माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
शां० भा० ] अद्वैतप्रकरण १७५
| सुखमुत्तमं निरतिशयं हि तद्योगिप्रत्यक्षमेव । न जातमित्यजं यथा विषयविषयम् । अजेनानुत्पन्नेन ज्ञेयेनाव्यतिरिक्तं सत्त्वेन सर्वज्ञरूपेण सर्वज्ञं ब्रह्मैव सुखं परिचक्षते कथयन्ति ब्रह्मविदः ॥ ४७ ॥ | साधारण है, 'सुखमुत्तमम्'—योगियोंको ही प्रत्यक्ष होनेवाला होनेके कारण निरतिशय सुख है। तथा 'अजम्'—जो उत्पन्न न हो, जिस प्रकार कि विषयसम्बन्धी सुख हुआ करता है, और अज यानी उत्पन्न न होनेवाले ज्ञेयसे अभिन्न होनेके कारण अपने सर्वज्ञरूपसे स्वयं ब्रह्म ही वह सुख है—ऐसा ब्रह्मज्ञलोग [उसके विषयमें] कहते हैं ॥ ४७ ॥ |
परमार्थसत्य क्या है ?
| सर्वोऽप्ययं मनोनिग्रहादिर्मृल्लोहादिवत्सृष्टिरुपासना चोक्ता परमार्थस्वरूपप्रतिपत्त्युपायतत्वेन न परमार्थसत्येति । परमार्थसत्यं तु | मृत्तिका और लोहादिके समान ये मनोनिग्रहादि सम्पूर्ण सृष्टि तथा उपासना परमार्थस्वरूपकी प्राप्तिके उपायरूपसे ही कहे गये हैं; ये परमार्थसत्य नहीं हैं। परमार्थसत्य तो यही है कि— |
न कश्चिज्जायते जीवः संभवोऽस्य न विद्यते ।
एतत्तदुत्तमं सत्यं यत्र किञ्चिन्न जायते ॥ ४८ ॥
कोई भी जीव उत्पन्न नहीं होता; क्योंकि उसका कोई कारण ही नहीं है। जिस अजन्मा ब्रह्ममें किसीकी उत्पत्ति नहीं होती वही सर्वोत्तम सत्य है ॥ ४८ ॥
| १७६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| न कश्चिज्जायते जीवः कर्ता भोक्ता च नोत्पद्यते केनचिदपि प्रकारेण । अतः स्वभावतोऽजस्यास्यैकस्यात्मनः संभवः कारणं न विद्यते नास्ति । यस्मान्न विद्यतेऽस्य कारणं तस्मान्न कश्चिज्जायते जीव इत्येतत् । पूर्वेषूपायत्वेनोक्तानां सत्यानामेतदुत्तमं सत्यं यस्मिन्सत्यस्वरूपे ब्रह्मण्यणुमात्रमपि किंचिन्न जायत इति ॥ ४८ ॥ | कोई भी जीव उत्पन्न नहीं होता—अर्थात् किसी भी प्रकारसे कर्ता-भोक्ताकी उत्पत्ति नहीं होती । अतः स्वभावसे ही इस एक अजन्मा आत्माका कोई सम्भव—कारण नहीं है। और क्योंकि इसका कोई कारण नहीं है इसलिये किसी जीवकी उत्पत्ति भी नहीं होती—यही इसका तात्पर्य है। पहले उपायरूपसे बतलाये हुए सत्योंमें यही उत्तम सत्य है, जिस सत्यस्वरूप ब्रह्ममें कोई भी वस्तु अणुमात्र भी उत्पन्न नहीं होती ॥४८॥ |
इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीशङ्करभगवतः कृतौ गौडपादीयागमशास्त्रभाष्येऽद्वैताख्यं
तृतीयं प्रकरणम् ॥ ३ ॥
ॐ तत्सत्
अलातशान्तिप्रकरणम्
| प्रकरण-प्रयोजनम् | ओङ्कारनिर्णयद्वारेणागमतः प्रतिज्ञातस्याद्वैतस्य बाह्यविषयभेदवैतथ्याच्च सिद्धस्य पुनरद्वैते शास्त्रयुक्तिभ्यां साक्षान्निर्धारितस्यैतदुत्तमं सत्यमित्युपसंहारः कृतोऽन्ते । तस्यैतस्यागमार्थस्याद्वैतदर्शनस्य प्रतिपक्षभूता द्वैतिनो वैनाशिकाश्च तेषां चान्योन्यविरोधाद्रागद्वेषादिक्लेशास्पदं दर्शनमिति मिथ्यादर्शनत्वं सूचितम् । क्लेशानास्पदत्वात्तत्सम्यग्दर्शनमित्यद्वैतदर्शनं स्तूयते । तदिह विस्तरेणान्योन्यविरुद्धतयाऽसम्यग्दर्शनत्वं प्रदर्श्य | ओंकारके निर्णयद्वारा आगमप्रकरणमें प्रतिज्ञा किये अद्वैतका—जिसे कि [वैतथ्यप्रकरणमें] बाह्य विषयभेदके मिथ्यात्वद्वारा सिद्ध किया है और फिर अद्वैत प्रकरणमें शास्त्र और युक्तियोंसे साक्षात् निश्चय किया है, [पिछले प्रकरणके] अन्तमें 'एतदुत्तमं सत्यम्' ऐसा कहकर उपसंहार किया गया । वेदके तात्पर्यभूत इस अद्वैतदर्शनके विरोधी जो द्वैतवादी और वैनाशिक (बौद्ध आदि) हैं उनके दर्शन परस्पर विरोधी होनेके कारण राग-द्वेषादि क्लेशोंके आश्रय हैं, अतः उनका मिथ्यादर्शनत्व सूचित होता है । और राग-द्वेषादि क्लेशोंका आश्रय न होनेके कारण अद्वैतदर्शन ही सम्यग्दर्शन है—इस प्रकार उसकी स्तुति की जाती है । अब यहाँ, परस्पर विरोधी होनेके कारण विस्तारपूर्वक उन (द्वैतवादी आदि दार्शनिकोंके दर्शन) का मिथ्यादर्शनत्व प्रदर्शित कर उनके प्रति- |
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२३–२४
| १७८ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| तत्प्रतिषेधेनाद्वैतदर्शनसिद्धिरूप- | पेधद्वारा आवीतन्यायसे* अद्वैतदर्शन- |
| संहर्त्तव्यावीतन्यायेनेत्यलात- | की सिद्धिका उपसंहार करना है—इसी- |
| शान्तिरारभ्यते । | लिये अलातशान्तिप्रकरणका आरम्भ किया जाता है । |
| तत्राद्वैतदर्शनसम्प्रदायकर्तुः | उसमें अद्वैतदर्शनसम्प्रदायके |
| अद्वैतस्वरूपेणैव नमस्कारार्थो- | कर्ताको अद्वैतरूपसे ही नमस्कार |
| ऽयमाद्यश्लोकः । आचार्यपूजा | करनेके लिये यह पहला श्लोक है, |
| ह्यभिप्रेतार्थसिद्धयर्थेष्यते शास्त्रा- | क्योंकि शास्त्रके आरम्भमें आचार्यकी |
| रम्भे । | पूजा अभिप्रेत अर्थकी सिद्धिके लिये इष्ट ही है । |
नारायण-नमस्कार
ज्ञानेनाकाशकल्पेन धर्मान्यो गगनोपमान् ।
ज्ञेयाभिन्नेन संबुद्धस्तं वन्दे द्विपदां वरम् ॥ १ ॥
जिसने ज्ञेय (आत्मा) से अभिन्न आकाशसदृश ज्ञानसे आकाश-सदृश धर्मों (जीवों) को जाना है उस पुरुषोत्तमको नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥
| आकाशेनेषदसमाप्तमाकाश- | जो आकाशकी अपेक्षा कुछ |
| कल्पमाकाशतुल्यमेतत् । तेना- | असम्पूर्ण हो † उसे आकाशकल्प |
| काशकल्पेन ज्ञानेन, किम् ? | अर्थात् आकाशतुल्य कहते हैं । |
| धर्मान्आत्मनः, किविशिष्टान्-ग- | उस आकाशसदृश ज्ञानसे—किसे ? आत्माके धर्मोंको । किस प्रकारके |
* अनुमान दो प्रकारका है—अन्वयी और व्यतिरेकी । अन्वयी अनुमानमें एक वस्तुकी सत्तासे दूसरी वस्तुकी सत्ता सिद्ध की जाती है तथा व्यतिरेकीमें एक वस्तुके अभावसे दूसरी वस्तुका अभाव सिद्ध किया जाता है । इस व्यतिरेकी अनुमानका ही दूसरा नाम ‘आवीत अनुमान’ भी है ।
† असम्पूर्णका यह भाव नहीं समझना चाहिये कि ब्रह्म आकाशकी अपेक्षा कुछ न्यून है । इसका केवल यही भाव है कि वह सर्वथा आकाशरूप ही नहीं है—आकाशसे कुछ मिलता-जुलता है ।
| शां० भा० ] | अलातशान्तिप्रकरण | १७९ |
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| नोपमान्गगनमुपमा येषां ते गग-<br>नोपमास्तानात्मनो धर्मान् ।<br>ज्ञानस्यैव पुनर्विशेषणम्—<br>ज्ञेयैर्धर्मैरात्मभिरभिन्नमग्न्युष्ण-<br>वत्सचितृप्रकाशवच्च ज्ञानं तेन<br>ज्ञेयाभिन्नेन ज्ञानेनाकाशकल्पेन<br>ज्ञेयात्मस्वरुपान्व्यतिरिक्तेन गग-<br>नोपमान्धर्मान्यः संबुद्धः संबुद्धवा-<br>निति, अयमेवेश्वरो यो नारायणा-<br>ख्यस्तं वन्देऽभिवादये द्विपदां वरं<br>द्विपदोपलक्षितानां पुरुषाणां वरं<br>प्रधानं पुरुषोत्तममित्यभिप्रायः ।<br>उपदेष्टृनमस्कारमुखेन ज्ञान-<br>ज्ञेयज्ञातृभेदरहितं परमार्थतत्त्व-<br>दर्शनमिह प्रकरणे प्रतिपिपाद-<br>यिषितं प्रतिपक्षप्रतिषेधद्वारेण<br>प्रतिज्ञातं भवति ॥ १ ॥ | धर्मोंको ? गगनोपम धर्मोंको—गगन<br>( आकाश ) जिनकी उपमा हो<br>उन्हें गगनोपम कहते हैं—ऐसे आत्मा-<br>के धर्मोंको । ज्ञानका ही फिर<br>विशेषण देते हैं—अग्निसे उष्णता<br>और सूर्यसे प्रकाशके समान जो<br>ज्ञान ज्ञेय धर्मों अर्थात् आत्माओंसे<br>अभिन्न है उस ज्ञेयाभिन्न अर्थात्<br>ज्ञेय आत्माके स्वरूपसे अन्यतिरिक्त<br>आकाशसदृश ज्ञानसे जिसने<br>आकाशोपम धर्मोंको सदा ही सम्यक्<br>प्रकार जाना है—ऐसा जो नारायण-<br>संज्ञक* ईश्वर है उस द्विपदांवर—<br>दो पदोंसे उपलक्षित पुरुषोंमें श्रेष्ठ<br>यानी प्रधान पुरुषोत्तमकी वन्दना—<br>अभिवादन करता हूँ ।<br>उपदेष्टाको नमस्कार करनेसे<br>यह प्रतिज्ञा की जाती है कि इस<br>प्रकरणमें विरुद्ध पक्षके प्रतिषेधद्वारा<br>ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाताके भेदसे रहित<br>परमार्थदर्शनका प्रतिपादन करना<br>अभीष्ट है ॥ १ ॥ |
* यहाँ अद्वैतसम्प्रदायके आदि आचार्य बदरिकाश्रमाधीश्वर तापसाग्रगण्य श्रीनारायणकी वन्दना की गयी है ।
| १८० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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अद्वैतदर्शनकी वन्दना
| अधुना अद्वैतदर्शनयोगस्य नमस्कारस्तत्स्तुतये-- | अब अद्वैतदर्शनयोगको, उसकी स्तुतिके लिये, नमस्कार किया जाता है— |
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अस्पर्शयोगो वै नाम सर्वसत्त्वसुखो हितः ।
अविवादोऽविरुद्धश्च देशितस्तं नमाम्यहम् ॥ २ ॥
[ शास्त्रोंमें ] जिस सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये सुखकर, हितकारी, निर्विवाद और अविरोधी अस्पर्शयोगका उपदेश किया गया है, उसे मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥
| स्पर्शनं स्पर्शः संबन्धो न विद्यते यस्य योगस्य केनचित्कदाचिदपि सोऽस्पर्शयोगो ब्रह्मस्वभाव एव, वै नामेति ब्रह्मविदामस्पर्शयोग इत्येवं-प्रसिद्ध इत्यर्थः । स च सर्वसत्त्वसुखः । भवति कश्चिदत्यन्तसुखसाधनविशिष्टोऽपि दुःखरूपः, यथा तपः । अयं तु न तथा । किं तर्हि सर्वसत्त्वानां सुखः । | जिस योगका किसीसे कभी स्पर्श यानी सम्बन्ध नहीं है उसे ‘अस्पर्शयोग’ कहते हैं; वह ब्रह्मस्वभाव ही है । ‘वै’ ‘नाम’ इन पदोंका यह तात्पर्य है कि वह ‘ब्रह्मवेत्ताओंका अस्पर्शयोग’ इस नामसे प्रसिद्ध है और वह समस्त प्राणियोंके लिये सुखकर होता है । कोई विषय तो अत्यन्त सुखसाधन-विशिष्ट होनेपर भी दुःखरूप होता है, जैसा कि तप । किन्तु यह ऐसा नहीं है । तो फिर कैसा है ? यह सभी प्राणियोंके लिये सुखदायक है । | | तथेह भवति कश्चिद्विषयोपभोगः सुखो न हितः । अयं तु | इसी प्रकार इस लोकमें कोई-कोई विषयसामग्री सुखदायक तो होती है किन्तु हितकर नहीं होती । |
शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण १८१
| सुखो हितश्च नित्यमप्रचलित-स्वभावत्वात् । किं चाविवादो विरुद्धवदनं विवादः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहेण यस्मिन्न विद्यते सोऽविवादः । कस्मात् ? यतोऽविरुद्धश्च । य ईदृशो योगो देशितः उपदिष्टः शास्त्रेण तं नमाम्यहं प्रणमामीत्यर्थः ॥ २ ॥ | किन्तु यह तो सर्वदा अविचल-स्वभाव होनेके कारण सुखदायक भी है और हितकर भी। यही नहीं, यह अविवाद भी है। जिसमें पक्ष-प्रतिपक्ष स्वीकार करके विरुद्ध कथनस्वरूप विवाद नहीं होता उसे अविवाद कहते हैं। ऐसा यह क्यों है ? क्योंकि यह सबसे अविरुद्ध है। ऐसे जिस योगका शास्त्रने उपदेश किया है, उसे मैं नमस्कार यानी प्रणाम करता हूँ ॥ २ ॥ |
द्वैतवादियोंका पारस्परिक विरोध
| कथं द्वैतिनः परस्परं विरुध्यन्ते ? इत्युच्यते-- | द्वैतवादियोंमें परस्पर किस प्रकार विरोध है ? सो बतलाया जाता है-- |
भूतस्य जातिमिच्छन्ति वादिनः केचिदेव हि ।
अभूतस्यापरे धीरा विवदन्तः परस्परम् ॥ ३ ॥
उनमेंसे कोई-कोई वादी तो सत् पदार्थकी उत्पत्ति मानते हैं और कोई दूसरे बुद्धिशाली परस्पर विवाद करते हुए असत्पदार्थकी उत्पत्ति स्वीकार करते हैं ॥ ३ ॥
| भूतस्य विद्यमानस्य वस्तुनो जातिमुत्पत्तिमिच्छन्ति वादिनः केचिदेव हि सांख्या न सर्व | कोई-कोई वादी—केवल सांख्य-मतावलम्बी, सम्पूर्ण द्वैतवादी नहीं—भूत यानी विद्यमान वस्तुकी जाति—उत्पत्ति मानते हैं; और क्योंकि |
१८२ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
| एव द्वैतिनः । यस्मादभूतस्या-विद्यमानस्यापरे वैशेषिका नैयायिकाश्च धीरा धीमन्तः प्राज्ञाभिमानिन इत्यर्थः विवदन्तो विरुद्धं वदन्तो ह्यन्योन्यमिच्छन्ति जेतुमित्यभिप्रायः॥३॥ | दूसरे धीर-बुद्धिमान् यानी प्राज्ञाभिमानी वैशेषिक और नैयायिक-लोग अभूत अर्थात् अविद्यमान वस्तु-का जन्म स्वीकार करते हैं, इसलिये परस्पर विवाद यानी विरुद्ध भाषण करते हुए वे एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छा करते रहते हैं—यह इसका तात्पर्य है ॥ ३ ॥ |
| तैरेवं विरुद्धवदनेनान्योन्यपक्षप्रतिषेधं कुर्वद्भिः किं ख्यापितं भवत्युच्यते— | परस्पर विवाद करके एक-दूसरेके पक्षका खण्डन करनेवाले उन वादियोंद्वारा किस सिद्धान्तका प्रकाश किया जाता है, सो बतलाते हैं— |
भूतं न जायते किंचिदभूतं नैव जायते ।
विवदन्तोऽद्वया ह्येवमजातिं ख्यापयन्ति ते ॥ ४ ॥
[ किन्हींका मत है—] 'कोई सद्वस्तु उत्पन्न नहीं होती' और [ कोई कहते हैं—] 'असद्वस्तुका जन्म नहीं होता'—इस प्रकार परस्पर विवाद करनेवाले ये अद्वैतवादी* अजाति (अजातवाद) को ही प्रकाशित करते हैं ॥ ४ ॥
| भूतं विद्यमानं वस्तु न जायते किंचिद्विद्यमानत्वादेवात्मवदित्येवं वदन्नसद्वादी सांख्यपक्षं प्रतिषेधति सज्जन्म । तथा भूतमविद्यमानमविद्यमानत्वान्नैव जायते | कोई भी भूत अर्थात् विद्यमान वस्तु, विद्यमान होनेके कारण ही, उत्पन्न नहीं होती; जैसे कि आत्मा—इस प्रकार कहकर असद्वादी, सांख्यके पक्ष सद्वादका, खण्डन करता है। तथा सांख्य भी 'अभूत—अविद्यमान वस्तु अविद्यमान होनेके कारण ही |
* यहाँ द्वैतवादियोंको ही व्यंगसे 'अद्वैतवादी' कहा है।
शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण १८३
| शशविषाणवदित्येवं वदन्सां- | शशशृङ्गके समान उत्पन्न नहीं हो |
| ख्योऽप्यसद्वादिपक्षमसज्जन्म प्रति- | सकती'—ऐसा कहकर असद्वादीके |
| पक्ष असत्की उत्पत्तिका प्रतिषेध | |
| षेधति। विवदन्तो विरुद्धं वदन्तो- | करता है। इस प्रकार परस्पर विवाद |
| यानी विरुद्ध भाषण करनेवाले ये | |
| ऽद्वया अद्वैतिनो ह्येते अन्योन्यस्य | अद्वैतवादी—क्योंकि वस्तुतः ये अद्वैत- |
| पक्षौ सदसतोर्जन्मनी प्रतिषेधन्तो- | वादी ही हैं—एक-दूसरेके पक्ष |
| सज्जन्म और असज्जन्मका खण्डन | |
| ऽजातिमनुत्पत्तिमर्थात्ख्यापयन्ति | करते हुए अर्थतः अजाति—अनुत्पत्ति- |
| प्रकाशयन्ति ते ॥४॥ | को ही प्रकाशित करते हैं ॥ ४ ॥ |
द्वैतवादियोंद्वारा प्रदर्शित अजातिका अनुमोदन
ख्याप्यमानामजातिं तैरनुमोदामहे वयम् ।
विवदामो न तैः सार्धमविवादं निबोधत ॥ ५ ॥
उनके द्वारा प्रकाशित की हुई अजातिका हम भी अनुमोदन करते हैं। हम उनसे विवाद नहीं करते अतः तुम उस निर्विवाद [ परमार्थ-दर्शन ] को अच्छी तरह समझ लो ॥ ५ ॥
| तैरेवं ख्याप्यमानामजातिमेव- | उनके द्वारा इस प्रकार प्रकाशित |
| मस्त्वित्यनुमोदामहे केवलं न | की गयी अजातिका हम 'ऐसा ही |
| हो' इस प्रकार केवल अनुमोदन | |
| तैः सार्धं विवदामः पक्षप्रतिपक्ष- | करते हैं। तात्पर्य यह है कि पक्ष- |
| ग्रहणेन; यथा तेऽन्योन्यमित्य- | प्रतिपक्ष लेकर उनके साथ विवाद |
| नहीं करते, जैसा कि वे आपसमें | |
| भिप्रायः। अतस्तमविवादं विवाद- | किया करते हैं। अतः हे शिष्यगण ! |
| हमारेद्वारा उपदेश किये हुए उस | |
| रहितं परमार्थदर्शनमनुज्ञातमस्मा- | अविवाद—विवादरहित परमार्थदर्शन- |
| भिर्निबोधत हे शिष्याः ॥५॥ | को तुम अच्छी तरह समझ लो ॥५॥ |
| १८४ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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अजातस्यैव धर्मस्य जातिमिच्छन्ति वादिनः ।
अजातो ह्यमृतो धर्मो मर्त्यतां कथमेष्यति ॥ ६ ॥
ये वादीलोग अजात वस्तुका ही जन्म होना स्वीकार करते हैं। किन्तु जो पदार्थ निश्चय ही अजात और अमृत है वह मरणशीलताको कैसे प्राप्त हो सकता है ? ॥ ६ ॥
| सदसद्वादिनः सर्वेऽपीति पुरस्तात्कृतभाष्यश्लोकः ॥ ६ ॥ | यहाँ [ 'वादिनः' पदसे ] सभी सद्वादी और असद्वादी अभिप्रेत हैं। इस श्लोकका भाष्य पहले * किया जा चुका है ॥ ६ ॥ |
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स्वभावविपर्यय असम्भव है
न भवत्यमृतं मर्त्यं न मर्त्यममृतं तथा ।
प्रकृतेरन्यथाभावो न कथंचिद्भविष्यति ॥ ७ ॥
मरणरहित वस्तु कभी मरणशील नहीं हो सकती और मरणशील मरणहीन नहीं हो सकती, क्योंकि किसीके स्वभावका विपर्यय किसी प्रकार होनेवाला नहीं है ॥ ७ ॥
स्वभावेनामृतो यस्य धर्मो गच्छति मर्त्यताम् ।
कृतकेनामृतस्तस्य कथं स्थास्यति निश्चलः ॥ ८ ॥
जिसके मतमें स्वभावसे ही मरणहीन धर्म मरणशीलताको प्राप्त हो जाता है; उसके सिद्धान्तानुसार कृतक (जन्म) होनेके कारण वह अमृत पदार्थ निश्चल (चिरस्थायी) कैसे रह सकेगा ? ॥ ८ ॥
* देखिये अद्वैतप्रकरण श्लोक २० का अर्थ।
| शां० भा० ] | अलातशान्तिप्रकरण | १८५ |
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| उक्तार्थानां श्लोकानामिहोपन्यासः परवादिपक्षाणामन्योन्यविरोधख्यापितानुत्पत्त्यनुमोदनप्रदर्शनार्थः ॥ ७-८ ॥ | जिनका अर्थ पहले कहा जा चुका है ऐसे उपर्युक्त [तीन] श्लोकोंका उल्लेख यहाँ विपक्षी वादियोंके पक्षोंके पारस्परिक विरोधसे प्रकाशित अजातिका अनुमोदन प्रदर्शित करनेके लिये किया गया है ॥ ७-८ ॥ |
| यस्माल्लौकिक्यपि प्रकृतिर्न विपर्येति, कासावित्याह— | क्योंकि लौकिकी प्रकृतिका भी विपर्यय नहीं होता [फिर पारमार्थिकीका तो कैसे होगा ?] किन्तु वह प्रकृति है क्या ? इसपर कहते हैं— |
सांसिद्धिकी स्वाभाविकी सहजा अकृता च या ।
प्रकृतिः सेति विज्ञेया स्वभावं न जहाति या ॥ ९ ॥
जो उत्तम सिद्धिद्वारा प्राप्त, स्वभावसिद्धा, सहजा और अकृता है तथा कभी अपने स्वभावका परित्याग नहीं करती वही ‘प्रकृति’ है—ऐसा जानना चाहिये ॥ ९ ॥
| सम्यक्सिद्धिः संसिद्धिस्तत्र भवा सांसिद्धिकी यथा योगिनां सिद्धानामणिमाद्यैश्वर्यप्राप्तिः प्रकृतिः । सा भूतभविष्यत्कालयोरपि योगिनां न विपर्येति तथैव सा । तथा स्वाभाविकी द्रव्यस्वभावत एव यथाग्न्या- | सम्यक् सिद्धिका नाम संसिद्धि है; उससे होनेवालीको ‘सांसिद्धिकी’ कहते हैं; जिस प्रकार कि सिद्ध योगियोंको अणिमादि ऐश्वर्यकी प्राप्ति उनकी प्रकृति है । योगियोंकी उस प्रकृतिका भूत और भविष्यत् कालमें भी विपर्यय नहीं होता—वह जैसी-की-तैसी ही रहती है । तथा ‘स्वाभाविकी’ वस्तुके स्वभावसे सिद्ध; जैसी कि |
| १८६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| दीनाम् उष्णप्रकाशादिलक्षणा, सापि न कालान्तरे व्यभिचरति देशान्तरे च । तथा सहजा आत्मना सहैव जाता यथा पक्ष्यादीनामाकाशगमनादिलक्षणा ।<br><br>अन्यापि या काचिदकृता केनचिन्न कृता यथापां निम्नदेशगमनादिलक्षणा । अन्यापि या काचित्स्वभावं न जहाति सा सर्वा प्रकृतिरिति विज्ञेया लोके। मिथ्याकल्पितेषु लौकिकेष्वपि वस्तुषु प्रकृतिर्नान्यथा भवति किमुताजस्वभावेषु परमार्थवस्तुष्वमृतत्वलक्षणा प्रकृतिर्नान्यथा भवतीत्यभिप्रायः ॥ ९॥ | अग्नि आदिकी उष्णता एवं प्रकाशादिरूपा प्रकृति होती है । उसका भी कालान्तर और देशान्तरमें व्यभिचार नहीं होता । तथा 'सहजा'—अपने साथ ही उत्पन्न होनेवाली; जैसे कि पक्षी आदिकी आकाशगमनादिरूपा प्रकृति होती है ।<br><br>और भी जो कोई 'अकृता'—किसीके द्वारा सम्पादन न की हुई; जैसे कि जलोंकी प्रकृति निम्न प्रदेशकी ओर जानेकी है । तथा इसके सिवा अन्य भी जो कोई अपने स्वभावको नहीं छोड़ती उस सबको लोकमें 'प्रकृति' नामसे ही जानना चाहिये । मिथ्या कल्पना की हुई लौकिक वस्तुओंमें भी उनकी प्रकृति अन्यथा नहीं होती; फिर अजस्वभाव परमार्थ वस्तुओंमें उनकी अमृतत्वलक्षणा प्रकृति अन्यथा नहीं हो सकती—इसमें तो कहना ही क्या है ? यह इसका अभिप्राय है ॥९॥ |
जीवका जरामरण माननेमें दोष
| किंविषया पुनः सा प्रकृतिर्यस्या अन्यथाभावो वादिभिः | वादीलोग जिसके अन्यथाभावकी कल्पना करते हैं उस प्रकृतिका विषय क्या है ? और उनकी |
शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण १८७
| कल्प्यते कल्पनायां वा को दोष इत्याह— | कल्पनामें क्या दोष है ? इसपर कहते हैं— |
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जरामरणनिर्मुक्ताः सर्वे धर्माः स्वभावतः ।
जरामरणमिच्छन्तश्च्यवन्ते तन्मनीषया ॥ १० ॥
समस्त जीव स्वभावसे ही जरा-मरणसे रहित हैं। उनके जरा-मरण स्वीकार करनेवाले लोग, इस विचारके कारण ही, स्वभावसे च्युत हो जाते हैं ॥ १० ॥
| जरामरणनिर्मुक्ताः—जरा-मरणादिसर्वविक्रियावर्जिता इत्यर्थः । के ? सर्वे धर्माः सर्व आत्मान इत्येतत्स्वभावतः प्रकृतितः । एवंस्वभावाः सन्तो धर्मा जरामरणमिच्छन्त इच्छन्त इवेच्छन्तो रज्ज्वामिव सर्पमात्मनि कल्पयन्तश्च्यवन्ते स्वभावतश्चलन्तीत्यर्थः, तन्मनीषया जन्ममरणचिन्तया तद्भावभावितत्वदोषेणेत्यर्थः ॥ १० ॥ | ‘जरामरणनिर्मुक्ताः’ अर्थात् जरा-मरणादि सम्पूर्ण विकारोंसे रहित हैं। कौन ? सम्पूर्ण धर्म अर्थात् समस्त जीवात्मा, स्वभावतः यानी प्रकृतिसे ही । ऐसे स्वभाववाले होनेपर भी जरा-मरणके इच्छुकके समान इच्छा करनेवाले अर्थात् रज्जुमें सर्पकी भाँति आत्मामें जरा-मरणकी कल्पना करनेवाले जीव, उसकी मनीषा—जरामरणकी चिन्तासे अर्थात् उस भावसे भावित होनेके दोषवश अपने स्वभावसे च्युत—विचलित हो जाते हैं ॥ १० ॥ |
सांख्यमतपर वैशेषिककी आपत्ति
| कथं सञ्जातिवादिभिः सांख्यैरनुपपन्नमुच्यत इत्याह वैशेषिकः— | सञ्जातिवादी सांख्यमतावलम्बियोंका कथन किस प्रकार असङ्गत है ? सो वैशेषिकमतावलम्बी बतलाते हैं— |
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| १८८ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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कारणं यस्य वै कार्यं कारणं तस्य जायते ।
जायमानं कथमजं भिन्नं नित्यं कथं च तत् ॥ ११ ॥
जिस (सांख्यमतावलम्बी) के मतमें कारण ही कार्य है उसके सिद्धान्तानुसार कारण ही उत्पन्न होता है । किन्तु जब कि वह जन्म लेनेवाला है तो अजन्मा कैसे हो सकता है और भिन्न (विदीर्ण) होनेपर भी नित्य कैसे हो सकता है ? ॥ ११ ॥
| कारणं मृद्वदुपादानलक्षणं यस्य वादिनो वै कार्यं कारणमेव कार्याकारेण परिणमते यस्य वादिन इत्यर्थः, तस्याजमेव सत्प्रधानादि कारणं महदादि-कार्यरूपेण जायत इत्यर्थः । महदाद्याकारेण चेज्जायमानं प्रधानं कथमजमुच्यते तैरिति-प्रतिषिद्धं चेदं जायतेऽजं चेति ।<br><br>नित्यं च तैरूच्यते प्रधानं भिन्नं विदीर्णं स्फुटितमेकदेशेन सत्कथं नित्यं भवेदित्यर्थः । न हि सावयवं घटादि एकदेश- | जिस वादीके मतमें मृत्तिकाके समान उपादान कारण ही कार्य है अर्थात् जिसके मतमें कारण ही कार्यरूपमें परिणत होता है उसके सिद्धान्तानुसार प्रधानादि कारण अजन्मा होता हुआ भी महदादि कार्यरूपसे उत्पन्न होता है—ऐसा इसका तात्पर्य है । किन्तु यदि प्रधान महदादिरूपसे उत्पन्न होने-वाला है तो वे उसे अजन्मा कैसे बतलाते हैं ? उत्पन्न होता है और अजन्मा भी है—ऐसा कथन तो परस्पर विरुद्ध है ।<br><br>इसके सिवा वे प्रधानको नित्य भी बतलाते हैं । किन्तु वह भिन्न—विदीर्ण अर्थात् एक देशमें स्फुटित यानी विकृत होनेवाला* होकर भी नित्य कैसे हो सकता है ? तात्पर्य यह कि घटादि सावयव पदार्थ, जो एक |
* जैसे बीज अङ्कुररूपसे फूटता है ।
| शां० भा० ] | अलातशान्तिप्रकरण | १८९ |
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| स्फुटनधर्मि नित्यं दृष्टं लोक इत्यर्थः । विदीर्णं च स्यादेकदेशेनाजं नित्यं चेति एतद्विप्रतिषिद्धं तैरभिधीयत इत्यभिप्रायः॥११॥ | देशमें स्फुटित होनेवाले हैं, लोकमें कभी नित्य नहीं देखे गये। वह अपने एक देशमें विदीर्ण होता है तथा अज और नित्य भी है—यह तो उनका विरुद्ध कथन ही है—ऐसा इसका अभिप्राय है ॥११॥ |
| उक्तस्यैवार्थस्य स्पष्टीकरणार्थमाह— | उपर्युक्त अभिप्रायका ही स्पष्टीकरण करनेके लिये कहते हैं— |
कारणाद्यद्यनन्यत्वमतः कार्यमजं यदि ।
जायमानाद्धि वै कार्यात्कारणं ते कथं ध्रुवम् ॥ १२ ॥
यदि कारणसे कार्यकी अभिन्नता है तब तो तुम्हारे मतमें कार्य भी अजन्मा है; और यदि ऐसी बात है तो उत्पन्न होनेवाले कार्यसे अभिन्न होनेपर कारण भी किस प्रकार निश्चल रह सकता है ? ॥ १२ ॥
| कारणादजात्कार्यस्य यद्यनन्यत्वमिष्टं त्वया ततः | यदि तुम्हें अजन्मा कारणसे कार्यकी अनन्यता इष्ट है तो [तुम्हारे मतमें ] यह बात सिद्ध होती है कि | |
| कार्यकारणयोः अभिन्नत्वे विप्रतिपत्तिः | कार्यमजमिति प्राप्तम् । इदं चान्यद्विप्रतिषिद्धं कार्यमजं चेति तव । किं चान्यत्कार्यकारणयोरनन्यत्वे जायमानाद्धि वै कार्यात्कारणमनन्यन्नित्यं ध्रुवं च ते कथं भवेत् । न हि कुक्कुट्या एकदेशः पच्यत एकदेशः प्रसवाय कल्प्यते ॥ १२ ॥ | कार्य भी अजन्मा है। किन्तु कार्य है और अजन्मा है—यह तुम्हारे कथनमें एक दूसरा विरोध है। इसके सिवा, कार्य और कारणकी अनन्यता होनेपर उत्पत्तिशील कार्यसे अभिन्न उसका कारण नित्य और निश्चल कैसे रह सकता है ? ऐसा कभी नहीं हो सकता कि मुर्गीका एक अंश तो पकाया जाय और दूसरा सन्तानोत्पत्तिके योग्य बनाये रखा जाय ॥ १२ ॥ |
| १९० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| किं चान्यत्— | इसके सिवा और भी— |
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अजाद्वै जायते यस्य दृष्टान्तस्तस्य नास्ति वै ।
जाताच्च जायमानस्य न व्यवस्था प्रसज्यते ॥ १३ ॥
जिसके मतमें अजन्मा वस्तुसे ही किसी कार्यकी उत्पत्ति होती है उसके पास निश्चय ही इसका कोई दृष्टान्त नहीं है। और यदि जात पदार्थसे ही कार्यकी उत्पत्ति मानी जाय तो अनवस्था उपस्थित हो जाती है ॥ १३ ॥
| अजादनुत्पन्नाद्वस्तुनो जायते यस्य वादिनः कार्यं दृष्टान्तस्तस्य नास्ति वै, दृष्टान्ताभावेऽर्थादजान्न किञ्चिज्जायत इति सिद्धं भवतीत्यर्थः । यदा पुनर्जाताज्जायमानस्य वस्तुनः अभ्युपगमः, तदप्यन्यस्मात् जातात्तदप्यन्यस्मादिति न व्यवस्था प्रसज्यते । अनवस्थानं स्यादित्यर्थः ॥ १३ ॥ <br><br>(पार्श्व-टिप्पणी: जाताजातयोः उभयोरपि कारणत्वानुपपत्तिः) | जिस वादीके मतमें अज–अनुत्पन्न वस्तुसे कार्यकी उत्पत्ति होती है उसके पास निश्चय ही कोई दृष्टान्त नहीं है । अतः तात्पर्य यह हुआ कि दृष्टान्तका अभाव होनेके कारण यह बात स्वयं सिद्ध हो जाती है कि अज वस्तुसे किसीकी उत्पत्ति नहीं होती । और जब किसी जात–उत्पन्न होनेवाली वस्तुसे कार्यवर्गकी उत्पत्ति मानी जाती है, तो वह भी किसी अन्य जात वस्तुसे उत्पन्न होनी चाहिये और वह किसी औरहीसे उत्पन्न होनी चाहिये—इस प्रकार कोई व्यवस्था ही नहीं रहती; अर्थात् अनवस्था उपस्थित हो जाती है ॥ १३ ॥ |
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शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण १९१
हेतु और फलके अन्योन्यकारणत्वमें दोष
| “यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्” (बृ० उ० २।४।१४) इति परमार्थतो द्वैताभावः श्रुत्योक्तस्तमाश्रित्याह— | “जिस अवस्थामें इसकी दृष्टिमें सब आत्मा ही हो गया है” इस श्रुतिने जो परमार्थतः द्वैतका अभाव बतलाया है, उसीको आश्रित करके कहते हैं— |
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हेतोरादिः फलं येषामादिर्हेतुः फलस्य च ।
हेतोः फलस्य चानादिः कथं तैरुपवर्ण्यते ॥ १४ ॥
जिनके मतमें हेतुका कारण फल है और फलका कारण हेतु है वे हेतु और फलके अनादित्वका प्रतिपादन कैसे करते हैं ? ॥ १४ ॥
| हेतोर्धर्मादेरादिः कारणं देहादिसंघातः फलं येषां वादिनाम् । तथादिः कारणं हेतुर्धर्माधर्मादिः फलस्य च देहादिसंघातस्य । एवं हेतुफलयोरितरेतरकार्यकारणत्वेनादिमत्त्वं ब्रुवद्भिरेवं हेतोः फलस्य चानादित्वं कथं तैरुपवर्ण्यते ? विप्रतिषिद्धमित्यर्थः । न हि नित्यस्य कूटस्थस्यात्मनो हेतुफलात्मता संभवति ॥ १४ ॥ | जिन वादियोंके मतमें हेतु अर्थात् धर्मादिका आदि-कारण देहादिसंघातरूप फल है तथा देहादिसंघातरूप फलका आदि-कारण धर्माधर्मादि हेतु है*—इस प्रकार हेतु और फलका एक-दूसरेके कार्य-कारणरूपसे कारणत्व बतलानेवाले उन लोगोंद्वारा हेतु और फलका अनादित्व किस प्रकार प्रतिपादन किया जाता है ? अर्थात् उनका यह कथन सर्वथा विरुद्ध है । नित्य कूटस्थ आत्माकी हेतुफलात्मकता तो किसी प्रकार भी सम्भव नहीं है ॥ १४ ॥ |
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* अर्थात् जो धर्मादिको शरीरादिकी प्राप्तिका कारण और शरीरको धर्मादि-सम्पादनका कारण मानते हैं ।
| १९२ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| कथं तैरविरुद्धमभ्युपगम्यत इत्युच्यते— | वे किस प्रकार विरुद्ध मतको मानते हैं, सो बतलाया जाता है— |
हेतोरादिः फलं येषामादिर्हेतुः फलस्य च ।
तथा जन्म भवेत्तेषां पुत्राज्जन्म पितुर्यथा ॥ १५ ॥
जिनके मतमें हेतुका कारण फल है और फलका कारण हेतु है उनकी [ मानी हुई ] उत्पत्ति ऐसी ही है जैसे पुत्रसे पिताका जन्म होना ॥ १५ ॥
| हेतुजन्यादेव फलाद्धेतोर्जन्माभ्युपगच्छतां तेषामीदृशो विरोध उक्तो भवति यथा पुत्राज्जन्म पितुः ॥ १५ ॥ | हेतुसे उत्पन्न होनेवाले फलसे ही हेतुका जन्म माननेवाले उन लोगोंके मतमें ऐसा ही विरोध कहा जाता है जैसे पुत्रसे पिताका जन्म बतलानेमें ॥ १५ ॥ |
| यथोक्तो विरोधो न युक्तोऽभ्युपगन्तुमिति चेन्मन्यसे— | यदि तुम ऐसा मानते हो कि उपर्युक्त विरोध मानना उचित नहीं है तो— |
संभवे हेतुफलयोरेषितव्यः क्रमस्त्वया ।
युगपत्संभवे यस्मादसंबन्धो विषाणवत् ॥ १६ ॥
तुम्हें हेतु और फलकी उत्पत्तिमें क्रम स्वीकार करना चाहिये, क्योंकि उनके साथ-साथ उत्पन्न होनेमें तो [ दायें-बायें ] सींगोंके समान परस्पर [ कार्य-कारणरूप ] सम्बन्ध ही नहीं हो सकता ॥ १६ ॥
| संभवे हेतुफलयोरुत्पत्तौ क्रम एषितव्यस्त्वयान्वेष्टव्यो हेतुः पूर्वं पश्चात्फलं चेति । इतश्च | तुम्हें हेतु और फलकी उत्पत्तिमें क्रम अर्थात् पहले हेतु होता है और फिर फल—इस प्रकार दोनोंका पौर्वापर्य खोजना चाहिये; क्योंकि |
शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण १९३
| युगपत्संभवे यस्माद्धेतुफलयोः कार्यकारणत्वेनासंबन्धः, यथा युगपत्संभवतोः सव्येतरगोविषाणयोः ॥ १६ ॥ | जिस प्रकार गौके साथ-साथ उत्पन्न होनेवाले दायें और बायें सींगोंका परस्पर सम्बन्ध नहीं होता उसी प्रकार साथ-साथ उत्पन्न होनेपर तो हेतु और फलका परस्पर कार्य-कारण-रूपसे सम्बन्ध ही नहीं होगा ॥१६॥ |
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| कथमसंबन्धः ? इत्याह— | उनका किस प्रकार सम्बन्ध नहीं होगा ? सो बतलाते हैं— |
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फलादुत्पद्यमानः सन्न ते हेतुः प्रसिध्यति ।
अप्रसिद्धः कथं हेतुः फलमुत्पादयिष्यति ॥ १७ ॥
तुम्हारे मतमें यदि हेतु फलसे उत्पन्न होता है तो वह [ हेतुरूपसे ] सिद्ध ही नहीं हो सकता; और असिद्ध हेतु फलको उत्पन्न कैसे करेगा ? ॥१७॥
| जन्यात्स्वतोलब्धात्मकात् फलादुत्पद्यमानः सञ्शशविषाणादेरिवासतो न हेतुः प्रसिध्यति जन्म न लभते । अलब्धात्मकोऽप्रसिद्धः सञ्शशविषाणादिकल्पस्तव कथं फलमुत्पादयिष्यति ? न हीतरेतरापेक्षसिद्धयोः शशविषाणकल्पयोः कार्यकारणभावेन संबन्धः | जन्य अर्थात् जो स्वतः प्राप्त नहीं है उस शशशृङ्गके समान असत् फलसे उत्पन्न होनेवाला होनेपर तो हेतु ही सिद्ध नहीं होता अर्थात् उसीका जन्म नहीं हो सकता । इस प्रकार शशशृङ्गके समान जिसकी स्वतः उपलब्धि नहीं है वह अप्रसिद्ध हेतु तुम्हारे मतमें किस प्रकार फल उत्पन्न कर देगा ? एक-दूसरेकी अपेक्षासे सिद्ध होनेवाले तथा शशशृङ्गके समान सर्वथा असत् पदार्थोंका कार्य-कारणभावसे अथवा किसी और प्रकार |
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२५–२६
| १९४ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| क्वचिद्दृष्टः, अन्यथा वेत्यभिप्रायः ॥ १७ ॥ | कभी सम्बन्ध नहीं देखा गया—यह इसका अभिप्राय है ॥ १७ ॥ |
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यदि हेतोः फलात्सिद्धिः फलसिद्धिश्च हेतुतः ।
कतरत्पूर्वनिष्पन्नं यस्य सिद्धिरपेक्षया ॥ १८ ॥
[ तुम्हारे मतमें ] यदि फलसे हेतुकी सिद्धि होती है और हेतुसे फलकी सिद्धि होती है तो उनमें पहले कौन हुआ ? जिसकी अपेक्षासे कि दूसरेका आविर्भाव माना जाय ? ॥ १८ ॥
| असंबन्धतादोषेणापोदितेऽपि हेतुफलयोः कार्यकारणभावे यदि हेतुफलयोरन्योन्यसिद्धिरभ्युपगम्यत एव त्वया कतरत्पूर्वनिष्पन्नं हेतुफलयोर्यस्य पश्चाद्भाविनः सिद्धिः स्यात्पूर्वसिद्धयपेक्षया तद्ब्रूहीत्यर्थः ॥१८॥ | हेतु और फलके कार्य-कारणभावका असम्बन्धतादोषसे निराकरण कर दिया जानेपर भी यदि तुम हेतु और फलकी एक-दूसरेसे सिद्धि मानते ही हो तो इन हेतु और फलमेंसे पहले कौन हुआ—सो बतलाओ; जिसकी पूर्वसिद्धिकी अपेक्षासे पीछे होनेवालेकी सिद्धि मानी जाय ?—यह इसका तात्पर्य है ॥१८॥ |
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| अथैतन्न शक्यते वक्तुमिति मन्यसे, | और यदि तुम ऐसा मानते हो, कि यह नहीं बतलाया जा सकता तो— |
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अशक्तिरपरिज्ञानं क्रमकोपोऽथ वा पुनः ।
एवं हि सर्वथा बुद्धैरजातिः परिदीपिता ॥ १९ ॥
यह अशक्ति (असामर्थ्य) अज्ञान है, अथवा फिर तो इससे उपर्युक्त क्रमका भी विपर्यय हो जाता है [ क्योंकि इनके पूर्वापरत्वका ज्ञान न होनेसे इनमें जो पूर्ववर्ती है वह कारण है और पीछे होनेवाला कार्य है ऐसा