माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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| शां० भा० ] | अलातशान्तिप्रकरण | २०७ |
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| हि जागरितेऽपि स्वप्नार्थवदेव बाह्यः शब्दाद्यर्थो यत उक्तहेतुत्वाच्च । नाप्यर्थाभासाश्चित्तात्पृथक्किञ्चित्तमेव हि घटाद्यर्थवदवभासते यथा स्वप्ने ॥ २६ ॥ | ग्रहण करता है, क्योंकि उपर्युक्त हेतुसे ही स्वप्नगत पदार्थोंके समान जागरित अवस्थामें भी शब्दादि बाह्य पदार्थ हैं नहीं, और न चित्तसे पृथक् अर्थाभास ही है। घटादि पदार्थोंके समान चित्त ही भासता है, जैसा कि वह स्वप्नमें भासा करता है ॥ २६ ॥ |
| ननु विपर्यासस्तर्ह्यसति घटादौ घटाद्याभासता चित्तस्य । तथा च सत्यविपर्यासः क्वचिद्वक्तव्य इति । अत्रोच्यते— | घटादिके न होनेपर भी चित्तको घटादिकी प्रतीति होना—यह तो विपरीत ज्ञान है। ऐसी अवस्थामें अविपरीत (सम्यक्) ज्ञान कब होगा? यह बतलाना चाहिये। इसपर कहते हैं— |
निमित्तं न सदा चित्तं संस्पृशत्यध्वसु त्रिषु ।
अनिमित्तो विपर्यासः कथं तस्य भविष्यति ॥ २७ ॥
[भूत, भविष्यत् और वर्तमान] तीनों अवस्थाओंमें चित्त कभी किसी विषयको स्पर्श नहीं करता। फिर उसे बिना निमित्तके ही विपरीत ज्ञान कैसे हो सकता है? ॥ २७ ॥
| निमित्तं विषयमतीतानागतवर्त्तमानाध्वसु त्रिष्वपि सदा चित्तं न स्पृशेदेव हि । यदि हि क्वचित् संस्पृशेत् सोऽविपर्यासः परमार्थ इति । अतस्तदपेक्षया- | अतीत, अनागत और वर्तमान—इन तीनों ही अवस्थाओंमें चित्त कभी निमित्त यानी विषयको स्पर्श नहीं करता। यदि वह कभी उसे स्पर्श करता तो 'वह अविपर्यास अर्थात् परमार्थ है' ऐसा माना जाता। अतः |