भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 209
शां० भा० ]अलातशान्तिप्रकरण१८९
स्फुटनधर्मि नित्यं दृष्टं लोक इत्यर्थः । विदीर्णं च स्यादेकदेशेनाजं नित्यं चेति एतद्विप्रतिषिद्धं तैरभिधीयत इत्यभिप्रायः॥११॥देशमें स्फुटित होनेवाले हैं, लोकमें कभी नित्य नहीं देखे गये। वह अपने एक देशमें विदीर्ण होता है तथा अज और नित्य भी है—यह तो उनका विरुद्ध कथन ही है—ऐसा इसका अभिप्राय है ॥११॥

उक्तस्यैवार्थस्य स्पष्टीकरणार्थमाह—उपर्युक्त अभिप्रायका ही स्पष्टीकरण करनेके लिये कहते हैं—

कारणाद्यद्यनन्यत्वमतः कार्यमजं यदि ।
जायमानाद्धि वै कार्यात्कारणं ते कथं ध्रुवम् ॥ १२ ॥

यदि कारणसे कार्यकी अभिन्नता है तब तो तुम्हारे मतमें कार्य भी अजन्मा है; और यदि ऐसी बात है तो उत्पन्न होनेवाले कार्यसे अभिन्न होनेपर कारण भी किस प्रकार निश्चल रह सकता है ? ॥ १२ ॥

कारणादजात्कार्यस्य यद्यनन्यत्वमिष्टं त्वया ततःयदि तुम्हें अजन्मा कारणसे कार्यकी अनन्यता इष्ट है तो [तुम्हारे मतमें ] यह बात सिद्ध होती है कि
कार्यकारणयोः अभिन्नत्वे विप्रतिपत्तिःकार्यमजमिति प्राप्तम् । इदं चान्यद्विप्रतिषिद्धं कार्यमजं चेति तव । किं चान्यत्कार्यकारणयोरनन्यत्वे जायमानाद्धि वै कार्यात्कारणमनन्यन्नित्यं ध्रुवं च ते कथं भवेत् । न हि कुक्कुट्या एकदेशः पच्यत एकदेशः प्रसवाय कल्प्यते ॥ १२ ॥कार्य भी अजन्मा है। किन्तु कार्य है और अजन्मा है—यह तुम्हारे कथनमें एक दूसरा विरोध है। इसके सिवा, कार्य और कारणकी अनन्यता होनेपर उत्पत्तिशील कार्यसे अभिन्न उसका कारण नित्य और निश्चल कैसे रह सकता है ? ऐसा कभी नहीं हो सकता कि मुर्गीका एक अंश तो पकाया जाय और दूसरा सन्तानोत्पत्तिके योग्य बनाये रखा जाय ॥ १२ ॥
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