भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 22

आगम-प्रकरण


भाष्यकारका मङ्गलाचरण

प्रज्ञानांशुप्रतानैः स्थिरचरनिकरव्यापिभिर्व्याप्य लोकान्
भुक्त्वा भोगान्स्थविष्ठान्पुनरपि धिषणोद्भासितान्कामजन्यान् ।
पीत्वा सर्वान्विशेषान्स्वपिति मधुरभुङ् मायया भोजयन्नो
मायासंख्यातुरीयं परममृतमजं ब्रह्म यत्तन्नतोऽस्मि ॥१॥

जो अपनी चराचरव्यापिनी ज्ञानरश्मियोंके विस्तारसे सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त कर [ जाग्रत्-अवस्थामें ] स्थूल विषयोंका भोग करनेके अनन्तर फिर [ स्वप्नावस्थामें ] बुद्धिसे प्रकाशित वासनाजनित सम्पूर्ण भोगोंका पानकर मायासे हम सब जीवोंको भोग कराता हुआ [ स्वयं ] आनन्दका भोक्ता होकर शयन करता है तथा जो परम अमृत और अजन्मा ब्रह्म मायासे 'तुरीय' ( चौथी ) संख्यावाला हैं, उसे हम नमस्कार करते हैं ॥ १ ॥

यो विश्वात्मा विधिजविषयान् प्राश्य भोगान्स्थविष्ठान्
पश्चाच्चान्यान्स्वमतिविभवान् ज्योतिषा स्वेन सूक्ष्मान् ।
सर्वानैतान्पुनरपि शनैः स्वात्मनि स्थापयित्वा
हित्वा सर्वान्विशेषान्निर्गतगुणगणः पात्वसौ नस्तुरीयः ॥२॥

जो सर्वात्मा [ जाग्रत्-अवस्थामें ] शुभाशुभ कर्मजनित स्थूल भोगोंको भोगकर फिर [ स्वप्नकालमें ] अपनी बुद्धिसे परिकल्पित सूक्ष्म विषयोंको [ सूर्य आदि बाह्य ज्योतियोंका अभाव होनेके कारण ] अपने ही प्रकाशसे भोगता है और फिर धीरे-धीरे इन सभीको अपनेमें स्थापित कर सम्पूर्ण विशेषोंको छोड़कर निर्गुणरूपसे स्थित हो जाता है, वह तुरीय परमात्मा हमारी रक्षा करे ॥ २ ॥