माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
पृष्ठ 233, कुल 301 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 233
शां०भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २१३
जब कि शरीरके भीतर देखे जानेके कारण स्वप्नावस्था में सभी पदार्थ मिथ्या हैं तो इस संकुचित स्थानमें (निरवकाश ब्रह्ममें) ही भूतोंका दर्शन कैसे हो सकता है? ॥ ३३ ॥
| निमित्तस्यानिमित्तत्वमिष्यते भूतदर्शनादित्यस्यार्थः प्रपञ्च्यत एतैः श्लोकैः ॥ ३३ ॥ | इन श्लोकोंद्वारा “निमित्तस्यानिमित्तत्वमिष्यते भूतदर्शनात्” (४।२५) इस श्लोकके ही अर्थका विस्तार किया गया है ॥ ३३ ॥ |
स्वप्नका मिथ्यात्वनिरूपण
न युक्तं दर्शनं गत्वा कालस्यानियमाद्गतौ ।
प्रतिबुद्धश्च वै सर्वस्तस्मिन्देशे न विद्यते ॥ ३४ ॥
देशान्तरमें जानेमें जो समय लगता है [स्वप्नावस्था में] उसका नियम न होनेके कारण स्वप्नके पदार्थोंको उनके पास जाकर देखना तो सम्भव नहीं है। इसके सिवा जागनेपर भी कोई उस (स्वप्नदृष्ट) देशमें नहीं रहता ॥ ३४ ॥
| जागरिते गत्यागमनकालो नियतो देशः प्रमाणतो यस्तस्यानियमान्नियमस्याभावात्स्वप्ने न देशान्तरगमनमित्यर्थः ॥ ३४ ॥ | जागृतिमें जो आने-जानेके समय और प्रमाणसिद्ध देश नियत हैं उनका नियम न होनेके कारण स्वप्नावस्था में देशान्तरमें जाना नहीं होता—यह इसका अभिप्राय है ॥ ३४ ॥ |
मित्राद्यैः सह संमन्त्र्य संबुद्धो न प्रपद्यते ।
गृहीतं चापि यत्किंचित्प्रतिबुद्धो न पश्यति ॥ ३५ ॥