भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 301 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 210
१९०माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
किं चान्यत्—इसके सिवा और भी—

अजाद्वै जायते यस्य दृष्टान्तस्तस्य नास्ति वै ।
जाताच्च जायमानस्य न व्यवस्था प्रसज्यते ॥ १३ ॥

जिसके मतमें अजन्मा वस्तुसे ही किसी कार्यकी उत्पत्ति होती है उसके पास निश्चय ही इसका कोई दृष्टान्त नहीं है। और यदि जात पदार्थसे ही कार्यकी उत्पत्ति मानी जाय तो अनवस्था उपस्थित हो जाती है ॥ १३ ॥

अजादनुत्पन्नाद्वस्तुनो जायते यस्य वादिनः कार्यं दृष्टान्तस्तस्य नास्ति वै, दृष्टान्ताभावेऽर्थादजान्न किञ्चिज्जायत इति सिद्धं भवतीत्यर्थः । यदा पुनर्जाताज्जायमानस्य वस्तुनः अभ्युपगमः, तदप्यन्यस्मात् जातात्तदप्यन्यस्मादिति न व्यवस्था प्रसज्यते । अनवस्थानं स्यादित्यर्थः ॥ १३ ॥ <br><br>(पार्श्व-टिप्पणी: जाताजातयोः उभयोरपि कारणत्वानुपपत्तिः)जिस वादीके मतमें अज–अनुत्पन्न वस्तुसे कार्यकी उत्पत्ति होती है उसके पास निश्चय ही कोई दृष्टान्त नहीं है । अतः तात्पर्य यह हुआ कि दृष्टान्तका अभाव होनेके कारण यह बात स्वयं सिद्ध हो जाती है कि अज वस्तुसे किसीकी उत्पत्ति नहीं होती । और जब किसी जात–उत्पन्न होनेवाली वस्तुसे कार्यवर्गकी उत्पत्ति मानी जाती है, तो वह भी किसी अन्य जात वस्तुसे उत्पन्न होनी चाहिये और वह किसी औरहीसे उत्पन्न होनी चाहिये—इस प्रकार कोई व्यवस्था ही नहीं रहती; अर्थात् अनवस्था उपस्थित हो जाती है ॥ १३ ॥