भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 232
२१२माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
असत्त्वादेव शशविषाणस्येवा-भी ] शशशृङ्गके समान असत् होनेके कारण भी उसके आदिमत्त्व-
दिमत्त्वाभावश्च ॥ ३० ॥का अभाव ही है ॥ ३० ॥

प्रपञ्चके असत्यत्वमें हेतु

आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा ।
वितथैः सदृशाः सन्तोऽवितथा इव लक्षिताः ॥ ३१ ॥

जो आदि और अन्तमें नहीं है वह वर्तमानमें भी वैसा [ अर्थात् असद्रूप ] ही है । ये पदार्थसमूह असत्‌के समान होकर भी सत्-जैसे दिखायी देते हैं ॥ ३१ ॥

सप्रयोजनता तेषां स्वप्ने विप्रतिपद्यते ।
तस्मादाद्यन्तवत्त्वेन मिथ्यैव खलु ते स्मृताः ॥ ३२ ॥

उन (जाग्रत्-पदार्थों) की सप्रयोजनता स्वप्नावस्था में असिद्ध हो जाती है। अतः आदि-अन्तयुक्त होनेके कारण वे निश्चय ही मिथ्या माने गये हैं ॥ ३२ ॥

वैतथ्ये कृतव्याख्यानौवैतथ्यप्रकरणमें इन दोनों
श्लोकाविह संसारमोक्षाभाव-श्लोकोंकी व्याख्या की जा चुकी है। यहाँ संसार और मोक्षके अभावके
प्रसङ्गेन पठितौ ॥ ३१-३२ ॥प्रसङ्गमें उन्हें फिर पढ़ दिया है ॥ ३१-३२ ॥

सर्वे धर्मा मृषा स्वप्ने कायस्यान्तर्निदर्शनात् ।
संवृतेऽस्मिन्प्रदेशे वै भूतानां दर्शनं कुतः ॥ ३३ ॥