माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २०६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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दर्शनविषयत्वाच्च निमित्तस्या- | नहीं मानते। भ्रान्तिदृष्टिके विषय होनेके कारण इन निमित्तोंका अ- निमित्तत्वं भवेत् । तदभावे- | निमित्तत्व है, क्योंकि उसका अभाव ऽभावात् । न हि सुषुप्तसमाहित- | होनेपर इनकी भी उपलब्धि नहीं होती। सोये हुए, समाधिस्थ और मुक्तानां भ्रान्तिदर्शनाभाव | मुक्त पुरुषोंको, उनकी भ्रान्तिदृष्टिका आत्मव्यतिरिक्तो बाह्योऽर्थ | अभाव हो जानेपर, आत्मासे अतिरिक्त किसी बाह्य पदार्थकी उपलब्धि नहीं उपलभ्यते । न ह्युन्मत्तावगतं | होती। उन्मत्त पुरुषको दिखायी देनेवाली वस्तु उन्मादशून्य मनुष्यको वस्त्वनुन्मत्तैरपि तथाभूतं गम्यते । | भी यथार्थ नहीं जान पड़ती। इस एतेन द्वयदर्शनं संक्लेशोपलब्धिश्च | कथनसे द्वैतदर्शन और क्लेशकी उपलब्धि दोनोंहीका निराकरण प्रत्युक्ता ॥२५॥ | किया गया है ॥ २५ ॥
यस्मान्नास्ति बाह्यं निमित्तमतः | क्योंकि बाह्य विषय हैं ही नहीं, इसलिये—
चित्तं न संस्पृशत्यर्थं नार्थाभासं तथैव च ।
अभूतो हि यतश्चार्थो नार्थाभासस्ततः पृथक् ॥ २६ ॥
चित्त किसी पदार्थका स्पर्श नहीं करता और इसी प्रकार न किसी अर्थाभासका ही ग्रहण करता है। क्योंकि पदार्थ है ही नहीं इसलिये पदार्थाभास भी उस चित्तसे पृथक् नहीं है ॥ २६ ॥
चित्तं न स्पृशत्यर्थं बाह्या- | चित्त, चित्त होनेके कारण ही लम्बनविषयम्, नाप्यर्थाभासं | स्वप्नचित्तके समान, बाह्य आलम्बन- चित्तत्वात्स्वप्नचित्तवत् । अभूतो | के विषयभूत किसी पदार्थको स्पर्श नहीं करता और न अर्थाभासको ही