु
आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा ।
वितथैः सदृशाः सन्तोऽवितथा इव लक्षिताः ॥ ३१ ॥
जो आदि और अन्तमें नहीं है वह वर्तमानमें भी वैसा [ अर्थात् असद्रूप ] ही है । ये पदार्थसमूह असत्के समान होकर भी सत्-जैसे दिखायी देते हैं ॥ ३१ ॥
सप्रयोजनता तेषां स्वप्ने विप्रतिपद्यते ।
तस्मादाद्यन्तवत्त्वेन मिथ्यैव खलु ते स्मृताः ॥ ३२ ॥
उन (जाग्रत्-पदार्थों) की सप्रयोजनता स्वप्नावस्था में असिद्ध हो जाती है। अतः आदि-अन्तयुक्त होनेके कारण वे निश्चय ही मिथ्या माने गये हैं ॥ ३२ ॥
| वैतथ्ये कृतव्याख्यानौ | वैतथ्यप्रकरणमें इन दोनों |
| श्लोकाविह संसारमोक्षाभाव- | श्लोकोंकी व्याख्या की जा चुकी है। यहाँ संसार और मोक्षके अभावके |
| प्रसङ्गेन पठितौ ॥ ३१-३२ ॥ | प्रसङ्गमें उन्हें फिर पढ़ दिया है ॥ ३१-३२ ॥ |
सर्वे धर्मा मृषा स्वप्ने कायस्यान्तर्निदर्शनात् ।
संवृतेऽस्मिन्प्रदेशे वै भूतानां दर्शनं कुतः ॥ ३३ ॥
शां०भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २१३
जब कि शरीरके भीतर देखे जानेके कारण स्वप्नावस्था में सभी पदार्थ मिथ्या हैं तो इस संकुचित स्थानमें (निरवकाश ब्रह्ममें) ही भूतोंका दर्शन कैसे हो सकता है? ॥ ३३ ॥
| निमित्तस्यानिमित्तत्वमिष्यते भूतदर्शनादित्यस्यार्थः प्रपञ्च्यत एतैः श्लोकैः ॥ ३३ ॥ | इन श्लोकोंद्वारा “निमित्तस्यानिमित्तत्वमिष्यते भूतदर्शनात्” (४।२५) इस श्लोकके ही अर्थका विस्तार किया गया है ॥ ३३ ॥ |
स्वप्नका मिथ्यात्वनिरूपण
न युक्तं दर्शनं गत्वा कालस्यानियमाद्गतौ ।
प्रतिबुद्धश्च वै सर्वस्तस्मिन्देशे न विद्यते ॥ ३४ ॥
देशान्तरमें जानेमें जो समय लगता है [स्वप्नावस्था में] उसका नियम न होनेके कारण स्वप्नके पदार्थोंको उनके पास जाकर देखना तो सम्भव नहीं है। इसके सिवा जागनेपर भी कोई उस (स्वप्नदृष्ट) देशमें नहीं रहता ॥ ३४ ॥
| जागरिते गत्यागमनकालो नियतो देशः प्रमाणतो यस्तस्यानियमान्नियमस्याभावात्स्वप्ने न देशान्तरगमनमित्यर्थः ॥ ३४ ॥ | जागृतिमें जो आने-जानेके समय और प्रमाणसिद्ध देश नियत हैं उनका नियम न होनेके कारण स्वप्नावस्था में देशान्तरमें जाना नहीं होता—यह इसका अभिप्राय है ॥ ३४ ॥ |
मित्राद्यैः सह संमन्त्र्य संबुद्धो न प्रपद्यते ।
गृहीतं चापि यत्किंचित्प्रतिबुद्धो न पश्यति ॥ ३५ ॥
| १८४ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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[ स्वप्नावस्थामें ] मित्रादिके साथ मन्त्रणा कर [ वह स्वप्नदर्शी पुरुष ] जागनेपर उसे नहीं पाता; तथा उसने जो कुछ [ स्वप्नावस्थामें ] ग्रहण किया होता है उसे जागनेपर नहीं देखता ॥ ३५ ॥
| मित्राद्यैः सह संमन्त्र्य तदेव मन्त्रणं प्रतिबुद्धो न प्रपद्यते । गृहीतं च यत्किंचिद्धिरण्यादि न प्राप्नोति । अतश्च न देशान्तरं गच्छति स्वप्ने ॥ ३५ ॥ | [ स्वप्नमें ] मित्रादिके साथ मन्त्रणा करके जाग पड़नेपर फिर उसी मन्त्रणाको नहीं पाता और [ उस समय ] उसने जो कुछ स्वर्णादि ग्रहण किया होता है उसे भी प्राप्त नहीं करता । इसलिये भी स्वप्नावस्थामें वह किसी देशान्तरको नहीं जाता ॥ ३५ ॥ |
स्वप्ने चावस्तुकः कायः पृथगन्यस्य दर्शनात् ।
यथा कायस्तथा सर्वं चित्तदृश्यमवस्तुकम् ॥ ३६ ॥
स्वप्नमें जो शरीर होता है वह भी अवस्तु है, क्योंकि उससे भिन्न एक दूसरा शरीर [ शय्यापर पड़ा हुआ ] देखा जाता है । जैसा वह शरीर है वैसा ही सम्पूर्ण चित्तदृश्य अवस्तुरूप है ॥ ३६ ॥
| स्वप्ने चाटन्दृश्यते यः कायः सोऽवस्तुकस्ततोऽन्यस्य स्वापदेशस्थस्य पृथक्कायान्तरस्य दर्शनात् । यथा स्वप्नदृश्यः कायोऽसंस्तथा सर्वं चित्तदृश्यमवस्तुकं जागरितेऽपि चित्तदृश्य- | स्वप्नमें घूमता हुआ जो शरीर देखा जाता है वह अवस्तु है, क्योंकि उस स्वप्नप्रदेशस्थ शरीरसे भिन्न एक और शरीर [ शय्यापर पड़ा हुआ ] देखा जाता है । जिस प्रकार स्वप्नमें दिखायी देनेवाला शरीर असत् है उसी प्रकार जागरित अवस्थामें सारा चित्तदृश्य, केवल चित्तका ही दृश्य होनेके कारण, |