भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 228
२०८माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

सति घटे घटाभासता विपर्यासः स्यान्न तु तदस्ति कदाचिदपि चित्तस्यार्थसंस्पर्शनम् । तस्मादनिमित्तो विपर्यासः कथं तस्य चित्तस्य भविष्यति; न कथंचिद्विपर्यासोऽस्तीत्यभिप्रायः । अयमेव हि स्वभावश्चित्तस्य यदुतासति निमित्ते घटादौ तद्वदवभासनम् २७ | उसकी अपेक्षासे ही घटके न होनेपर भी घटका प्रतीत होना विपर्यास कहलाता । किन्तु चित्तका पदार्थके साथ कभी स्पर्श है ही नहीं। अतः बिना निमित्तके ही उस चित्तको विपरीत ज्ञान कैसे हो सकता है ? तात्पर्य यह है कि उसे किसी प्रकार विपरीत ज्ञान है ही नहीं। चित्तका यही स्वभाव है कि घटादि निमित्तके न होनेपर भी उनकी प्रतीति होती रहे ॥ २७ ॥

विज्ञानवादका खण्डन

'प्रज्ञप्तेः सनिमित्तत्वमित्याद्ये-' तदन्तं विज्ञानवादिनो बौद्धस्य वचनं बाह्यार्थवादिपक्षप्रतिषेधपरमाचार्येणानुमोदितम् । तदेव हेतुं कृत्वा तत्पक्षप्रतिषेधाय तदिदमुच्यते— | "प्रज्ञप्तेः सनिमित्तत्वम्" इस (पच्चीसवें) श्लोकसे लेकर यहाँतक आचार्यने विज्ञानवादी बौद्धके, बाह्यार्थवादीके पक्षका प्रतिषेध करनेवाले वचनका अनुमोदन किया। अब उसीको हेतु बनाकर उसीके पक्षका प्रतिषेध करनेके लिये इस प्रकार कहा जाता है—

तस्मान्न जायते चित्तं चित्तदृश्यं न जायते ।
तस्य पश्यन्ति ये जातिं खे वै पश्यन्ति ते पदम् ॥ २८ ॥

इसलिये चित्त भी उत्पन्न नहीं होता और न चित्तका दृश्य ही उत्पन्न होता है । जो लोग उसका जन्म देखते हैं वे निश्चय ही आकाशमें [ पक्षी आदिके ] चरण ( चरण-चिह्न ) देखते हैं ॥ २८ ॥

यस्मादसत्येव घटादौ घटाद्याभासता चित्तस्य विज्ञानवादिना- | क्योंकि विज्ञानवादीने घटादिके न होनेपर भी चित्तको घटादिकी प्रतीति होनी स्वीकार की है और